मुज़फ़्फ़रनगरः ढाबों से हटाए गए मुसलमान कर्मचारी, क्या कह रहे हैं स्थानीय दुकानदार, कांवड़िये और प्रशासन- ग्राउंड रिपोर्ट

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इमेज कैप्शन, मुज़फ़्फ़नगर में दुकानदारों ने अपनी दुकानों के बाहर नाम वाले बोर्ड लगाए हैं
    • Author, दिलनवाज़ पाशा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मुज़फ़्फ़रनगर से
  • पढ़ने का समय: 14 मिनट

मुज़फ़्फ़रनगर के पास बझेड़ी बागोंवाली बाइपास, जो हरिद्वार की तरफ़ जाता है.

यहां पर है पंजाबी ढाबा, जिसे मुसलमान और हिंदू मालिक मिलकर चला रहे हैं.

अब इस ढाबे पर प्रोपराइटर (मालिक) के अलावा यहां काम करने वालों के नाम भी लिखे हुए हैं.

यहां काम करने वाले एकमात्र मुसलमान कर्मचारी शाहरुख़ को अब हटा दिया गया है.

ढाबे के मैनेजर प्रवीण कहते हैं, "अब यहां सिर्फ हिंदू कर्मचारी हैं. जब विवाद बढ़ा तो शाहरुख़ ख़ुद ये कहकर काम छोड़कर चले गए कि मेरी वजह से दूसरे काम करने वालों या ढाबा मालिकों को दिक़्क़त ना हो."

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर में प्रशासन ने आदेश जारी किया है कि कांवड़ यात्रा के दौरान खाद्य पदार्थों से जुड़ी दुकानों (जैसे ढाबा, रेस्तरां, फल और मिठाई की दुकानें वगैरह) के मालिकों को अपना और अपने यहां काम करने वाले कर्मचारियों का नाम दुकान पर साफ़ और बड़े अक्षरों में लिखना होगा.

हालांकि बाद में पुलिस ने ये भी कहा कि लोगों को 'स्वेच्छा' से ऐसा करने के लिए कहा गया है.

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इमेज कैप्शन, मुज़फ़्फ़नगर से गुजरते कांवड़िए.

पुलिस के मुताबिक़, कांवड़ यात्रा एक धार्मिक आयोजन है और इस दौरान किसी भी तरह की 'भ्रम' की स्थिति ना हो, लोगों को ये ना लगे कि उनकी धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं, इस कारण ये फ़ैसला लिया गया.

लेकिन इलाक़े की दुकानों के मालिकों को लगता है कि ये आदेश मुसलमानों को 'अलग-थलग करने का प्रयास' है.

इस आदेश का एक और असर ये नज़र आता है कि अब रोड किनारे खुले अधिकतर होटलों और ढाबों पर कोई मुसलमान काम करने वाला नहीं है.

कुछ ने नौकरी छोड़ दी है, कुछ को हटा दिया गया है जबकि कुछ मालिकों का तर्क है कि 'सिर्फ सावन महीने के लिए एहतियातन ऐसा किया गया है.'

लेकिन पुलिस दावा कर रही है कि ना तो पुलिस किसी दुकान पर गई और ना ही किसी दुकान वाले को वहां काम करने वाले मुसलमान कर्मचारी को निकालने के लिए मजबूर किया गया.

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क्या है पूरा मामला?

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इमेज कैप्शन, स्थानीय लोगों ने दुकानों, ढाबों के साथ-साथ ठेले पर नाम लिख लिए हैं

सावन के महीने में हर साल लाखों कांवड़िये हरिद्वार से जल लेकर लौटते वक़्त मुज़फ़्फ़रनगर से होकर गुज़रते हैं.

पुलिस का तर्क है क़ानून व्यवस्था की स्थिति ख़राब ना हो, इस वजह से दुकान मालिकों से अपना और अपने कर्मचारियों का नाम दुकान के बाहर लिखने को कहा गया है.

