क्या नए साल में कम होगा राज्यपालों और राज्य सरकारों का टकराव, कैसे हैं राज्यों में हालात?
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सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों राज्य की विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों को राज्यपालों द्वारा दबाए रखने को भले ही 'आग से खेलने वाला' और इसे 'चिंता का विषय' बताया हो लेकिन हालत ये है कि कई राज्यों में सरकारों के फ़ैसले पर राज्यपाल अनुमति नहीं देते और वे सालों-साल तक कानून नहीं बन पाते.
ऐसे ही टकरावों पर अलग अलग राज्यों में क्या है स्थिति बता रहे हैं बीबीसी के सहयोगी पत्रकार.
सड़क पर उतरे केरल के राज्यपाल
इमरान कुरैशी
ऐसा लगता है कि राज्यों के राज्यपालों के बीच एक अनुचित प्रतिस्पर्धा विकसित हो रही है. एक के बाद एक प्रोटोकॉल उल्लंघन की घटनाएं सामने आ रही हैं.
राज्यपाल ऐसे कदम उठा रहे हैं जो देश ने पहले कभी नहीं देखा है.
एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने प्रोटोकॉल के सभी मानदंडों को तोड़ दिया.
वे कोझिकोड की सड़कों पर अकेले चले और एक दुकानदार द्वारा पेश किए गए कोझिकोडन हलवे का स्वाद चखा.
सादे कपड़ों में पुलिसकर्मी उन्हें किसी भी अप्रिय घटना से बचाने के लिए उनके साथ चल रहे थे.
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कोझिकोड में राज्यपाल का विरोध
ये उस समय हुआ है जब दो दिन पहले स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) के कार्यकर्ता 'गो बैक-गो बैक' के नारे लगा रहे थे.
उन्होंने बैनर लगा रखे थे, जिन पर लिखा था, 'मिस्टर चांसलर, आपका यहां स्वागत नहीं है.'
इसके ठीक 12 महीने पहले, उनके समकक्ष तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि ने कुछ ऐसा किया जो भारतीय विधायिका के इतिहास में किसी दूसरे राज्यपाल ने नहीं किया था.
वह विधानसभा में अपने पारंपरिक संबोधन को बीच में छोड़कर चले गए थे, क्योंकि सत्तारूढ द्रमुक के सदस्यों ने उनके उस भाषण को नहीं पढ़ने का विरोध किया, जिसे राज्य कैबिनेट ने संविधान के मुताबिक मंजूरी दी थी.
एक राज्यपाल राज्य के प्रमुख के तौर पर नए साल के पहले दिन जब विधानमंडल की बैठक होती है तो अपने संबोधन में सरकार को 'मेरी सरकार' बताता है.
एक राज्यपाल को जैसा कि संविधान इजाजत देता है या जैसा सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि निश्चित रूप से, मुख्यमंत्री या सरकार की सलाह के मुताबिक काम करना होता है.
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तमिलनाडु के राज्यपाल ने तोड़ी परंपरा?
लेकिन राज्यपाल रवि ने विधानसभा के बाहर अपनी सरकार, इस मामले में द्रमुक सरकार की आलोचना कर स्थापिक परंपरा को तोड़ दिया. इसी तरह की प्रतिस्पर्धात्मक भावना से राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद ख़ान केरल की वामपंथी लोकतांत्रिक मोर्चा सरकार की आलोचना भी करते रहे हैं.
चेन्नई स्थित राजनीतिक विश्लेषक एन सत्यमूर्ति ने बीबीसी हिंदी से कहा, "राजभवन के भीतर राजनीति हमेशा चलती रहती थी, जो पुराने समय के मशहूर 'आया राम, गया राम' में परिलक्षित होती है. लेकिन कोई भी राज्यपाल अपनी ही सरकार की आलोचना करने की सीमा तक नहीं गया."
उन्होंने कहा, ''वर्तमान राज्यपाल वैचारिक और विवादास्पद मुद्दों पर बोलने लगे हैं.''
