'क्वारंटीन' से लेकर 'कोविडियट्स' तक, कोरोना वायरस के लिए हमने नई भाषा क्यों बनाई

    • Author, क्रिस्टीन रो
    • पदनाम, बीबीसी वर्कलाइफ़

चुनौतियों से भरे हालात उन परिस्थितियों को जाहिर करने के नये तरीकों को जन्म देते हैं.

19वीं सदी के लेखक जॉर्ज एलियट उस समय की कठोर लैंगिक और जीवनशैली की पाबंदियों से निराश थे तो उन्होंने पहली बार 'फ्रस्ट्रेटिंग' शब्द का इस्तेमाल किया.

हाल में, ब्रेग्ज़िट ने 'ब्रेमेन' और 'ब्रेग्रेट' जैसे कई नये शब्दों को जन्म दिया. 'बैकस्टॉप' जैसे कई पुराने शब्दों को नये अर्थ मिले.

बर्किंघम सिटी यूनिवर्सिटी के समाज-भाषाशास्त्री रॉबर्ट लॉसन का कहना है कि ब्रेग्ज़िट भले ही सबसे हाल का उदाहरण हो, लेकिन कोविड-19 के कारण भाषायी परिवर्तन की गति अभूतपूर्व है.

लॉसन इसकी कई वजह बताते हैं- तेज़ी से फैलता वायरस, मीडिया में इसकी प्रमुखता और वैश्विक संपर्क, वो भी ऐसे समय जब सोशल मीडिया और दूर के संपर्क अहम हो गए हैं.

वीडियो कैप्शन, दिन में डॉक्टर, रात में रैपर

महामारी के समय

हाल में लोकप्रिय हुए कई शब्द सामाजिक दूरी वाले मानवीय संपर्क से संबंधित हैं, जैसे 'वर्चुअल हैप्पी ऑवर', 'कोवीडियो पार्टी' और 'क्वारंटीन एंड चिल'.

कई लोग 'कोरोना' को उपसर्ग की तरह इस्तेमाल करते हैं, जबकि पोलैंड के लोगों ने 'कोरोनावायरस' को क्रिया में बदल दिया है.

'कोरोनाबेबीज़' शब्द उन बच्चों के लिए बना है जो इस महामारी के समय पैदा हुए या जो इस समय गर्भ में हैं.

कुछ शब्दों के संक्षिप्त नाम भी चल निकले हैं और सर्वव्यापी हो गए हैं, जैसे डब्लूएफएच (वर्क फ्रॉम होम) और पीपीई (पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट).

दूसरे सभी लोगों की तरह शब्दकोश बनाने वाले भी महामारी के कारण आए बदलावों को सहेजने में जूझ रहे हैं.

इमेज स्रोत, Getty Images

नये अर्थ में पुराने शब्द

ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी की सीनियर एडिटर फियोना मैकफर्सन के मुताबिक दिसंबर तक 'कोरोनावायरस' शब्द का इस्तेमाल दस लाख टोकन (शब्दकोश के लिए संग्रह की जाने वाली भाषा की सबसे छोटी इकाई) में सिर्फ़ 0.03 बार हो रहा था.

'कोविड-19' शब्द तो इसी फरवरी में बनाया गया जब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वायरस को आधिकारिक नाम दिया.

लेकिन अप्रैल आते-आते 'कोविड-19' और 'कोरोनावायरस' का इस्तेमाल प्रति दस लाख टोकन में करीब 1750 बार तक पहुंच गया.

इससे यह भी संकेत मिलता है कि ये दोनों शब्द करीब-करीब बराबर इस्तेमाल हो रहे हैं.

अप्रैल में ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में जोड़ने के लिए चुने गए सभी शब्द किसी न किसी तरह इस महामारी से संबंधित हैं.

वीडियो कैप्शन, क्या ग़रीबी कोरोना वायरस को और घातक बना देती है?

'स्टे-एट-होम ऑर्डर'

इनमें 'इन्फोडेमिक' (सूचनाओं की महामारी) और 'एल्बो बंप' (हाथ मिलाने की जगह कोहनी टकराना) भी शामिल हैं.

लेकिन मैकफर्सन मानती हैं कि शब्दकोश में शामिल किया एकमात्र असल शब्द 'कोविड-19' ही है.

बाकी शब्द पहले से मौजूद हैं, लेकिन नये हालात में उनको नया अर्थ मिल गया है.

अलग-अलग देशों के लोग अलग-अलग आदेशों के अधीन हैं- जैसे अमरीका में 'स्टे-एट-होम ऑर्डर', मलेशिया में 'मूवमेंट कट्रोल ऑर्डर' और फिलीपींस में 'एनहांस्ड कम्युनिटी क्वारंटीन'.

