इन पाँच वजहों से एप्पल बनी पहली 1,000 अरब डॉलर की कंपनी

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    • Author, सारा पॉर्टर
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, सिंगापुर से
  • पढ़ने का समय: 6 मिनट

'एप्पल' को अब तक की सबसे सफल कंपनी कहा जा रहा है.

ये दुनिया की पहली हज़ार अरब (एक ट्रिलियन) डॉलर की सार्वजनिक कंपनी बन गई है.

लेकिन एप्पल ने ये सब किया कैसे?

यहाँ पाँच ऐसी चीज़ों पर हम नज़र डालेंगे जिनकी मदद से एप्पल ने ये बड़ी सफलता हासिल की.

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स्टीव जॉब्स - अपने आप में एक ब्रांड

स्टीव जॉब्स की पहचान न सिर्फ़ एप्पल के सह-संस्थापक के रूप में है, बल्कि उन्हें टेक्नोलॉजी की दुनिया का सबसे बड़ा नाम भी माना जाता है.

उन्होंने एप्पल को तकनीक की दुनिया की उस क्रांति का हिस्सा बनाया, जिसका लक्ष्य आम लोगों के हाथ में तकनीक पहुँचाना था. फिर बात चाहें आई-पॉड की हो या आई-पैड की.

लेकिन आधुनिक दुनिया के पहले औपचारिक सीईओ (कंपनी के मुख्य अधिकारी) में से एक के तौर पर पहचान मिलने के बाद, वो ख़ुद ही एक ब्रांड बन गये.

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स्टीव जॉब्स ने स्टीव वॉज़निएक के साथ मिलकर साल 1976 में एप्पल कंपनी की स्थापना की थी. तब से कैलिफ़ॉर्निया स्थित इस कंपनी को 'महान चीज़ें तैयार करने वाली' एक कंपनी के तौर पर देखा गया.

साल 1980 में एप्पल के शेयर की डिमांड बहुत ज़्यादा बढ़ गयी. कहा जाने लगा कि साल 1956 में फ़ोर्ड कंपनी के शेयर की ऐसी डिमांड थी. उसके बाद सिर्फ़ एप्पल कंपनी के शेयर की उतनी डिमांड हुई.

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लेकिन साल 1985 में कंपनी के चीफ़ एग्ज़ीक्यूटिव जॉन स्कली से उनका विवाद हो गया और इस विवाद के कारण उन्हें कंपनी छोड़नी पड़ी.

हालांकि 12 साल बाद, यानी साल 1997 में नुक़सान में चल रही एप्पल कंपनी ने स्टीव जॉब्स को वापस लौटने का प्रस्ताव दिया.

उन्होंने कंपनी में लौटते ही विभिन्न परियोजनाओं को रद्द कर दिया और एक नया प्रोजेक्ट शुरू किया, जिसका नाम था 'थिंक डिफ़्रेंट' यानी 'कुछ नया सोचिए'.

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इसी प्रोजेक्ट के तहत एप्पल ने अपने नए उत्पादों को तैयार करना शुरू किया. माना जाता है कि इससे कंपनी के कर्मचारियों का मनोबल एक तरह से पुनर्जीवित हो गया और एप्पल जल्दी ही मुनाफ़े की स्थिति में लौट आई.

साल 2011 में जब स्टीव जॉब्स का देहांत हुआ तो अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा कि दुनिया ने 'एक दूरदर्शी शख़्स को खो दिया' है.

ये भी कहा गया कि स्टीव जॉब्स के बाद 'एप्पल कंपनी', वैसे नहीं रह जायेगी.

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आईफ़ोन - एक क्रांति

साल 2007 में कंपनी ने आईफ़ोन लॉन्च किया था. आधुनिक मोबाइल संचार पर आईफ़ोन का प्रभाव अब तक बेजोड़ और निर्विवाद रहा है.

कंपनी के अनुसार, लॉन्च होने के पहले साल में ही 1 करोड़ 40 लाख आईफ़ोन बेचे गये थे.

नोकिया और ब्लैकबेरी, जैसी कंपनियों के उत्पाद उस वक़्त बाज़ार पर हावी थे और इन्हें आईफ़ोन का बड़ा प्रतिद्वंद्वी माना जा रहा था. लेकिन जल्द ही आईफ़ोन ने इन्हें हरा दिया.

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हाल ही में आई रिपोर्टों के अनुसार, अगर दुनिया के सबसे बड़े स्मार्टफ़ोन निर्माताओं की बात करें तो दक्षिण कोरिया की कंपनी सैमसंग और चीन की कंपनी हुआवे के बाद एप्पल तीसरे स्थान पर है.

लेकिन आज भी आईफ़ोन की दुनिया भर में मज़बूत डिमांड बनी हुई है. एप्पल ने पिछले साल दुनिया भर में 21.6 करोड़ आईफ़ोन बेचे थे.

आईफ़ोन ही वो उत्पाद है जिसकी बदौलत आज एप्पल कंपनी की क़रीब 50 फ़ीसदी आमदनी होती है. हालिया तिमाही में 56 फीसदी कमाई एप्पल ने आईफ़ोन की बिक्री से की है.

एप्पल के भविष्य के लिए आईफ़ोन सबसे अधिक महत्वपूर्ण है और फिलहाल बाज़ार को उनकी सर्वोत्तम पेशकश भी.

