ईरान-होर्मुज़: क्या नौसैनिक नाकाबंदी सच में असरदार होती है?

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, ईरान ने होर्मुज़ स्ट्रेट को बंद कर दिया है जबकि अमेरिका ने भी नाकाबंदी कर रखी है
    • Author, बीबीसी न्यूज़ पर्शियन
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

होर्मुज़ स्ट्रेट को लेकर एक और हफ्ता उलझन में बीत गया.

नाज़ुक संघर्षविराम के बीच, ईरान के विदेश मंत्री ने बीते शुक्रवार को कहा कि युद्धविराम की बाकी अवधि के लिए यह स्ट्रेट व्यापारिक जहाज़ों के लिए "पूरी तरह खुला" रहेगा.

लेकिन ईरान ने एक दिन बाद ही अपना रुख़ बदल लिया और होर्मुज़ स्ट्रेट फिर से बंद कर दिया. इसका कारण ईरानी बंदरगाहों पर अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी जारी रखे जाने को बताया गया.

इसके बाद कई टैंकरों ने यह जानकारी दी कि उन पर ईरानी जहाज़ों ने या तो फ़ायरिंग की या उन्हें वापस लौटने के लिए मजबूर किया गया.

बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

माफ़ी चाहते हैं, हम इस स्टोरी का कुछ हिस्सा लाइटवेट मोबाइल पेज पर नहीं दिखा सकते.

अमेरिका के नेवी ब्लॉकेड के फ़ैसले ने युद्ध के दौरान इस्तेमाल होने वाले एक पुराने तरीक़े को फिर चर्चा में ला दिया है. इसका मक़सद समुद्री रास्तों को बंद करके किसी देश की अर्थव्यवस्था को कमज़ोर करना, व्यापार को बाधित करना और विरोधी को झुकने पर मजबूर करना होता है.

इतिहास बताता है कि ऐसे कदम दबाव बनाने में असरदार हो सकते हैं, लेकिन उनका असर जटिल होता है. कुछ मामलों में, ख़ासकर दोनों विश्व युद्धों के दौरान, नौसैनिक नाकाबंदी ने युद्ध की क्षमता को कमज़ोर किया.

वहीं ग़ज़ा और यमन जैसे मामलों में इसने मानवीय संकट तो बढ़ाया ही, स्थायी राजनीतिक समाधान भी नहीं दिया.

प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटेन की जर्मनी पर नाकाबंदी

इमेज स्रोत, Historica Graphica Collection / Heritage Images / Getty Images

इमेज कैप्शन, प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान हज़ारों जर्मन नागरिकों की मौत हो गई थी

प्रथम विश्व युद्ध (1914–1919) में जर्मनी पर ब्रिटेन की नौसैनिक नाकाबंदी को अक्सर "दूरस्थ नाकाबंदी" का उदाहरण माना जाता है. ब्रिटेन ने सीधे जर्मन बंदरगाहों को बंद नहीं किया, बल्कि उत्तरी सागर में अपनी पकड़ के ज़रिए समुद्री यातायात को नियंत्रित किया.

रॉयल नेवी, जहाज़ों की जांच करती थी और तटस्थ देशों पर दबाव डालती थी, जिससे जर्मनी वैश्विक व्यापार से लगभग कट गया. समय के साथ प्रतिबंधित वस्तुओं के दायरे में सिर्फ़ सैन्य सामान ही नहीं, बल्कि खाद्य और उर्वरक भी आ गए.

शुरुआत में जर्मनी ने तटस्थ देशों के जरिए व्यापार और घरेलू उपायों से असर को कम किया. लेकिन जैसे-जैसे जंग लंबी खिंची, आयात घट गया और कृषि और उद्योग प्रभावित हुए.

1916 तक खाद्य संकट गहरा गया. "टर्निप विंटर" कठिन हालात का प्रतीक बना और इतिहासकारों के अनुसार कुपोषण और बीमारियों से लाखों लोगों की मौत हुई.

हालांकि जर्मनी की हार का यह अकेला कारण नहीं था, लेकिन इसे एक बड़ा कारक माना जाता है.

द्वितीय विश्व युद्ध में जापान पर मित्र देशों की नाकाबंदी

इमेज स्रोत, Galerie Bilderwelt / Getty Images

इमेज कैप्शन, अप्रैल 1945 में जापान के ओकिनावा द्वीप पर अमेरिकी सैनिक और युद्धपोत

जापान समंदर के रास्ते होने वाली सप्लाई पर निर्भर था, इसलिए नाकाबंदी को लेकर अधिक संवेदनशील था. द्वीपीय देश होने के कारण वह तेल, कच्चा माल और भोजन के लिए समुद्री रास्तों पर निर्भर था.

साल 1943 से अमेरिकी पनडुब्बियों ने जापानी व्यापारिक जहाज़ों को निशाना बनाना शुरू किया. बाद में हवाई माइनिंग ऑपरेशन, खासकर "ऑपरेशन स्टार्वेशन", ने समुद्री रास्तों को और बाधित किया.

जंग के अंतिम सालों तक जापान का व्यापारिक बेड़ा लगभग ख़त्म हो गया. युद्ध के बाद के आकलन बताते हैं कि इससे उसकी अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई.

जर्मनी से उलट, जापान के पास वैकल्पिक ज़मीनी रास्ते नहीं थे.

हालांकि आत्मसमर्पण कई कारणों से हुआ, लेकिन समुद्री आपूर्ति टूटना एक अहम वजह थी.

