देहरादून में मॉर्निंग वॉक पर निकले रिटायर्ड ब्रिगेडियर की मौत, स्थानीय क्लबों की भूमिका पर क्यों उठे सवाल

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इमेज कैप्शन, मॉर्निंग वॉक पर निकले रिटायर्ड ब्रिगेडियर मुकेश जोशी दो गाड़ियों के बीच क्रॉस फ़ायर की चपेट में आ गए थे
    • Author, आसिफ़ अली
    • पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

देहरादून में 30 मार्च की सुबह मॉर्निंग वॉक पर निकले 74 वर्षीय रिटायर्ड ब्रिगेडियर मुकेश जोशी की गोली लगने से मौत हो गई.

पुलिस के मुताबिक़, वह दो गाड़ियों में बैठे लोगों के बीच हो रही गोलीबारी की चपेट में आ गए थे.

पुलिस ने बताया कि दरअसल इस घटना की शुरुआत एक रात पहले शहर के एक नाइट क्लब में हुए विवाद से हुई थी, जो अगले दिन सड़क पर हिंसा में बदल गई.

अब तक इस मामले में चार लोगों को गिरफ़्तार कर लिया गया है और क्लब को सील कर लाइसेंस रद्द करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है. लेकिन इस मामले के बाद शहर में सुरक्षा-व्यवस्था को लेकर सवाल उठने लगे हैं.

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क्या है पूरा मामला?

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इमेज कैप्शन, घटना वाली सुबह दो कारों में सवार युवक एक दूसरे पर फ़ायर कर रहे थे. उनमें से एक गाड़ी यह भी थी, जो आगे जाकर दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी

यह घटना देहरादून के राजपुर रोड के पास सिनोला और जौहरी गांव के बीच हुई. मुकेश जोशी अपनी दिनचर्या के अनुसार सुबह क़रीब साढ़े छह बजे मॉर्निंग वॉक पर निकले थे.

पुलिस ने बताया कि इसी दौरान एक स्कॉर्पियो गाड़ी में सवार युवकों ने एक फॉर्च्यूनर गाड़ी को रोकने के लिए उसके टायर्स पर 8 से 9 राउंड गोलियां चलाईं.

पुलिस का कहना है कि इसी दौरान एक गोली रिटायर्ड ब्रिगेडियर मुकेश जोशी के सीने में लगी. घटना के बाद अभियुक्त मौके से फरार हो गए.

गंभीर रूप से घायल ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) जोशी को तुरंत मैक्स अस्पताल ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई.

देहरादून के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक प्रमेन्द्र डोभाल ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया कि घटना की कड़ी एक रात पहले से जुड़ी है.

वह बताते हैं, "29 मार्च की रात मसूरी रोड स्थित एक क्लब में कुछ युवकों के बीच बिल के भुगतान को लेकर विवाद हुआ था. यह विवाद अगले दिन हिंसा में बदल गया. सुबह दोनों पक्ष एक-दूसरे का पीछा करते हुए सड़क पर गोलीबारी करते हुए निकले."

पुलिस ने अब तक चार लोगों को गिरफ़्तार किया है, जबकि अन्य की तलाश जारी है.

पुलिस ने बताया कि संबंधित क्लब निर्धारित समय सीमा के बाद खुला पाया गया. इसे सील कर दिया गया है और लाइसेंस रद्द करने की सिफारिश की गई है.

वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने बताया कि इस मामले में कुठालगेट पुलिस चौकी के इंचार्ज को भी निलंबित किया गया है.

चश्मदीदों ने क्या बताया?

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घटना के प्रत्यक्षदर्शी एसपी शर्मा उस सुबह को याद करते हुए कहते हैं कि वहां कुछ ही सेकेंड में सब बदल गया.

वह बताते हैं, "हम रोज़ की तरह सुबह साढ़े छह बजे मॉर्निंग वॉक पर निकले थे. मैं, ब्रिगेडियर जोशी और उनके साढ़ू भाई-हम तीन लोग थे."

"करीब 200 मीटर आगे बढ़ने के बाद हमने देखा कि सामने से दो गाड़ियां तेज़ी से आ रही हैं."

वह कहते हैं, "हमें लगा कि कहीं गाड़ी हमसे टकरा न जाए, इसलिए हम किनारे होने लगे. तभी पटाखों जैसी तेज आवाज़ आई. उसके बाद जो हुआ, उसने हमें स्तब्ध कर दिया. आवाज़ के तुरंत बाद ब्रिगेडियर जोशी ज़मीन पर गिर पड़े. तब तक गाड़ियां निकल चुकी थीं."

एसपी शर्मा बताते हैं कि पहले उन्हें लगा कि शायद हार्ट अटैक आया है लेकिन उनके सीने से खून निकल रहा था. उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी.

मुकेश जोशी के छोटे भाई राकेश जोशी कहते हैं, "वह मेरे लिए सिर्फ़ बड़े भाई नहीं थे, बल्कि पिता जैसे थे. उन्होंने मुझे हमेशा रास्ता दिखाया."

राकेश जोशी पेशे से पत्रकार हैं. वह कहते हैं, "उन्हें टहलने का बहुत शौक था. किसी ने सोचा नहीं था कि यही उनकी ज़िंदगी का आखिरी काम बन जाएगा."

