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महिला आरक्षण लागू करने में आ सकती हैं ये अड़चनें
- Author, दिव्या आर्य
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
महिलाओं की शक्ति, समझ और नेतृत्व, जिसे दशकों तक भारतीय राजनीति में जगह नहीं मिली, उसको पूजन योग्य बताते हुए सरकार ने 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' का प्रस्ताव लोकसभा में पेश किया है.
लेकिन क़ानून बनाने और नारी शक्ति के वंदन के अमल में सरकार का ही नहीं, राजनीतिक पार्टियों का इम्तिहान होगा.
काम के अन्य क्षेत्रों की ही तरह, राजनीति भी पुरुष प्रधान रही है. आरक्षण के ज़रिए महिलाओं के राजनीति में आने को समर्थन देने से राजनेता बार-बार पीछे हटे हैं.
साल 1992 में पंचायत के स्तर पर 33 प्रतिशत आरक्षण का क़ानून बनाए जाने के बावजूद यही आरक्षण संसद और विधानसभाओं में लाने के प्रस्ताव पर आम राय बनाने में तीन दशक से ज़्यादा लग गए हैं.
महिलाओं को आरक्षण ना देने के तर्क में सबसे आगे उनकी कम राजनीतिक समझ बताया जाता रहा है.
इसी के चलते पंचायत के स्तर पर आरक्षण देने के बावजूद सरपंच चुनी गई औरतों का कागज़ों पर नाम तो रहा, लेकिन उनके पति ही उनका काम करते रहे. इन्हें 'सरपंच-पति' का उपनाम तक दे दिया गया.
क्या उसी तरह अब सांसद-पति या विधायक-पति देखने को मिलेंगे?
सांसद-पति, विधायक-पति
राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष और भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता रहीं ललिता कुमारमंगलम के मुताबिक़ 'महिलाओं के अयोग्य' होने का बहाना पुरुष उन्हें रोकने के लिए अपनाते रहे हैं.
ऐसे में कड़े आदेश के अलावा कोई चारा नहीं है.
बीबीसी से उन्होंने कहा, ''जब पार्टी के स्ट्रांग नेता, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ़ से संदेश जाएगा तो सभी पुरुषों को समर्थन देना ही होगा.''
वहीं तृणमूल कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता सुष्मिता देव मानती हैं कि पंचायतों में आरक्षण के अनुभव से सीख लेने की ज़रूरत है.
जब औरतों के लिए पंचायतों में जाने का रास्ता खोला गया तब उन्हें उसके लिए तैयार नहीं किया गया. इस वजह से उन्हें ओहदे तो मिले, लेकिन ताक़त पुरुषों के पास ही रही.
'इलेक्टिड वुमेन रिप्रेज़ेनटेटिव्स' यानी चुनी हुई महिला प्रतिनिधियों पर शोध करने वाली पुणे के कार्वे इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल सर्विस में एसोसिएट प्रोफेसर रहीं डॉ. नागमणि राव ने पाया कि औरतों का नेतृत्व विकसित करना एक बड़ी चुनौती रहा है.
डॉ. राव के मुताबिक़, महिलाएँ राजनीतिक आंदोलनों में भाग तो लेती हैं, लेकिन राजनीतिक पार्टियों में पुरुषों की तरह भागीदारी नहीं हो पाती.
सांसद के स्तर पर महिलाओं के चुनाव लड़ने के लिए राजनीतिक पार्टियों को भी बदलना होगा.
सुष्मिता देव कहती हैं,''इस वक़्त हर पार्टी को ख़ुद से ये सवाल पूछना चाहिए कि फ़ैसले लेने के उच्च पदों पर हमने कितनी महिलाओं को नियुक्त किया है?''
पंचायत की तरह ही औरतें फिर रबर स्टैम्प बनकर ना रह जाएँ, इसके लिए पार्टियों को उन्हें तजुर्बा हासिल करने के मौक़े और बड़ी ज़िम्मेदारियाँ देनी होंगी.
'लड़की हूं, लड़ सकती हूं'
दो साल पहले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने 40 प्रतिशत टिकट महिलाओं को देने का ऐलान किया. लेकिन इसका फ़ायदा नहीं नुक़सान ही दिखा.
उत्तर प्रदेश की 403 सीटों वाली विधानसभा में सात सीटों पर काबिज़ कांग्रेस चुनाव के बाद पाँच सीटें हार कर दो पर ही सिमट गई.
इनमें से एक पर एक महिला जीतीं- कांग्रेस के राज्य सभा सांसद प्रमोद तिवारी की सीट पर लड़ रहीं उनकी बेटी अराधना मिश्रा. अराधना तीसरी बार विधायक चुन कर आईं.
कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत के मुताबिक़ कुछ फ़ैसले दलगत राजनीति और नफ़ा-नुक़सान से ऊपर होते हैं. महिलाओं को टिकट देने का फ़ैसला वही था.