पूर्व कुलपति और राजनीतिक टिप्पणीकार प्रोफेसर जे प्रभाष तिरुवनंतपुरम में रहते हैं. उन्होंने बीबीसी हिंदी से कहा, ''एक नागरिक के रूप में, हम राज्यपाल के पद पर बैठे व्यक्ति से कुछ मर्यादा की उम्मीद करते हैं. ऐसी कार्रवाइयों से हो यह रहा है कि विश्वविद्यालयों का नियमित कामकाज बुरी तरह प्रभावित हो रहा है. अभी 15 विश्वविद्यालयों में से करीब नौ में पूर्णकालिक कुलपति नहीं हैं.''
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राज्यपाल रवि और राज्यपाल खान दोनों के मामले में, विश्वविद्यालयों पर नियंत्रण को लेकर संबंधित राज्य सरकारों के साथ उनका टकराव शुरू हो गया है. राज्यपालों ने कुलाधिपति के रूप में विश्वविद्यालयों के मामलों में हस्तक्षेप करने का प्रयास किया है. सामान्य परिस्थितियों में कुलाधिपति राज्य सरकारों की सिफारिशों को मंजूरी देते हैं.
उनके कार्यों या निष्क्रियताओं ने संबंधित सरकारों को कुलपतियों की नियुक्तियों में कुलाधिपति की शक्तियों पर अंकुश लगाने के लिए कानून बनाने के लिए प्रेरित किया है. राज्यपाल खान की ओर से नौ कुलपतियों से इस्तीफा मांगने के बाद केरल सरकार ने यह कानून पेश किया.
लेकिन दोनों राज्यपालों ने विधानसभाओं की ओर से पारित कानूनों के बारे में कुछ नहीं किया. तमिलनाडु और केरल सरकारों के सुप्रीम कोर्ट जाने के बाद कुछ हलचल हुई. सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ को संविधान पढ़कर यह कहना पड़ा कि राज्यपालों के पास 'इसे स्वीकार करने, इसे वापस करने या इसे राष्ट्रपति को भेजने' के अलावा कोई और विकल्प नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल रवि को मुख्यमंत्री एमके स्टालिन को चाय पर आमंत्रित करने और मुद्दों पर चर्चा करने के लिए कहा जिसके बाद दोनों की मुलाकात भी हुई. हालांकि इस मुलाकात के बाद तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और राज्यपाल के बॉडी लैंग्वेज़ से ऐसा लग रहा था कि दोनों ही सुलह को लेकर उदासीन हैं.
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मुख्यमंत्री और राज्यपाल में जुबानी जंग
राज्यपाल खान के कामकाज और बयानों की वजह से मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के साथ जुबानी जंग छिड़ी हुई है.
राज्यपाल ने एसएफआई को 'अपराधी' कहा है. इस पर मुख्यमंत्री ने गंभीर आपत्ति जताई है. उन्होंने कहा है कि उनकी सरकार को केंद्र से उन्हें वापस बुलाने के लिए कहेगी.
प्रोफेसर प्रभाष कहते हैं, "लोग सरकार को जिम्मेदार ठहराएंगे, भले ही हर कोई जानता है कि यहां राज्यपाल का एक एजेंडा है."
सत्यमूर्ति कहते हैं, "यहीं तक नहीं है, तेलंगाना की राज्यपाल तमिलसाई सुंदरराजन अपने गृह राज्य के दौरे पर आती हैं. वे एक द्रमुक मंत्री की आलोचना करती हैं. वो यह भूल जाती हैं कि अब वो राज्यपाल हैं. वो किसी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी पर हमला नहीं कर सकतीं हैं."
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश रोहिंटन नरीमन ने पिछले हफ्ते एशियाटिक सोसाइटी से कहा था कि राज्यपालों का इस तरह का काम राज्य की सभी विधायी गतिविधियों को ठप कर देता है.
कितने विधेयक लंबित हैं पश्चिम बंगाल में
प्रभाकर मणि तिवारी, कोलकाता
पश्चिम बंगाल में राजभवन और राज्य सचिवालय के बीच टकराव का इतिहास यूं तो बहुत लंबा रहा है. लेकिन खासकर तत्कालीन राज्यपाल जगदीप धनखड़ के कार्यभार संभालने के बाद जिस तेजी से यह टकराव चरम पर पहुंचा, उसकी दूसरी कोई मिसाल नहीं मिलती.