पुलिस के इस आदेश के बाद यहां के अधिकतर मुसलमान दुकानदारों ने बड़े-बड़े अक्षरों में दुकान मालिकों और काम करने वालों के नाम अंकित कर दिए हैं.

कई दुकानदार कहते हैं कि उन्होंने स्वेच्छा से ऐसा किया लेकिन कई ने दावा किया कि पुलिस ने उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर किया है.

हरिद्वार से आने वाला मुख्य मार्ग मदीना चौक होते हुए मुज़फ़्फ़रनगर में दाख़िल होता है.

यहां अब लगभग हर दुकान के बाहर सफेद बोर्डों पर बड़े-बड़े लाल अक्षरों में मुसलमान दुकान मालिकों के नाम लिखे हैं.

दिल्ली से हरिद्वार जाने वाले हाइवे, शहर के अन्य इलाक़े और मार्गों पर भी ऐसा ही है.

मुज़फ़्फ़रनगर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अभिषेक सिंह ने कहा है कि दुकानदारों से स्वेच्छा से नाम प्रदर्शित करने के लिए कहा गया है.

ज़मीनी सच्चाई

इमेज कैप्शन, मालिक के नाम के साथ चाय की दुकान.
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लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और ही नज़र आती है.

खतौली में पिछले दस साल से 'लवर्स टी प्वाइंट' के नाम से चल रही चाय की दुकान का नाम अब 'वकील साब चाय' हो गया है.

दुकान के संचालक वकील अहमद दावा करते हैं कि इसके बावजूद पुलिस को आपत्ति थी.

वो कहते हैं, "पुलिस के कहने पर जब मैंने अपनी दुकान का नाम बदलकर वकील साब कर लिया तो पुलिसकर्मी मेरे पास फिर आए और कहा कि इस नाम से तुम्हारे मुसलमान होने का तो पता ही नहीं चल रहा है. उन्होंने मुझे वकील अहमद नाम का एक और बड़ा साइनबोर्ड लगाने के लिए मजबूर किया."

वकील को अपनी दुकान का दस साल पुराना नाम बदलने पर अफ़सोस है.

वो कहते हैं, "ये स्पष्ट रूप से मुसलमानों को अलग-थलग करने और धार्मिक भेदभाव बढ़ाने का प्रयास है. लेकिन हमें कारोबार करना है, प्रशासन के सामने हम कर भी क्या सकते हैं."

मुज़फ़्फ़रनगर के ही भंगेला गांव में हाइवे पर चाय की दुकान लगाने वाले आसिफ़ का दावा है कि जब उन्होंने साइनबोर्ड नहीं लगाया तो पुलिस उन्हें 'ज़बरदस्ती उठाकर थाने ले गई और जेल तक भेजने की धमकी दी.'

आसिफ़ कहते हैं, "स्थानीय सांसद हरेंद्र मलिक के हस्तक्षेप के बाद मुझे थाने से छोड़ा गया. लेकिन छोड़ने से पहले पुलिस ने मेरी दुकान पर भी मेरे नाम का बड़ा बैनर लगवा दिया."

'मुसलमान कर्मचारियों को हटाने की हिदायत'

कई और ढाबों के मालिक ये दावा करते हैं कि पुलिस की टीमें उनके ढाबों पर आई थीं और मुसलमान कर्मचारियों को हटाने के लिए कहा था.

इस ढाबे के पास एक और ढाबे के हिंदू मालिक कहते हैं, "कुछ दिन पहले पुलिस आई थी और पूछा था कि कोई मुसलमान तो काम नहीं करता है, मैंने कहा मेरे पास कोई नहीं है तो पुलिस ये हिदायत देकर चली गई कि किसी मुसलमान को काम पर मत रखना."