1962 में क्यूबा की नाकाबंदी

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, 1962 में क्यूबा मिसाइल संकट के दौरान एक सोवियत कार्गो जहाज़ के ऊपर अमेरिका का एक निगरानी जेट पी2वी नेप्चून उड़ रहा था

क्यूबा मिसाइल संकट में अमेरिका ने अपने कदम को नाकाबंदी नहीं कहा, बल्कि "क्वारेंटाइन" शब्द इस्तेमाल किया ताकि क़ानूनी जटिलताओं से बचा जा सके.

राष्ट्रपति जॉन एफ़ कैनेडी के तहत अमेरिकी नौसेना को क्यूबा की ओर जा रहे सोवियत सैन्य सामान को रोकने के लिए तैनात किया गया.

इसका मक़सद सीमित और स्पष्ट था- मिसाइल तैनाती रोकना और बातचीत के लिए दबाव बनाना.

यह कार्रवाई एक महीने से कम चली और इसने मुख्य रूप से एहतियाती कार्रवाई के रूप में काम किया. कुछ सोवियत जहाज़ वापस लौट गए.

कूटनीति के साथ मिलकर यह संकट ख़त्म हुआ, जिसमें सोवियत मिसाइलें क्यूबा से हटाई गईं और गुप्त रूप से अमेरिका ने तुर्की से अपनी मिसाइलें हटाईं.

अपने उद्देश्य के हिसाब से इसे सफल माना जाता है.

इराक़ पर संयुक्त राष्ट्र की पाबंदियां

इमेज स्रोत, AFP via Getty Images

इमेज कैप्शन, साल 2003 में इराक़ का बसरा पोर्टः 1991 के युद्ध और सालों तक प्रतिबंध के चलते देश का एकमात्र डीप वाटर पोर्ट लगभग वीरान पड़ गया था

1990 में कुवैत पर इराक़ के हमले के बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने व्यापक प्रतिबंध लगाए, जिनमें समुद्री यातायात पर निगरानी भी शामिल थी.

1990 के दशक और 2000 के शुरुआती सालों तक लागू इन पाबंदियों का मक़सद इराक़ को आर्थिक रूप से अलग-थलग करना था.

हालांकि इराक़ की समुद्र तक पहुंच सीमित थी, फिर भी इन कदमों ने तेल निर्यात को प्रभावित किया. लेकिन ज़मीनी रास्तों से कुछ हद तक प्रतिबंधों से बचाव होता रहा.

व्यवहार में ये उपाय अन्य प्रतिबंधों और सैन्य दबाव के साथ मिलकर ज़्यादा प्रभावी रहे.

पूर्व यूगोस्लाविया की नाकाबंदी

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, 1992 में नेटो का बहुराष्ट्रीय टास्क फ़ोर्सः संयुक्त बलों ने सर्बिया और मोंटेनेग्रो के ख़िलाफ़ संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों को लागू किया था

बाल्कन युद्धों के दौरान संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों को नेटो और यूरोपीय संघ ने समुद्र में लागू किया.

1992 से 1996 के बीच एड्रियाटिक सागर में हजारों जहाज़ों की जांच हुई और सैकड़ों को रोका गया.

भौगोलिक स्थिति सीमित होने के कारण निगरानी आसान थी.

इन कदमों ने प्रतिबंधों को मजबूत किया, लेकिन इससे युद्ध ख़त्म नहीं हो सके.

ग़ज़ा की नाकाबंदी

इमेज स्रोत, Majdi Fathi / NurPhoto via Getty Images

इमेज कैप्शन, फ़लस्तीनी फ़िशिंग बोट्स ने साल 2018 में ग़ज़ा पट्टी के इसराइली नेवी ब्लॉकेड को तोड़ने की कोशिश की थी

साल 2007 से जारी ग़ज़ा की नाकाबंदी, आवाजाही, व्यापार और संसाधनों पर व्यापक प्रतिबंधों का हिस्सा है.

साल 2009 से समुद्री नाकाबंदी को कड़े करने से समुद्र तक पहुंच सीमित हो गई. इसराइल का कहना है कि यह हथियारों की तस्करी रोकने के लिए ज़रूरी है, जबकि मानवीय संगठनों का कहना है कि इससे ग़ज़ा की अर्थव्यवस्था और जीवन स्थितियां बुरी तरह प्रभावित हुई हैं.

इसकी क़ानूनी स्थिति पर विवाद बना हुआ है. 2024 में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की सलाहकार की राय में फ़लस्तीन क्षेत्रों की स्थिति पर चिंता जताई गई थी.

कई सालों के बावजूद यह नाकाबंदी हिंसा के चक्र को रोक नहीं सकी.

यमन पर सऊदी के अगुवाई में नाकाबंदी

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, यमन ने भारी मानवीय संकट का सामना किया

साल 2015 से सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने यमन के बंदरगाहों और हवाई क्षेत्र पर प्रतिबंध लगाए, ताकि हूती विद्रोहियों तक हथियारों की आपूर्ति रोकी जा सके.

यमन की अर्थव्यवस्था मुख्य तौर पर आयात पर निर्भर है, इसलिए इन कदमों का सीधा असर नागरिकों पर पड़ा. संयुक्त राष्ट्र ने बार-बार अकाल, ईंधन की कमी और स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव की चेतावनी दी है.

जांच तंत्र बनाए गए, लेकिन देरी के कारण आपूर्ति प्रभावित होती रही.

इस नाकाबंदी ने दबाव तो बढ़ाया, लेकिन इससे निर्णायक परिणाम नहीं मिल पाया. इसके बजाय यह लंबे मानवीय संकट का कारण बनी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी आलोचना भी हुई.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.