वह कहते हैं, "देहरादून कभी ऐसी शांत सी जगह थी और अब यहां का माहौल बदल गया है. कभी-कभी मैं ये सोचता था कि एक दिन मैं भी देहरादून में बसूंगा और भाई के साथ रहूंगा, मगर अब ये सपना अधूरा ही रह गया."

आबकारी विभाग की कार्रवाई और उठते सवाल

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इमेज कैप्शन, हादसे के बाद ज़िला आबकारी अधिकारी ने बार और क्लब संचालकों के साथ बैठक की

इस घटना के बाद लोगों का आरोप है कि कई क्लब बिना समय-सीमा का पालन किए हुए चल रहे हैं.

इस घटना को कई लोग नाइट लाइफ़ के विस्तार और कानून-व्यवस्था से जोड़कर भी देखते हैं. उन्होंने इसको लेकर आबकारी विभाग पर भी सवाल उठाए हैं.

मसूरी आबकारी निरीक्षक प्रेरणा बिष्ट के अनुसार, "क्लब को पहले नोटिस जारी किया गया था. संतोषजनक जवाब नहीं मिलने पर लाइसेंस रद्द करने की सिफ़ारिश की गई थी. जिसके बाद क्लब में मौजूद बार का लाइसेंस रद्द किया गया."

उन्होंने बताया कि बार और क्लब संचालकों के साथ बैठक कर सख्त निर्देश दिए गए हैं कि वीकेंड में 12 बजे और वीक डेज़ में 11 बजे के बाद अगर कोई शराब परोसते हुए पाया जाएगा तो सीधे उनके लाइसेंस को रद्द करने की कार्रवाई की जाएगी.

हालांकि, नाम न बताने की शर्त पर एक रेस्तरां और बार संचालक कहते हैं, "ऐसी बैठकें किसी हादसे के बाद ही होती हैं. पहले से निगरानी क्यों नहीं होती?"

इसी बीच ज़िला आबकारी अधिकारी वीके जोशी का कहना है कि बढ़ती नाइटलाइफ़ के बीच विभाग की ओर से जागरूकता पर भी ज़ोर दिया जा रहा है.

उन्होंने बताया, "देहरादून में सुरक्षा और शराब नियंत्रण को लेकर कई कार्यक्रम चलाए गए हैं. उपभोक्ताओं को जागरूक करने के लिए विज्ञापन अभियान भी चलाए जा रहे हैं, ताकि लोग तय समय का पालन करें और सीमित मात्रा में मदिरा का सेवन करें."

नाइटलाइफ़, नियम और ज़मीनी हक़ीक़त: क्या बदल रहा है देहरादून में?

देहरादून में बीते कुछ वर्षों में नाइटलाइफ़ का विस्तार तेज़ी से हुआ है. नए क्लब, बार और रेस्तरां खुलने के साथ शहर का स्वरूप भी बदला है.

लेकिन इस बदलाव के साथ नियमों के पालन, निगरानी और जवाबदेही को लेकर सवाल भी उठने लगे हैं.

सामाजिक कार्यकर्ता अनूप नौटियाल कहते हैं कि कागज़ों पर तय नियम और ज़मीनी हकीकत में अंतर दिखाई देता है.

वह कहते हैं, "क्लब या बार कितने बजे बंद होते हैं और आखिरी ऑर्डर कब लिया जाता है, इसको लेकर जो कहा जाता है, और जो वास्तव में होता है, उसमें फ़र्क है."

उनके मुताबिक़, राज्य में हो रहे बुनियादी बदलावों को भी इस संदर्भ में समझना ज़रूरी है.

"सड़कें चौड़ी हुई हैं, बड़ी गाड़ियां बढ़ी हैं, और इसके साथ ही दूसरे तत्व भी आए हैं. जो मांग बनती है, उसी के मुताबिक़ शहर के क्लब और बार भी खुद को ढालते हैं."

नौटियाल का कहना है कि निगरानी और नियंत्रण के सवाल भी सामने आते हैं, "कई लोगों के बीच यह धारणा बनती है कि कुछ क्लब या बार प्रभावशाली संरक्षण में चल रहे हैं, जिस वजह से नियमों के पालन को लेकर ढिलाई देखने को मिलती है."

नौटियाल हालिया कार्रवाई पर भी सवाल उठाते हैं, "मीडिया रिपोर्ट्स में मुख्यमंत्री के हवाले से कहा गया कि कुछ निचले स्तर के अधिकारियों को सस्पेंड किया गया है. लेकिन सवाल यह भी उठता है कि अगर जवाबदेही तय करनी थी, तो क्या यह केवल निचले स्तर तक सीमित रहनी चाहिए थी, या उच्च स्तर पर भी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए थी?"

हालांकि, इस तरह के आरोपों और सवालों पर संबंधित एजेंसियों की ओर से अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आती रही हैं और अधिकारी नियमों के पालन का दावा करते हैं.

नौटियाल के मुताबिक़, विभागों के बीच को-ऑर्डिनेश भी एक अहम मुद्दा है, "पुलिस और आबकारी जैसे विभागों के बीच बेहतर तालमेल की ज़रूरत है. कई बार कार्रवाई घटनाओं के बाद ही होती दिखती है."

वह कहते हैं कि इस तरह की घटनाएं केवल एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि सिस्टम की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाती हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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