उस दौरान सरकार और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सार्वजनिक हित वाले विधेयकों को मंजूरी नहीं देने का आरोप लगाती रही थी.
इनमें सबसे अहम था जून 2022 में पारित एक विधेयक को लेकर है. इसमें राज्य सरकार की ओर से संचालित विश्वविद्यालयों के चांसलर के रूप में राज्यपाल की जगह मुख्यमंत्री को नियुक्त करने का प्रावधान है. लेकिन जगदीप धनखड़ ने महीनों उसे लंबित रखा और आखिर उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनने के कारण उनके अपने पद से इस्तीफा देने तक यह जस का तस पड़ा रहा.
धनखड़ की जगह सीवी आनंद बोस के नए राज्यपाल बनने के बाद भी तमाम विधेयकों पर सरकार और राज्यपाल में गतिरोध जारी है. हालांकि राजभवन की ओर से बीते सप्ताह जारी एक बयान में कहा गया है कि राज्यपाल के पास कोई विधेयक लंबित नहीं है. सिवाय उन विधेयकों के जिनके बारे में राज्य सरकार से स्पष्टीकरण की जरूरत है या जो अदालत में विचाराधीन हैं.
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राज्यपाल के पास लंबित हैं सात विधेयक
इसमें कहा गया है कि विश्वविद्यालय मामलों से संबंधित सात अन्य विधेयक न्यायालय में विचाराधीन हैं. बयान के मुताबिक, विधानसभा अध्यक्ष की टिप्पणी के बाद राजभवन में एक समीक्षा बैठक आयोजित की गई.
बनर्जी ने कहा था कि 2011 से कुल 22 विधेयक राजभवन में मंजूरी का इंतजार कर रहे हैं.
उन्होंने कहा था, "2011 से 2016 तक तीन विधेयक, 2016 से 2021 तक चार और 2021 से अब तक 15 विधेयक अनसुलझे हैं. इनमें से छह विधेयक वर्तमान में सीवी आनंद बोस के विचाराधीन हैं."
इससे पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आरोप लगाया था कि राज्यपाल ने कई विधेयकों को रोक रखा है. उनका आरोप था, राज्यपाल आनंद बोस राज्य प्रशासन को पंगु बनाने का प्रयास कर रहे हैं. मुख्यमंत्री ने कहा था कि इसके खिलाफ जरूरत पड़ी तो वे राजभवन के समक्ष धरने पर बैठेगीं..
बिहार: राजभवन से सामंजस्य बना लेती है नीतीश सरकार
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सीटू तिवारी
बिहार में राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने इसी साल फरवरी में पद संभाला था. इसके पांच महीने के भीतर ही राज्य सरकार से राजभवन की तनातनी शुरू हो गई थी. ये तनातनी शिक्षा विभाग से संबंधित फैसलों को लेकर थी. सबसे पहले 25 जुलाई 2023 को राज्यपाल सचिवालय ने एक पत्र जारी किया. इसके मुताबिक राज्य के सभी विश्वविद्दालयों में स्नातक स्तरीय पाठ्यक्रम में सत्र 2023 -24 के लिए च्वाइस बेस्ड क्रेडिट सिस्टम और सेमेस्टर सिस्टम लागू होगा.
25 जुलाई को जारी इस आदेश से पहले ही शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव केके पाठक ने राजभवन सचिवालय को पत्र लिखकर चार वर्षीय पाठ्यक्रम पर फिर से विचार करने का अनुरोध किया था. खुद राज्य के शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर ने इस पर एतराज जताते हुए कहा था, ''राज्य के पास संसाधन नहीं हैं. अभी तीन साल का ग्रेजुएशन पांच साल में पूरा हो रहा है, ऐसे में जब चार साल का ग्रेजुएश होगा तो वो सात साल में पूरा होगा.''