इस ढाबे के संचालक पहले मुसलमान थे. लेकिन पिछले साल विवाद के बाद उन्होंने अपना ढाबा बंद कर दिया. अब एक हिंदू मालिक इसे चला रहे हैं.

अब नए हिंदू मालिक कहते हैं, "जो मुसलमान हैं, उनके काम पर फर्क पड़ा है. हम जैसे जो हिंदू मालिक हैं, उनका काम तो चल ही रहा है."

अपने ढाबे से मैनेजर समेत चार मुसलमान कर्मचारियों को हटाने वाले एक मालिक कहते हैं, "आप हमारी स्थिति समझिए. हम कोई विवाद नहीं चाहते हैं."

क्या कह रही है पुलिस

मुज़फ़्फ़रनगर के एसएसपी अभिषेक सिंह ने इन आरोपों पर जवाब नहीं दिया.

उन्होंने कहा है, "पुलिस ने एक बयान जारी किया है, इसके अलावा हमें कुछ नहीं कहना है."

वहीं, शहर के खतौली इलाके, जहां कई दुकान मालिकों ने आरोप लगाया कि उनकी दुकान से जबरन मुसलमान कर्मचारियों को हटाने को कहा गया, वहां के एसएचओ ने कहा, "पुलिस किसी दुकान या ढाबे पर नहीं गई है और ना ही किसी को मुसलमान कर्मचारियों को हटाने पर मजबूर किया गया."

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कैसे शुरू हुआ ये विवाद

होटल संचालकों का नाम रखने का ये विवाद पिछले साल शुरू हुआ था जब स्थानीय हिंदूवादी धर्मगुरु स्वामी यशवीर ने हिंदू-देवी देवताओं के नाम पर चल रहे मुसलमान मालिकों के ढाबों को बंद कराने की मांग को लेकर अपनी मुहिम शुरू की थी.

स्वामी यशवीर की मुहिम के बाद कई ऐसे होटलों पर प्रशासन सख़्त हुआ जिनके नाम हिंदू थे लेकिन मालिक मुसलमान.

ये अभियान चला रहे स्वामी यशवीर कहते हैं, "मुसलमान भोजन को अशुद्ध और अपवित्र करते हैं ताकि हिंदुओं की आस्था से खिलवाड़ हो सके. हमने पिछले साल आवाज़ उठाई तो मुसलमानों के ढाबे बंद हुए. इस बार हमने प्रशासन से कहा कि हमें मुसलमानों से दिक़्क़त नहीं है, बस वो अपना नाम मोटे अक्षरों में लिखें ताकि हिंदू यात्री सोच समझकर उनके प्रतिष्ठानों पर रुकें."

इस मुहिम से समाज में भेदभाव भी पैदा हो सकता है, इस सवाल पर यशवीर कहते हैं, "ये हिंदुओं का अधिकार है कि वो जिस दुकान में खाने जा रहे हैं, उसके मालिक का नाम उन्हें पता हो. प्रशासन ने हमारी मांग पर ये सुनिश्चित कर दिया है. हम चाहते हैं कि समूचे उत्तर प्रदेश और भारत में ऐसा किया जाए ताकि खाद्य सामग्री की दुकानें चलाने वालों का नाम सार्वजनिक हो."

यशवीर दावा करते हैं कि वो मुसलमान कारोबारियों के ख़िलाफ़ नहीं हैं.

वो कहते हैं, "कांवड़ यात्रियों को ये पता चलना ही चाहिए कि वो सामान किससे ख़रीद रहे हैं."

यशवीर कहते हैं, "अगर हिंदुओं के मुसलमानों की दुकानों में ना जाने से उनका रोज़गार प्रभावित हो रहा है तो हो, हमें उनका रोज़गार नहीं देखना है, अपने धर्म की पवित्रता देखनी हैं."

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इमेज कैप्शन, वसीम अहमद दावा करते हैं कि उन्हें मजबूरन अपना ढाबा बेचना पड़ा

बझेड़ी गांव के रहने वाले वसीम अहमद पिछले नौ सालों से गणपति ढाबा चला रहे थे. लेकिन पिछले साल के विवाद के बाद उन्होंने अपना ढाबा बेच दिया.