वह कहती हैं, "इस समय हम बहुत से ऐसे शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं जो पहले से मौजूद हैं, लेकिन वे शब्द एकदम नये लग रहे हैं. 'कोरोनावायरस' शब्द भी 1960 के दशक का है."

इमेज स्रोत, Getty Images

युद्ध काल के शब्दों से नुकसान!

मैकफर्सन का कहना है कि पहले से मौजूद शब्दों में नया अर्थ डालना कुछ मामलों में हानिकारक भी हो सकता है.

जैसे युद्धकाल के शब्दों- 'बैटल' और 'फ्रंट-लाइन' का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल हो रहा है.

युद्ध की आपात स्थितियों की तरह सोचने से दीर्घकालिक संरचनात्मक बदलाव करने की ज़रूरतों से हमारा ध्यान भटक सकता है.

इससे #रीफ्रेमकोविड परियोजना की शुरुआत हुई है जिमसें भाषाविद युद्धकाल के शब्दों के विकल्प को एकत्र कर रहे हैं.

स्पेन में नवार्रा यूनिवर्सिटी की भाषाविद आइनेस ओल्ज़ा का कहना है कि उन्होंने अचानक ही ट्विटर पर इस परियोजना को शुरू किया.

वीडियो कैप्शन, COVER STORY: क्या वायरस की मैपिंग से खुलेगा राज़?

'प्राकृतिक आपदा' और 'तूफान'

आइनेस ओल्ज़ा युद्धकाल के शब्दों के इस्तेमाल के पीछे के प्रलोभन को समझती हैं, ख़ासकर महामारी की शुरुआत में जब एकता कायम करने और तेज़ी से कदम उठाने की सख़्त ज़रूरत थी.

मगर उनका मानना है कि युद्ध के रूपकों के लगातार इस्तेमाल और विकल्पों की कमी से बेचैनी पैदा हो सकती है और महामारी के बारे में सोच विकृत हो सकती है.

'प्राकृतिक आपदा' और 'तूफान' जैसे शब्दों से ऐसी धारणा बनती है कि यह महामारी होनी ही थी और इसे रोका नहीं जा सकता था.

इससे उन राजनीतिक, आर्थिक और पर्यावरणीय संदर्भों की उपेक्षा हो जाती है जिसमें कुछ लोगों के इस बीमारी की चपेट में आने की आशंका बढ़ती है.

स्वास्थ्य सेवा के कुछ लोगों ने 'हीरो' कहे जाने पर निराशा जाहिर की है. वे ख़ुद को ऐसे भयभीत व्यक्ति के रूप में देखते हैं जो अपनी ड्यूटी कर रहा है. उनको बचाव के उपकरणों और नीतियों की ज़रूरत है, न कि कुर्बानी देनी है.

इमेज स्रोत, TIZIANA FABI/AFP via Getty Images

हंसी-मज़ाक किस तरह मददगार है?

ओल्ज़ा कहती हैं, "वक्ता जो चाहें वे रूपक इस्तेमाल करने के लिए आज़ाद हैं. हम सेंसर नहीं हैं."

लेकिन वह और उनके कुछ साथी भाषाविदों का मानना है कि महामारी पर चर्चा के लिए सैन्य भाषा से अलग वैकल्पिक फ्रेम का होना महत्वपूर्ण है.

गैर-युद्धक शब्दों को ढूंढ़ने में जर्मनी के लोग आगे रहे. उन्होंने लॉकडाउन खोलने को लेकर शुरू हुई अंतहीन बहस के लिए भूले-बिसरे शब्द 'Öffnungsdiskussionsorgien' को ढूंढ़ा जिसका अर्थ होता है "चर्चा की उत्पत्ति".

शब्दकोश के बाहर भाषाई रचनात्मकता का खज़ाना मौजूद है. लॉसन का कहना है कि भाषा के नये-नये प्रयोग से हम दुनिया में जो भी चल रहा है उसको नया नाम देते हैं.

"एक बार आप जब कार्यप्रणालियों, घटनाओं और किसी एक घटना के इर्द-गिर्द बनी सामाजिक स्थितियों को नाम दे देते हैं तो लोगों को एक साझा शब्द-भंडार मिल जाता है, जिसे वे शॉर्टहैंड की तरह इस्तेमाल करते हैं."