श्रीनेत ने बीबीसी से कहा, ''इससे एक चर्चा शुरू हुई, बाक़ी राजनीतिक दलों में और कांग्रेस पार्टी के अंदर भी.''
उत्तर प्रदेश में महिला कांग्रेस की उपाध्यक्ष उरूसा राणा उन्नाव ज़िले के पुर्वा विधानसभा क्षेत्र से लड़ीं और हार गईं. लेकिन वे मानती हैं कि उस अनुभव से जो सीखा वो दूसरी बार बेहतर लड़ाई लड़ने में मदद करेगा.
उरूसा ने कहा, ''बड़ी बात है कि कांग्रेस ने पहल की, पर सब टिकट सोच कर नहीं दिए गए थे, तब ऐलान हो गया था तो बात पूरी करने के लिए कई महिलाओं को टिकट दे दिया गया.''
ललिता कुमारमंगलम के मुताबिक़ आरक्षण के लागू होने के बाद पार्टियों को रवैया बदलना पड़ेगा.
उन्होंने कहा, ''सीट पाने के लिए पार्टियाँ अपना पूरा दमख़म महिला उम्मीदवार के पीछे लगा देंगी जिससे उनके जीतने की उम्मीद बढ़ जाएगी.''
क़ानून बनने के बाद भी इंतज़ार
महिला आरक्षण विधेयक को क़ानून बनाने की कवायद पहले भी हुई है.
साल 2010 में कांग्रेस सरकार ने इसे राज्य सभा में पेश किया, लेकिन लोकसभा में समर्थन ना मिल पाने की वजह से कानून नहीं बन पाया.
इस बार ज़्यादातर पार्टियों के महिलाओं को आरक्षण देने का समर्थन करने और बीजेपी के पास विधेयक पारित करने के लिए ज़रूरी बहुमत होने के बावजूद, एक अड़चन जनगणना और डिलिमिटेशन यानी परिसीमन प्रक्रिया है.
प्रस्तावित अधिनियम के तहत आरक्षण अगली परिसीमन प्रक्रिया के बाद ही लागू होगा.
सुष्मिता देव के मुताबिक़ महिला आरक्षण की राह में अभी सिर्फ लड़ाई जीती गई है और बड़ी जंग बाक़ी है.
उन्होंने कहा, ''परिसीमन पर आम राय बनाना एक बड़ी चुनौती होगी, ये प्रक्रिया जनसंख्या के मुताबिक़ सीटें तय करने की है. वो राज्य जो जनसंख्या वृद्धि काबू करने में सफल रहे हैं, उन्हें अपनी सीटें कम किए जाने का डर है.''
कांग्रेस की सुप्रिया श्रीनेत भी परिसीमन की शर्त को बीजेपी की 'नीयत में खोट' का सूचक बताती हैं. लेकिन बीजेपी की राज्य सभा सांसद सरोज पांडे इससे इत्तेफाक़ नहीं रखतीं हैं.
पांडे ने बीबीसी से कहा, ''परिसीमन प्रक्रिया पर संशय नहीं होना चाहिए, उसे टालने या रोकने की भी तो समय सीमा होगी, ये रास्ता बना है और मुझे यक़ीन है कि अपने गंतव्य तक पहुँचेगा.''
इच्छाशक्ति का कड़ा इम्तिहान
हर पार्टी इस वक़्त महिलाओं को बढ़ावा देने का श्रेय लेना चाहती है.
पंचायत स्तर पर आरक्षण देने की पहली कोशिश कांग्रेस के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने की थी.
देश की पहली महिला स्पीकर, पार्टी अध्यक्ष और राष्ट्रपति के पद पर महिला को लाने का फ़ैसला कांग्रेस का था.
तृणमूल कांग्रेस ने साल 2019 के चुनाव में ना सिर्फ़ 40 प्रतिशत टिकट महिलाओं को दिए, उनमें ज़बरदस्त जीत भी दर्ज की.
सुष्मिता देव कहती हैं, ''ममता बनर्जी हमारी पार्टी की पहचान हैं. अब ये उनपर है कि वो अपना प्रभुत्व किस मुद्दे पर लगाएं. उन्होंने वो मिमि चक्रवर्ति, नुसरत जहां समेत कई महिला राजनेताओं पर लगाया ताकि आरक्षण के बिना ही प्रतिनिधित्व बढ़े.''
आरक्षण आने के बाद राजनीति में किन महिलाओं को कैसे अवसर मिलते हैं, इसमें उनके अपने प्रयास के अलावा राजनीतिक पार्टियों की बड़ी भूमिका रहेगी.
पितृसत्ता से दशकों में बनी अड़चनें दूर करने में दावों के साथ इच्छा शक्ति का कड़ा इम्तिहान होगा.
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