राज्यपाल और राज्य सरकार आमने सामने
जुलाई के बाद अगस्त के पहले सप्ताह में राजभवन ने विश्वविद्दालयों में कुलपति की नियुक्ति के लिए विज्ञापन जारी किया. इस बीच शिक्षा विभाग ने बाबा साहब भीमराव आंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय मुजफ्फरपुर के कुलपति और प्रति कुलपति के वेतन पर रोक लगाते हुए उनके वित्तीय अधिकार पर रोक लगा दी.
राजभवन ने जब इस रोक को हटाने का आदेश दिया तो शिक्षा विभाग के सचिव वैद्यनाथ यादव ने राजभवन को लिखे पत्र में स्पष्ट कहा कि राज्य सरकार विश्वविद्यालयों को सालाना 4000 करोड़ रुपये देती है, ऐसे में शिक्षा विभाग को विश्वविद्यालयों को उनकी जिम्मेदारी बताने और पूछने का पूरा अधिकार है.
राजभवन के कुलपति की नियुक्ति पर निकले विज्ञापन के बाद 22 अगस्त को शिक्षा विभाग ने भी कुलपति की नियुक्ति का विज्ञापन जारी किया. इसके बाद टकराव की स्थिति बढ़ी तो 23 अगस्त को खुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राजभवन जाकर राज्यपाल से मुलाकात की. नीतीश कुमार ने राजभवन और सरकार की तकरार पर पत्रकारों से कहा था, ''सब कुछ ठीक ठाक है और किसी तरह की तकरार नहीं है.''
राजभवन ने भी इस मुलाकात के बाद कहा, ''इस मुलाकात में उच्च शिक्षा और विश्वविद्यालयों से संबंधित विषयों पर सम्मानपूर्ण विमर्श किया.''
कुलपतियों की नियुक्ति पर टकराव
इस मुलाकात के बाद शिक्षा विभाग की तरफ से निकले विज्ञापन को वापस ले लिया गया. लेकिन 30 अगस्त को राज्यपाल सचिवालय ने कुलाधिपति की शक्ति और अधिकार के संबंध में एक पत्र जारी किया. इसमें कहा गया कि कुलाधिपति (राज्यपाल) सचिवालय के निर्देश के अलावा किसी अन्य स्तर पर जारी दिशा-निर्देश का पालन नहीं करें. किसी अन्य द्वारा विश्वविद्यालय को निर्देश देना उनकी स्वायत्ता के अनुकूल नहीं है. ये बिहार राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम 1976 के प्रावधानों का उल्लंघन है.
वरिष्ठ पत्रकार और राजभवन लंबे समय से कवर कर रहे अविनाश कुमार कहते हैं, ''नीतीश सरकार का राज्यपालों के साथ विवाद तो समय-समय पर हुआ है, लेकिन कोई भी विवाद बहुत ज्यादा तूल नहीं पकड़ता. नीतीश कुमार सामंजस्य बना कर चलते हैं. वैसी स्थितियां नहीं बनतीं जैसे राबड़ी राज में राज्यपाल के साथ विवाद में बन जाती थीं.''
झारखंड में कई बार बनी टकराव की स्थिति
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रवि प्रकाश, रांची
झारखंड की मौजूदा हेमंत सोरेन सरकार के चार साल के कार्यकाल में विधानसभा की ओर से बहुमत से पारित कमसे कम आधा दर्जन विधेयक राज्यपाल ने सरकार को लौटा दिए. कई दफा तो इसके लिए हिन्दी और अंग्रेज़ी अनुवादों में मामूली अंतर जैसे कारण भी बताए गए. ज़्यादातर मामलों में विधेयक लौटाते वक्त राज्यपाल ने कोई टिप्पणी नहीं की.
बगैर नोटिंग के लौटाए गए विधेयकों को लेकर सत्तारूढ़ गठबंधन के शीर्ष नेताओं ने पिछले दिनों जब राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन से मिलने का वक्त माँगा, तो राजभवन ने उनके पत्र का कोई जवाब नहीं दिया. इसके बाद जब इन नेताओं का प्रतिनिधिमंडल राज्यपाल से मिलने राजभवन पहुँचा, तो उन्हें बताया गया कि राज्यपाल राँची में नहीं हैं. तब इन नेताओं ने अपना आपत्ति पत्र राजभवन के मुख्य द्वार पर स्थित राज्यपाल के कार्यालय को सौंपा और वापस लौट गए.