वो कहते हैं, "मेरा नाम वसीम अहमद है. आजकल कुछ लोग अपनी राजनीति और एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए, चर्चा में आने के लिए हमारे जैसे लोगों के ख़िलाफ़ प्रोपेगैंडा चला रहे हैं. मैं 2014 से गणपति ढाबा चला रहा था. पिछले साल पुलिस टीम मेरे पास आई और मेरा नाम पूछने के बाद कहा- तुम्हें ढाबे का नाम गणपति रखने का अधिकार किसने दिया? मैंने कहा कि देश के संविधान ने मुझे कारोबार करने का अधिकार दिया है."

वसीम अहमद दावा करते हैं कि सोशल मीडिया पर उनके ढाबे को बदनाम करने की मुहिम छेड़ दी गई जिसके बाद उन्हें मजबूरन अपना ढाबा बेचना पड़ा.

जो मुसलमान ढाबा मालिक हिंदू पार्टनर के साथ मिलकर ढाबा चला रहे हैं उन्हें भी आर्थिक नुक़सान उठाना पड़ रहा है.

पंजाब तड़का ढाबा के मालिक नाज़िम त्यागी कहते हैं, "पिछले साल विवाद के बाद भारी नुक़सान हुआ, सोचा था इसे रिकवर करेंगे, अब ये नया फ़रमान आ गया है."

नाज़िम त्यागी कहते हैं, "हमारे ढाबे पर कोई धार्मिक चिह्न नहीं है. लेकिन कई बार ग्राहकों को जब पता चलता है कि मालिक मुसलमान भी है, तो वो टेबल पर बैठने के बाद उठकर चले जाते हैं. पहले बुरा लगता था लेकिन अब सोच कर सब्र कर लिया है, जिसे जहां खाना है वो वहां खाएगा और जो हमारे हिस्से है, वही हमें मिलेगा."

क्या कह रहे हैं कांवड़िये

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इमेज कैप्शन, हिमांशु कहते हैं कि वो पिछले 18 साल से कांवड़ उठा रहे हैं और जीवन भर ये करते रहेंगे

कांवड़ यात्रा 22 जुलाई से शुरू होगी. लेकिन लंबी दूरी तक कांवड़ ले जाने वाले या भारी कांवड़ ले जाने वाले कांवड़ यात्रियों ने चलना शुरू कर दिया है.

आकाश भोला दो सौ किलो की कांवड़ लेकर चल रहे हैं. उनके साथ चल रहे विशाल सौ किलो की कांवड़ उठा रहे हैं. वो चंद क़दम चलकर रुक जाते हैं.

आकाश कहते हैं, "परिवार में सुख शांति के लिए इतना भारी कांवड़ उठा रहे हैं."

नाम को लेकर विवाद पर विशाल कहते हैं, "हमें इससे फर्क नहीं पड़ता कि दुकान हिंदू की है या मुसलमान की. यहां सभी भोलों का सम्मान करते हैं. सामान ख़रीदते वक़्त हम किसी का नाम तो नहीं ही देखेंगे. ये हिंदू-मुसलमान की बात सिर्फ़ राजनीति के लिए हैं. क्या कोई बता सकता है कि कौन सा ख़ून हिंदू का है और कौन सा मुसलमान का."

पिछले 18 साल से कांवड़ उठा रहे हिमांशु 47 किलो वजन की कांवड़ उठाकर चल रहे हैं. वो बोल बम कहकर आगे बढ़ रहे हैं.

हिमांशु कहते हैं, "मैं 18 साल से कांवड़ उठा रहा हूं और जीवन भर ये करता रहूंगा. कांवड़ लेकर घर पहुंचता हूं तो मन को शांति मिलती है."

