आशा भोसले को भारत और पाकिस्तान में नहीं बांटा जा सकता-हनीफ़ का व्लॉग

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इमेज कैप्शन, पाकिस्तान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी ने नोटिस भेजे हैं कि आशा जी के जाने की ख़बर के साथ-साथ उनके गाने क्यों चलाए गए
    • Author, मोहम्मद हनीफ़
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार और लेखक
  • पढ़ने का समय: 4 मिनट

बाबू और ब्यूरोक्रेट्स, चाहे वे कहीं से भी हों, काफ़ी पढ़े-लिखे होते हैं और थोड़े चालाक भी होते हैं. क़ानून की किताब से कोई बारीक सी बात निकालकर उसके पीछे पड़ जाते हैं.

उन्हें अपनी गलियों और मोहल्लों में हंसती-खेलती और कभी-कभी रोती ज़िंदगी नज़र ही नहीं आती है.

वे अपने हाथ से लिखे क़ानून को भगवान का आदेश मानने लगते हैं.

भारत में आशा भोसले गुज़र गई हैं. 92 साल की उम्र में उनका देहांत हुआ है. वह अपनी ज़िंदगी का पूरा आनंद लेकर गई हैं और कोई चार पीढ़ियों के लोग उनके गाए हुए गाने सुनते रहे हैं.

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इधर पाकिस्तान में ख़बरें चलीं कि पेमरा (पाकिस्तान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी) के बाबुओं ने नोटिस भेजे हैं कि आशा जी के जाने की ख़बर के साथ-साथ उनके गाने क्यों चलाए गए हैं.

अब पाकिस्तानी संस्थाओं की हरकतें देखकर गुस्सा नहीं आता लेकिन यह सुनकर सच में अंदर से निकला है, "ओए पेमरा वालों तुम कौन लोग हो?"

पाकिस्तान में बॉलीवुड का जुनून

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इमेज कैप्शन, मोहम्मद हनीफ़ के अनुसार, पहले मुंबई में रिलीज़ फ़िल्म का प्रिंट चार घंटे में कराची में मिल जाता था

इंडिया-पाकिस्तान में एक-दूसरे की फ़िल्मों और गानों पर बैन है.

वैसे तो बैन किताबों पर भी है, लेकिन ज़ाहिर है लोग किताबें कम पढ़ते हैं.

लेकिन गानों और फ़िल्मों को न कोई जंग रोक पाई है और न ही कोई बॉर्डर.

हमारे बुजुर्ग छतों पर चढ़कर, दूरदर्शन का सिग्नल पकड़कर 'मुगल-ए-आज़म' फिल्म देखने के लिए एंटेना घुमाते थे.

उसके बाद वीसीआर किराए पर लेकर 'उमराव जान अदा' देखते रहे हैं.

हमने वो ज़माना भी देखा है, जब वहां मुंबई में कोई फ़िल्म रिलीज़ होती, चार घंटे बाद उसका कैमरा प्रिंट डीवीडी में कराची में मिल जाता था.

अगर किसी को मास्टर प्रिंट चाहिए होता था तो उसे कहा जाता कि तुम दो दिन इंतज़ार कर लो.

अब डिजिटल ज़माना है. किसी दुकान पर, किसी बाज़ार जाने की या किसी स्मगलिंग में जाने की ज़रूरत नहीं है.

अपने फ़ोन पर, कंप्यूटर पर पाकिस्तान में बैठे लोग 'धुरंधर' देख भी रहे हैं और साथ ही उसमें ग़लतियां निकाल रहे हैं.

यह पेमरा के बाबू पता नहीं किस पाकिस्तान में पले-बढ़े हैं, वे तो आशा भोसले के गानों के लिए क़ानून की किताब खोलकर बैठ गए हैं.

आशा के गानों में बांटने वाली बात नहीं

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इमेज कैप्शन, आशा भोसले ने तब गाना शुरू किया था जब भारत और पाकिस्तान बना भी नहीं था
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आशा के गाने तो हमारे नाना-दादा भी सुनते रहे हैं , हमारे माता-पिता ने भी उन्हें गाया है और बच्चों को भी याद है.

शादियों में बैंड वाले ये गाने बजा लेते हैं. खुशी से लेकर जनाज़े/अंतिम संस्कार तक, हर मौके के लिए आशा का एक गाना मौजूद है.

'पिया अब तो तू आजा' गाने पर लोग नाचते रहे हैं, 'दम मारो दम' पर मस्ती करते रहे हैं.

किसकी ज़िंदगी में ऐसा समय नहीं आया, जब उसने यह न सोचा हो, 'ये क्या जगह है दोस्तो, ये कौन सा दयार है.'

हमारी पूरी एक पीढ़ी दिल तुड़वा कर, तकिए में सिर छिपाकर रोती रही है और यह पूछती रही है, "मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है."

हर मूड के लिए, हर फीलिंग के लिए, हर डांसर के लिए, हर रोने वाले के लिए, हर सोचने वाले के लिए... आशा भोसले का कोई न कोई एक गाना मौजूद है.

उन्होंने 12 हज़ार से ज़्यादा गाने गाकर इस दुनिया को अलविदा कहा है और वो भी 20 से ज़्यादा भाषाओं में. युद्धों और झगड़ों के बावजूद, कई पाकिस्तानी गायकों के साथ भी उन्होंने गाने गाए हैं.

आशा भोसले इंडिया-पाकिस्तान में बांटने वाली बात नहीं हैं.

पता नहीं पेमरा के बाबुओं को किसी ने बताया है या नहीं कि आशा ने तब गाना शुरू किया था जब बंटवारा नहीं हुआ था, उस समय इंडिया और पाकिस्तान बने भी नहीं थे.

इन बाबुओं को कोई यह बात समझाए कि एक दिन आपने रिटायर होकर घर बैठ जाना है.

तब आपको जवानी याद आएगी और तब वहीं बैठकर आपने यही गाना है... 'इन आँखों की मस्ती के मस्ताने हज़ारों हैं.'

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