झारखंड के राज्यपाल
इन नेताओं ने वहाँ मौजूद मीडिया से कहा कि झारखंड की राज्यपाल रहीं (अब राष्ट्रपति) द्रौपदी मुर्मू ने राज्यपाल रहते हुए खुद द्वारा लौटाए गए हर विधेयक पर नोटिंग की. इससे सरकार को यह समझने में आसानी हुई कि राज्यपाल को किन बिंदुओं पर आपत्ति है.
इसी तरह झारखंड के राज्यपाल रहे सैयद सिब्ते रजी ने भी अपने कार्यकाल के दौरान नोटिंग के साथ विधेयकों को लौटाया, लेकिन झारखंड के मौजूदा राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन और इनके पूर्ववर्ती रमेश बैस (अब महाराष्ट्र के राज्यपाल) ने अधिकतर विधेयकों को लौटाते वक्त नोटिंग करना तक ज़रूरी नहीं समझा.
इस कारण सरकार और राजभवन के बीच हमेशा टकराव की स्थिति बनी रही. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने स्वयं कई जनसभाओं में राज्यपाल के कार्यकलाप पर टिप्पणी की. राज्यपाल रहे रमेश बैस की सरकार और मुख्यमंत्री से संबंधित टिप्पणियाँ सुर्ख़ियों में रहीं. सत्तारूढ़ गठबंधन के नेताओं व प्रवक्ताओं ने प्रेस कांफ्रेंस कर राजभवन पर पूर्वाग्रह से ग्रसित होने के आरोप लगाए. तब विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेता व प्रवक्ताओं ने राज्यपाल का बचाव किया.
इस दौरान विधानसभा अध्यक्ष रवींद्र नाथ महतो की राजभवन को लेकर की गई टिप्प्णियाँ भी चर्चा में रहीं. विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों को बार-बार लौटाए जाने के बाद स्पीकर ने कहा था कि विधानसभा अब अंग्रेज़ी अनुवाद कर अपने विधेयक राजभवन नहीं भेजेगा. अगर राज्यपाल चाहें तो अपने स्तर पर इसका अनुवाद करा लिया करें.
हालाँकि, अबतक राजभवन द्वारा लौटाए गए या वहाँ पेंडिंग पड़े तमाम विधेयक अंग्रेज़ी अनुवाद के साथ भेजे गए थे. इसके बावजूद कई महत्वपूर्ण विधेयक राज्यपाल की स्वीकृति का इंतज़ार कर रहे हैं. इनमें मॉब लिंचिंग निवारण विधेयक भी शामिल हैं. इस विधेयक को रमेश बैस ने अपने कार्यकाल के दौरान लौटा दिया था. सरकार अब इसे दोबारा भेजने की तैयारी कर रही है.
राज्यपाल ने मंत्री को किया तलब
यहाँ राज्यपाल रहे महाराष्ट्र के मौजूदा राज्यपाल रमेश बैस ने तो एक दफा झारखंड के कृषि मंत्री बादल पत्रलेख को राजभवन तलब कर एक विधेयक पर उनसे बातचीत की. यह पहला मौका था जब राज्यपाल किसी विधेयक को लेकर मंत्री को राजभवन बुला लें.
अपने कार्यकाल के दौरान रमेश बैस ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरन की विधानसभा सदस्यता को लेकर चुनाव आयोग के एक रहस्यमय पत्र को लेकर भी मीडिया में राजनीतिक टिप्पणियाँ भी कीं. हालाँकि, उस पत्र का मज़मून अभी तक रहस्य बना हुआ है. राजभवन अब उसपर कोई टिप्पणी नहीं करता.
रमेश बैस अपने कार्यकाल के दौरान राँची के एक मल्टीप्लेक्स में 'कश्मीर फाइल्स' देखने गए. इस दौरान मॉल के मालिक कारोबारी विष्णु अग्रवाल के साथ सिनेमा हॉल में बैठी उनकी एक तस्वीर भी मीडिया में चर्चा में रही. उसी विष्णु अग्रवाल को बाद के दिनों में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने मनी लाउंड्रिंग के एक मामले में गिरफ़्तार कर लिया. वे इन दिनों जेल में हैं.