वीडियो कैप्शन, कार में बैठकर कॉन्सर्ट का मज़ा

'फ्लैटेन द कर्व'

लॉसन का कहना है, "मुझे लगता है कि जब आप इसे नाम दे सकते हैं तो आप इसके बारे में बातें कर सकते हैं और जब आप इस बारे में बातें कर सकते हैं तो लोगों का इसका सामना करने और मुश्किल हालात को संभालने में मदद मिलती है."

लेखिका करेन रसेल को लगता है कि व्यापक रूप से इस्तेमाल होने वाला शब्द 'फ्लैटेन द कर्व' आश्वस्त करने वाला है.

यह व्यक्तिगत और सामूहिक, दोनों तरह के प्रयासों के महत्व को बताता है और डर को दूर करता है.

कनाडा और भारतीय अंग्रेजी में इस्तेमाल हो रहे शब्द 'caremongering' (मदद की पेशकश) भाषायी और व्यवहार के तौर पर 'scaremongering' (भयभीत करना) का एक बेहतर विकल्प है.

इस तरह के गंभीर शब्दों से हटकर कुछ हल्के-फुल्के शब्द भी बने हैं. जर्मन का 'कोरोनास्पेक' अंग्रेजी के 'कोविड 19' की तरह घर पर रहने के आदेश के बीच तनाव मिटाने से संबंधित है.

वीडियो कैप्शन, कोरोना: रेस्तरां कारोबारियों की मुश्किल

स्पेनिश के 'कोविडियोटा' और 'कोरोनाबरो' शब्द उन लोगों का मज़ाक उड़ाने के लिए बनाए गए जो सार्वजनिक स्वास्थ्य सलाहों की अनदेखी करते हैं (बरो का अर्थ है गधा).

'डूम्सस्क्रॉलिंग' का मतलब है कि इंटरनेट पर लगातार बुरी ख़बरों को पढ़ते जाना.

लॉसन का पसंदीदा शब्द 'ब्लर्सडे' उस अवस्था को बताता है जब कई दिन यूं ही गुजर जाने के बाद समय और तारीख को लेकर हमारी संवेदना कमज़ोर पड़ जाती है.

ऑस्ट्रेलियाई अंग्रेजी में भी हल्के-फुल्के अर्थ वाले संक्षिप्त शब्दों के ख़ूब प्रयोग होता है. वहां क्वारंटीन के लिए 'क्वाज़' और सैनेटाइज़र के लिए 'सैनी' बनाया गया.

इमेज स्रोत, REUTERS/Bruno Kelly

कोरोना या 'मिस रोना'?

अश्वेत समुदाय अक्सर भाषा में नये प्रयोग करते रहते हैं. उन्होंने कोरोना वायरस को 'मिस रोना' कहना शुरू किया.

जो कहा न सके उसके लिए हमेशा इमोजी मौजूद रहता है. जुड़े हुए हाथ वाले इमोजी, मेडिकल मास्क वाले इमोजी और माइक्रोब वाले इमोजी इस महामारी के समय पहले से ज़्यादा लोकप्रिय हो गए हैं.

मैकफर्सन का कहना है कि इनमें से कुछ इमोजी और शब्द कम गंभीर लग सकते हैं लेकिन "अंधेरे में थोड़ी बहुत रोशनी होने से लोग हालात को हल्का बना रहे हैं."

लॉसन भी इससे सहमत हैं, "यदि आप उस पर हंस सकते हैं तो आप उसे मैनेज करने लायक बना सकते हैं और मनोवैज्ञानिक रूप से कमज़ोर लोगों की मदद कर सकते हैं."

मगर भाषाविदों का यह भी मानना है कि वर्तमान में प्रचलित कई शब्द टिक नहीं पाएंगे.

वीडियो कैप्शन, दुनिया को हंसाने वाले क्यों रो रहे हैं...

महामारी के बाद उन्हीं शब्दों के टिके रहने की संभावना होगी जो स्थायी व्यवहार परिवर्तन को बताते हैं, जैसे 'ज़ूमबॉम्बिंग' जो 'फोटोबॉम्बिंग' शब्द से प्रभावित है. यह किसी और के वीडियो कॉल में अतिक्रमण करने की आदत को बताता है.

मैकफर्सन का मानना है कि ज़ूम कंपनी का प्रभुत्व ख़त्म होने के बाद भी 'ज़ूमबॉम्बिंग' एक सामान्य शब्द बना रह सकता है.

वर्तमान की कठिनाइयां कोरोना शब्दों की तरह हमेशा के लिए नहीं रहेंगी. ओल्ज़ा कहती हैं, "मैं अपने सामान्य एजेंडे पर वापस आउंगी. तब तक क्वारंटीन चलेगा."

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी वर्कलाइफ़ पर उपलब्ध है.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)