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गूगल मैप्स का इस्तेमाल करते हैं तो ये एक सलाह आपके बड़े काम आ सकती है
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
28 वर्षीय राज दास ने देशभर में हमेशा कार से ही यात्रा की, फिर जगह कोई भी हो. कई लोगों की तरह, वो भी मंज़िल तक पहुँचने के लिए आदतन सैटेलाइट पर आधारित नेविगेशन टूल का इस्तेमाल करते थे.
मगर पिछले हफ्ते उन्होंने जो झेला, उससे वह सकते में आ गए. दरअसल, उन्होंने गूगल मैप्स पर गोवा के पणजी की लोकेशन डाली थी.
फिर वो अपने सहयोगी और दो रिश्तेदारों के साथ सेडान कार से रवाना हो गए. इस बीच, उन्होंने कर्नाटक के बेलगावी ज़िले से एक शॉर्ट कट लिया. मगर, वह पश्चिमी घाट के खानापुर जंगलों में फंस गए.
दास ने बीबीसी हिंदी को बताया, "यह एक ऐसी सड़क थी, जहां हम यू-टर्न भी नहीं ले सकते थे. उसके बाद हमें समझ आया कि वहां आगे कोई सड़क नहीं है और हम जंगल में थे."
ग़नीमत ये रही कि ये उत्तर प्रदेश के बरेली जैसा अधूरा फ्लाई ओवर नहीं था, जहाँ कार कई फीट नीचे गिर गई थी और उसमें सवार तीनों यात्रियों की मौत हो गई थी.
दास और उनके दोस्तों के लिए यह बिल्कुल नया अनुभव था. उनके मोबाइल फोन में सिग्नल नहीं थे और उन्हें बताया जा चुका था कि ये एक ख़तरनाक जंगल है.
जंगल में पहुंचे कैसे?
दास और उनके सहयोगी एक पेमेंट गेटवे कंपनी में काम करते हैं. इन लोगों को पणजी एक कॉन्फ़्रेंस में जाना था. लेकिन उन्होंने काम के साथ-साथ गोवा में कुछ पल आराम से बिताने की भी योजना बना ली और इसलिए ही दो रिश्तेदार भी उनके साथ निकल पड़े.
दास के भतीजे आकाश ने बीबीसी हिंदी से कहा, "हमने पूरे समय गूगल मैप्स का इस्तेमाल किया और हमें किसी तरह की दिक्कत नहीं आई."
दास ने कहा कि जब वो दिल्ली से कार चलाकर बेलगावी पहुंचे तो राष्ट्रीय राजमार्ग ख़त्म होते दिखाई दिया. इसी दौरान गूगल मैप्स ने बगल से एक सड़क गुज़रते दिखाई, जो गोवा की ओर जा रही थी.
तो फिर दास ने बगल वाली सड़क से आगे जाने का फ़ैसला किया.
दास ने बताया कि हालांकि, वन विभाग के अधिकारियों ने उनको बताया था कि "सड़क के दरवाजे़ सुबह 6 बजे ही खुलेंगे. लेकिन हम वहां रात के 2 से 3 बजे के बीच मौजूद थे. अधिकारियों ने सुझाव दिया था कि हाईवे ख़त्म होने के तुरंत बाद दाईं ओर मुड़ जाएं."
दास ने उन निर्देशों का पालन किया और उनको महसूस हुआ कि वहां एक कच्ची सड़क थी और उस समय वहां से कुछ गाड़ियां गुज़रते दिख रही थीं.
दास कहते हैं कि उन्हें अधिकारियों ने बताया भी था कि इस सड़क पर करीब साढ़े चार किलोमीटर चलने के बाद हाईवे पर पहुंच जाएंगे.
दास ने कहा कि उन्होंने उस सड़क पर गाड़ी चलाने का फ़ैसला इसलिए भी कर लिया था कि वो चार लोग थे.
उन्होंने कहा, "मैंने आज से पहले ऐसी सड़क नहीं देखी थी. उसकी हालत बहुत ही ख़राब थी. क़रीब दो या तीन किलोमीटर के बाद हमें अहसास हुआ कि वहां कोई सड़क नहीं थी."
इससे भी बुरा तो ये था कि वहां यू-टर्न लेना असंभव था. यानी चारों लोग उस जगह पर भी नहीं लौट सकते थे, जहाँ से इस परेशानी की शुरुआत हुई थी. वे कोई जोख़िम भी नहीं लेना चाहते थे क्योंकि, उन्होंने पहले ही ये सुन लिया था कि "वह एक ख़तरनाक जंगल था."
नाउम्मीदी भरे माहौल में ये चारों लोग सवेरा होने तक कार में ही बैठे रहे. उन्हें यह भी अहसास हुआ कि इलाक़े में किसी तरह की फ़ोन कनेक्टिविटी नहीं थी.