इस बीच राष्ट्रपति ने रमेश बैस को समय से पहले ही यहाँ से हटाकर महाराष्ट्र का राज्यपाल नियुक्त कर दिया. इसके बाद सीपी राधाकृष्णन झारखंड के राज्यपाल नियुक्त किए गए. लेकिन, नए राज्यपाल भी विधानसभा द्वारा बहुमत से पारित विधेयकों को लौटाने और उन्हें रोके रखने का सिलसिला नहीं तोड़ पाए. अलबत्ता झारखंड के विभिन्न ज़िलों के भ्रमण के दौरान नए राज्यपाल द्वारा सिर्फ़ केंद्र सरकार की योजनाओं की तारीफ किए जाने को लेकर झारखंड मुक्ति मोर्चा ने राज्यपाल पर टिप्पणियाँ भी कीं. जेएमएम ने कहा कि राज्यपाल को किसी पार्टी के प्रवक्ता की तरह काम नहीं करना चाहिए.
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इन विधेयकों में क्या है
राज्यपाल की मंज़ूरी नहीं मिलने के कारण अधर में लटके विधेयकों में से कुछ वैसे भी हैं, जिन्हें लागू कराने का वादा कर झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) सत्ता में आई थी. मॉब लिंचिंग निवारण विधेयक, 1932 के खतियान आधारित डोमिसाइल संबंधित विधेयक और ओबीसी आरक्षण बढ़ाने संबंधित विधेयक ऐसे ही कुछ विधेयक हैं, जो या तो सत्तारूढ़ जेएमएम के घोषणा पत्र में थे, या फिर अपने चुनावी भाषणों में पार्टी नेताओं ने इसका वादा किया था.
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की टिप्पणी
ऐसे में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पिछले दिनों की गई यह टिप्पणी काबिल-ए-गौर है. ''झारखंड की जनता ने राज्य में जो सरकार बनाई है, विधेयक उसी सरकार के ज़रिए विधानसभा से पारित कराए गए हैं. ये विधेयक कैसे कानून सम्मत नहीं हो सकते हैं. झारखंड की माँग होती रही, पर इसे बनाने में 40 साल लग गए. झारखंड के मूलवासियों को सत्ता हासिल करने में 20 साल लग गए. झारखंड के साथ हमेशा छल हुआ. मूलवासी अब चुप नहीं बैठेंगे. अपना हक लेकर रहेंगे.''
छत्तीसगढ़ में सरकार बदलने से क्या कम होगा टकराव?
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आलोक प्रकाश पुतुल, रायपुर
छत्तीसगढ़ में अब भारतीय जनता पार्टी की सरकार बन चुकी है, ऐसे में उम्मीद तो यही है कि आने वाले दिनों में राज्य में सरकार और राज्यपाल के बीच टकराव देखने को नहीं मिलेगा.
लेकिन पिछली सरकार के दौरान दोनों का आपसी विवाद कई बार देखने को मिला. इस तनातनी के चलते ही आरक्षण का क़ानून लागू नहीं हो पाया. किसानों की सुरक्षा से संबंधित विधेयक भी अटका रहा.
गौरतलब है कि तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि और पंजाब के राज्यपाल बनवारीलाल पुरोहित से संबंधित मामलों की सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि राज्य का निर्वाचित प्रमुख नहीं होने के नाते, राज्यपाल विधानसभा सत्र की वैधता पर संदेह नहीं कर सकते या सदन द्वारा पारित विधेयकों पर अपने फैसले को अनिश्चित काल तक रोक नहीं सकते.
अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत, जब कोई विधेयक राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, तो वह या तो घोषणा करेगा कि वह विधेयक पर सहमति देता है या सहमति नहीं देता है, या वह विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखता है. लेकिन ऐसे विधेयक को अनिश्चितकाल के लिए दबा कर नहीं रखा जा सकता.'
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कांग्रेस के आरोप
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी के मीडिया प्रमुख सुशील आनंद शुक्ला ने बीबीसी से कहा, ''छत्तीसगढ़ में विधानसभा से पारित अधिकांश विधेयकों को केवल राजनीतिक कारणों से आज तक राज्यपाल ने लटका रखा था.''