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एप्पल की सर्विस और ब्रांड पर भरोसा

एप्पल की सेवाओं की अगर बात करें तो आईट्यून या एप्पल म्यूज़िक, एप्पल ऐप स्टोर, आईक्लाउड और एप्पल प्ले इनमें शामिल हैं.

ये सभी एप्पल की कमाई का एक बड़ा ज़रिया हैं. अप्रैल से लेकर जून 2018 के बीच एप्पल की सेवाओं से आने वाली कमाई में 31 फ़ीसदी वृद्धि हुई.

जानकार मानते हैं कि आईफ़ोन अगर एप्पल की पहचान है तो उसके साथ मिलने वाली सेवाएं, जैसे एप्पल म्यूज़िक लोगों में ब्रांड प्रति वफ़ादारी को बढ़ाने में मदद करती हैं.

माना जाता है कि कोई ग्राहक अगर आईफ़ोन को ख़रीदता है और यूज़ करके उसे पसंद करता है तो कंपनी के अन्य उत्पादों, जैसे आईपैड, मैकबुक और आईवॉच की बिक्री में वृद्धि होती है.

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बाज़ार का विश्लेषण करने वाले, ब्रांड-मैटर्स कंपनी के प्रबंध निदेशक पॉल नेल्सन कहते हैं, "ये वित्तीय प्रतिभा का ही नमूना है जो कंपनी के भीतर बैठे लोगों में है. वो उपभोक्ताओं को कंपनी का हार्डवेयर ख़रीदने के लिए प्रेरित करने में सफल साबित हुए हैं."

वो कहते हैं, "मज़बूत ब्रांड्स के पास ऐसे ग्राहक होते हैं जो बाज़ार में मौजूद विकल्पों में रुचि नहीं रखते हैं. वो कहीं और देखते ही नहीं. एप्पल के पास भी ये ताक़त है. तथ्य बताते हैं कि एप्पल के पास वफ़ादार ग्राहकों का एक बहुत बड़ा हिस्सा है."

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चीन और विकास

दुनिया के सबसे बड़े स्मार्टफ़ोन बाज़ार चीन के बिना एप्पल की सफलता की ये कहानी काफ़ी अलग दिखाई देगी.

एप्पल के मुनाफ़े का लगभग एक चौथाई हिस्सा अकेले चीन से ही आता है.

इसके अलावा, एप्पल अपने अधिकांश आईफ़ोन का निर्माण दक्षिणी चीन के शेनज़ेन शहर में करता है.

हालांकि कंपनी ने मार्च 2016 से लेकर जुलाई 2018 के बीच चीन से आने वाले राजस्व में भारी गिरावट देखी. लेकिन कंपनी ने अब इस स्थिति में सुधार कर लिया है.

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जानकार कहते हैं कि चीन के मध्यम वर्गीय लोग अब आईफ़ोन को ज़्यादा पसंद करने लगे हैं. चीन के मध्यम वर्गीय परिवारों में आईफ़ोन होना, रुतबे और शोहरत की एक निशानी मानी जाती है.

इसलिए सस्ते घरेलू ब्रांड्स की कड़ी प्रतिस्पर्धा के बावजूद एप्पल ने चीन में अपनी स्थिति में तेज़ी से सुधार किया है.

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आज, ब्रांड के तौर पर एप्पल

फ़ॉर्ब्स किसी कंपनी के वित्तीय नंबर देखकर उसकी ब्रांड वैल्यू (कंपनी का मूल्य) तय करती है.

उसकी सूची के अनुसार, पिछले आठ सालों से एप्पल ने सबसे मूल्यवान ब्रांड के तौर पर अपनी जगह पक्की की हुई है.

इस सूची के मुताबिक़, इस साल एप्पल की क़ीमत 182.8 अरब डॉलर रही. एप्पल की क़ीमत आज एक समय दुनिया में अमरीका की सबसे बड़ी कंपनी रही कोका-कोला की तुलना में क़रीब तीन गुना ज़्यादा है.

सहस्राब्दी की शुरुआत से पहले पैदा हुए लोगों के लिए जितना मुश्किल कोका-कोला ब्रांड के बिना हमारे बाज़ारों की कल्पना करना होगा, उतना ही मुश्किल 21वीं शताब्दी में पैदा हुए लोगों के लिए एप्पल ब्रांड के बिना किसी बाज़ार की कल्पना करना है.

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कई बाज़ार विश्लेषक मानते हैं कि एक ब्रांड के तौर पर एप्पल जो काम करने में सक्षम है वो कोका-कोला नहीं कर पाया, वो है प्रासंगिक होना और बाज़ार में समकालीन बने रहना.

इस बारे में ब्रांड-मैटर्स कंपनी के पॉल नेल्सन कहते हैं, "एप्पल ने हमेशा मनुष्य को अपने पारिस्थितिक तंत्र के केंद्र में रखा है. ये उनकी सबसे बड़ी ताक़त है. उन्होंने कोई भी चीज़ विकसित की, उसमें वो ये कोशिश करते रहे कि तकनीक लोगों के अनुकूल हो. और यही एप्पल ब्रांड की पहचान बनी है."

"एप्पल का पहली हज़ार अरब (एक ट्रिलियन) डॉलर की कंपनी बनने का यही कारण है कि उन्होंने अपने व्यापार मॉडल में ग्राहकों को बांधे रखने के लिए उनके सामने कई सारी बाधाएं खड़ी कर दी हैं. इस पूरे इको-सिस्टम का नाम ही एप्पल है."

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