फ़ोन के नेटवर्क पाने के लिए ये लोग कुछ किलोमीटर चलकर दूसरी जगह गए. उन्होंने वन विभाग से संपर्क करने की कोशिश की और बाद में 112 नंबर पर डायल करके पुलिस से संपर्क किया.
कुछ घंटों के बाद सुबह 6 बजे के क़रीब, पुलिस सब-इंस्पेक्टर केएल बडिगर उनको जंगल से बाहर निकालने के लिए वहां पहुंचे.
पुलिस वालों के इंतज़ार में बैठे चारों लोगों की उम्मीदों को उगते सूरज ने थोड़ा बल दिया लेकिन तभी दास और उनके भतीजे को अहसास हुआ कि आगे का रास्ता एक छोटे नाले की ओर ले जा रहा है.
अनसुलझे सवाल भी...
दास ने हैरानी से कहा, "अगर रास्ता था ही नहीं, तो वन अधिकारियों ने हमें उस सड़क पर जाने के लिए क्यों कहा. वहां सड़क पर कोई बोर्ड भी नहीं था, जो यह बताए कि यह एक वन क्षेत्र है."
उन्होंने कहा, "गूगल मैप्स भी आज कल कई ग़लत रास्ते बता रहा है. इससे पहले हमें कभी इतने ग़लत रास्ते नहीं दिखते थे."
तो, गूगल मैप्स का इस्तेमाल करने वालों के लिए दास ने क्या सलाह दी?
उन्होंने कहा, "मैं यह नहीं कहूंगा कि मैंने पूरी तरह से गूगल मैप्स का इस्तेमाल करना बंद कर दिया है."
"मैंने इस घटना के बाद भी इसका उपयोग किया, लेकिन उस तरीके से नहीं, जैसा मैं पहले किया करता था."
"पहले मैं पूरी तरह से गूगल मैप्स पर निर्भर था, क्योंकि जब आप सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा अकेले करते हैं और वो भी किसी अनजानी जगह पर, तो आप इस ऐप को पूरी तरह नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते हैं."
दास ने कहा, "एक सलाह जो मैं लोगों को देना चाहता हूं वो यह है कि कुछ हद तक इसका उपयोग करना और इस पर भरोसा करना अच्छी बात है, मगर हमें पूरी तरह से इस पर निर्भर नहीं होना चाहिए और हमें समय-समय पर दिशा-निर्देशों के बारे में स्थानीय लोगों से भी पूछताछ करते रहना चाहिए ताकि इस तरह की घटनाएं न हों."
गूगल की बात
गूगल से मिली जानकारी के अनुसार, कंपनी यूज़र्स की सुरक्षा और उनको दी जाने वाली सूचना की गुणवत्ता को बेहद गंभीरता से लेती है.
कंपनी का कहना है कि 'हम यूज़र्स को उपयोगी सूचना देने और उनको सुरक्षित आने-जाने में मदद करने की लगातार कोशिश करते रहते हैं.'
गूगल का कहना है कि दुनियाभर में परिवर्तन इतने व्यापक पैमाने पर हो रहे हैं कि ये उनके पास उपलब्ध डेटा के लिए एक चुनौती हो सकता है.
उदाहरण के लिए, "प्वॉइंट ए से प्वाइंट बी तक का सबसे अच्छा और सुरक्षित रास्ता भी मौसम के अचानक करवट लेने जैसे कारणों से नाटकीय तौर पर बदल सकता है."
कंपनी मैप को अपडेटेड रखने के लिए एआई तकनीक, डेटा पार्टनर्स समेत कई जगहों से मिल रहे लाखों इनपुट्स का रोज़ाना इस्तेमाल कर रही है.
गूगल ने देशभर में कई शहरों में ट्रैफिक पुलिस अथॉरिटीज़ के साथ साझेदारी की है. इसका मक़सद सड़क बंद होने या किसी तरह का व्यवधान होने पर आधिकारिक जानकारी मुहैया कराना है. पिछले साल दिल्ली में जी20 सम्मेलन और कई शहरों में हुए विश्व कप के आयोजन के दौरान ये देखने को मिला है.
इसके अलावा कंपनी एल्गोरिदम, ऑपरेशंस चैनल्स और यूज़र्स द्वारा बताई गई रिपोर्ट के आधार पर सड़कों की बदलती स्थिति को लेकर लगातार अपडेट देती रहती है.
कंपनी ने कहा, "मगर, अभी भी काम करना बाकी है. हम इसे बेहतर बनाने के लिए काम कर रहे हैं."
इसी तरह, दो सप्ताह पहले नितिन, अजित और अमित नाम के तीन भाई बदायूं से बरेली की ओर एक शादी में शामिल होने जा रहे थे.
तब गूगल मैप्स के ज़रिए वो लोग एक अधूरे पुल पर पहुंच गए थे, जिसका एक हिस्सा बाढ़ में टूट गया था. और उनकी कार रामगंगा नदी में गिर गई थी.
इस मामले में चार इंजीनियर और गूगल मैप्स के एक अनाम अधिकारी के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.