2012 में छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार ने आरक्षण का दायरा 50 फ़ीसदी से 58 फ़ीसदी कर दिया था. वहीं 2018 में आई भूपेश बघेल की सरकार ने आरक्षण का दायरा बढ़ा कर 82 फ़ीसदी कर दिया. लेकिन छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भूपेश बघेल सरकार के आरक्षण की व्यवस्था पर रोक लगा दिया.
पिछले साल 19 सितंबर को हाईकोर्ट ने रमन सिंह के शासनकाल में लागू आरक्षण व्यवस्था को 'असंवैधानिक' बताते हुए, इसे भी रद्द कर दिया.
हालत ये हो गई कि छत्तीसगढ़ में आरक्षण का कोई रोस्टर ही लागू ही नहीं रहा. कॉलेजों में प्रवेश परीक्षा अटक गए, नियुक्तियां अटक गईं और पदोन्नति भी.
पिछले साल दिसंबर में छत्तीसगढ़ विधानसभा ने लोक सेवा और प्रवेश के लिए, देश में सबसे ज़्यादा 76 फ़ीसदी आरक्षण का विधेयक पारित किया और उसे हस्ताक्षर के लिए तब की राज्यपाल अनूसुइया उइके को भेज दिया. लेकिन राज्यपाल ने इस विधेयक पर हस्ताक्षर करने के बजाय राज्य सरकार से आरक्षण के इस दायरे को बढ़ाए जाने को लेकर सवाल-जवाब शुरू कर दिया.
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राज्यपाल और मुख्यमंत्री में टकराव
राज्य के मुख्यमंत्री रहे भूपेश बघेल का आरोप है कि राज्यपाल को विधानसभा से पारित क़ानून पर सवाल-जवाब करने का अधिकार नहीं है. या तो वो इस विधेयक पर हस्ताक्षर करें या इस वापस करें. लेकिन अनूसुइया उइके ने इस साल फरवरी तक इस आरक्षण विधेयक पर हस्ताक्षर नहीं किया. यहां तक कि उनके बाद बनाए गए राज्यपाल विश्वभूषण हरिचंदन ने भी इस पर हस्ताक्षर नहीं किया है.
इसी तरह जब केंद्र सरकार ने तीन नए कृषि क़ानून लाए तो 23 अक्टूबर 2020 को छत्तीसगढ़ सरकार ने कृषि उपज मंडी अधिनियम को संशोधित करते हुए विधेयक पारित किया.
यह विधेयक भले केंद्र के कृषि क़ानून से कोई छेड़छाड़ नहीं कर रहा था लेकिन यह केंद्र के कृषि क़ानूनों को निष्प्रभावी करने वाला विधेयक था. इस विधेयक में मंडी की परिभाषा में डीम्ड मंडी को भी रखा गया था. सरकार ने निजी मंडियों को डीम्ड मंडी घोषित करने का फ़ैसला किया था. यह विधेयक तीन साल से भी अधिक समय से राजभवन में पड़ा रहा.
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साल 2020 में राज्य के कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय और सुंदरलाल शर्मा विश्वविद्यालय में जब राज्य सरकार की इच्छा के अनुरूप कुलपतियों की नियुक्ति नहीं हो पाई तो राज्य सरकार ने विश्वविद्यालय संशोधन विधेयक पारित किया.
मार्च 2020 में पारित इस विधेयक के अनुसार, राज्य सरकार जिस नाम की अनुशंसा करेगी, उसे कुलपति नियुक्ति किया जाएगा. इसके अलावा कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय का नाम छत्तीसगढ़ के पत्रकार और सांसद चंदूलाल चंद्राकर के नाम पर रखने का फ़ैसला किया गया था. लेकिन राज्यपाल ने इस विधेयक पर हस्ताक्षर ही नहीं किया.
उम्मीद है कि अब सत्ता परिवर्तन के बाद इन टकरावों का दौर समाप्त होगा और छत्तीसगढ़ में बरसों से लंबित विधेयकों के दिन फिरेंगे.
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