नाम को लेकर विवाद पर हिमांशु कहते हैं, "कांवड़ हमारे लिए बहुत पवित्र है, बस हम ये चाहते हैं कि हमारी आस्था से खिलवाड़ ना हो. साफ़-सफ़ाई हो. किसी मुसलमान से मुझे कोई परेशानी नहीं हैं. किसी मुसलमान की दुकान का सामान मन को भाएगा तो मैं ख़रीदूंगा, ऐसे करने से मेरी कांवड़ खंडित नहीं होगी. रास्ते में कई मुसलमान जय शंकर की बोलते हैं तो बहुत अच्छा लगता है."

कांवड़ मार्ग पर एक समूह को साथ लेकर चल रहे कांवड़ यात्री सोनू शर्मा कहते हैं, "ना किसी को हमसे परेशानी है और ना हमें किसी से. हम पवित्र भाव से कांवड़ लेकर निकले हैं. ये सब जो हो रहा है, इसके पीछे राजनीति है, मैं मानता हूं आम लोगों को इस सबमें नहीं पड़ना चाहिए."

बझेड़ी बाइपास पर राशिद एक टपरी में चाय की दुकान चला रहे हैं. उनके पास बैनर बनवाने के पैसे नहीं थे तो उन्होंने सफेद चार्ट पर हाथ से बड़ा-बड़ा अपना नाम लिख दिया है.

राशिद इस झोपड़ी में अपने परिवार के साथ रहते हैं. उनकी दुकान पर दर्जन भर कांवड़ यात्री रुककर चाय पी रहे हैं.

राशिद कहते हैं, "मैं 12 साल की उम्र से भोलों की सेवा करते आया हूं. मुझे अच्छा लगता है. मेरे पास रुकने से किसी को दिक़्क़त नहीं हैं."

सोनीपत कांवड़ लेकर जा रहे दीपक शर्मा अपने समूह के साथ यहां रुके हैं. वो कहते हैं, "हम धर्म के काम में लगे हुए हैं. हमारे मन में कोई भेदभाव नहीं हैं. समाज में भेदभाव ख़त्म करना ही तो धर्म है. अगर हम हिंदू-मुसलमान में फ़र्क करेंगे तो फिर हमारा धर्म क्या रह जाएगा?"

'माहौल ख़राब करने की कोशिश'

मुज़फ़्फ़रनगर में हर साल कांवड़ यात्रियों के लिए कैंप लगाने वाली 'पैग़ाम-ए-इंसानियत' संस्था इस बार कैंप नहीं लगाएगी.

संस्था के अध्यक्ष आसिफ़ राही कहते हैं, "हम हर साल कैंप लगाकर भोलों की सेवा करते थे, लेकिन इस बार एहतियातन कैंप नहीं लगा रहे हैं. दूर-दूर से आने वाले कांवड़ यात्री हमारे कैंप में रुकते थे. उन्हें पता था कि हम मुसलमान हैं, फिर भी वो हमारे पास रुकते थे, हमारी मोहब्बत को आगे फैलाते थे, लेकिन इस बार माहौल अलग है. हमारे मन में कई अंदेशे हैं."

राही आगे कहते हैं, "ये दंगे झेल चुके मुज़फ़्फ़रनगर की बदक़िस्मती है कि यहीं से समाज को बांटने वाली ये नई शुरुआत हुई है. गंगा जमुनी तहज़ीब को ख़त्म किया जा रहा है. ये ख़रीदने वाले की पसंद है कि वो राम चाट भंडार से चाट खाए और आरिफ़ से फल ख़रीदे, लेकिन लगता है कुछ ताक़तें अब लोगों की इस पसंद पर चोट करना चाहती हैं. इस नई परंपरा के परिणाम समाज के लिए ठीक नहीं होंगे.”

(मुजफ़्फ़रनगर से स्थानीय पत्रकार अमित सैनी के सहयोग से)

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