इंसान की लाशों से बीमारियों का इलाज करने की वह प्रथा
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अभी-अभी एक व्यक्ति को सज़ा-ए-मौत हुई है.
कई मरीज़ उस लाश के नीचे इकट्ठा होने की कोशिश कर रहे हैं, जो अब भी तड़प रही है.
जिन ख़ुशनसीब लोगों को अपने प्याले भरने की आवाज़ आती है, वे तुरंत लाश के गर्म ख़ून को एक ही सांस में पी जाते हैं.
यह आधुनिक डेनमार्क के शुरुआती दौर की बात है.
वैसे तो यह उदाहरण बहुत ही गंभीर है, लेकिन उस समय यूरोप के शीर्ष चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, मिर्गी का इलाज ख़ून में था.
आधुनिक दौर के शुरुआत में मिलने वाली 'शव औषधि' को दो वर्गों में बाँटा जा सकता है.
एक लोकप्रिय उपचार संरक्षित की गई लाशों से किया जाता था, जिनमें प्राचीन मिस्र की लाशों से सूखे मांस को निकाल उसका पाउडर बना कर इस्तेमाल किया जाता था.
लेकिन कुछ डॉक्टर उसी दौर की लाशों से निकाले गए अवयवों को भी दवा के रूप में इस्तेमाल करते थे.
जिसमें ताज़ा चर्बी, ख़ून और यहाँ तक कि पुट्ठों का मांस भी शामिल था, जिसे उपयोग करने से पहले सावधानी से सुखाया और साफ़ कर लिया जाता था.
कई चिकित्सा विशेषज्ञों का दावा था, कि मिर्गी के लिए सबसे अच्छा इलाज 'एक ऐसे इंसान की लाश है, जो शुद्ध और ताज़ा हो, जिसका रंग कुछ लाल हो, जिसकी उम्र लगभग 24 साल हो' और उसकी 'दर्दनाक मौत' हुई हो.
कभी-कभी इंसानी खोपड़ी का भी इस्तेमाल किया जाता था, और 'असनी' नामक उस फफूंद का भी उपयोग किया जाता था जो मृत्यु के कुछ समय बाद खोपड़ी पर लगनी शुरू हो जाती है.
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संरक्षित की गई लाशों का उपयोग हेमरेज या घावों के इलाज के लिए किया जाता था जबकि ख़ून और खोपड़ी का उपयोग मिर्गी के इलाज के लिए, पाउडर के रूप में किया जाता था.
आदमख़ोरी
हम नहीं जानते कि ऐसा क्यों है, लेकिन चिकित्सा के पारंपरिक इतिहास में लाशों से उपचार का उल्लेख नहीं मिलता है. लेकिन इस तरह के उपचार दैवीय कहानियां या कोई फ्रॉड नहीं थे.
ये उपचार, कुछ हद तक ग्रीक और अरब चिकित्सा परंपराओं से लिए गए हैं. उपचार के इन तरीक़ों को बहुत से शिक्षित व्यक्ति न केवल स्वीकार करते हैं, बल्कि ऐसा करने का सुझाव भी देते हैं. सुझाव देने वालों में वैज्ञानिक दार्शनिक फ्रांसिस बेकन, कवि और दार्शनिक जॉन डन, महारानी एलिज़ाबेथ के सर्जन जॉन बेनिस्टर और रसायनिक विशेषज्ञ रॉबर्ट बॉयल शामिल थे.
साल 1685 में इंसानी खोपड़ी से बनाई गई बूंदों का उपयोग ब्रिटेन के राजा चार्ल्स द्वितीय के इलाज के लिए भी किया गया था.
यह स्पष्ट है कि लाशों से उपचार करना एक तरह से आदमख़ोरी ही थी.
15वीं शताब्दी और उसके बाद से यूरोप में लगभग हर जगह, 'पुराने दौर की आदमख़ोरी' को बुरा माना जाता था, जिसकी खोज अमेरिका में हाल ही में हुई थी. लेकिन किसी ने भी इस तरह के इलाज को आदमख़ोरी नहीं कहा था.
वैसे तो, इससे लोगों में बैचेनी पैदा होती थी, लेकिन फिर भी यह एक लोकप्रिय और आकर्षक इलाज था. इतना लोकप्रिय और आकर्षक कि व्यापारी न केवल मिस्र की क़ब्रों को लूटते थे, बल्कि अक्सर धोखे से लोगों को ग़रीबों या कोढ़ी, या ऊंट का मांस तक भी बेच दिया करते थे.
इलाज का यह तरीक़ा 15वीं सदी के अंत तक जारी रहा, लेकिन जर्मनी में तो यह अब से सौ साल पहले तक भी उपलब्ध था.
'अच्छी दवा'
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लेकिन इस तरह के इलाज इतने घिनौने होने के बावजूद इतने लंबे समय तक कैसे जारी रहे?
इसका जवाब यह है कि चिकित्सा विशेषज्ञों क्लासिकी यूनानी दौर के विशेषज्ञों को बहुत महत्व देते थे. इसके अलावा यह भी महत्वपूर्ण था कि उस दौर में चिकित्सा के लिए लैटिन भाषा का प्रयोग किया जाता था और क्या सही है और क्या ग़लत इस पर बहुत सख़्त एकाधिकार था.
साल 1599 से कुछ समय पहले, एक पर्यटक ने मिस्र के क़ाहिरा के एक पिरामिड के बारे में लिखा था, कि "प्राचीन लोगों की लाशें रोज़ाना निकाली जाती थीं, वे सड़ी हुई नहीं होती थीं, बल्कि सही स्थिति में होती थीं' और 'ये वो लाशें थीं जिन्हें डॉक्टर और दवा बनाने वाले हमारी मर्ज़ी की ख़िलाफ़ हमें खिलाते थे."
इससे पता चलता है कि डॉक्टर अपने रोगियों को एक क्षीण शरीर से निकाले गए अवयवों का उपयोग करने के लिए, मजबूर कर सकते थे.
साल 1647 में, उपदेशक और लेखक थॉमस फिलर ने संरक्षित की गई लाशों को "ख़राब भोजन लेकिन अच्छी दवा" कहा.
उनके इस कथन का यह अर्थ निकाला जा सकता है कि इंसानी मांस को विभिन्न चिकित्सकीय प्रक्रियाओं के माध्यम से किसी तरह साफ़ कर लिया जाता था और इस प्रकार यह कच्चा इंसानी मांस खाना बुरा नहीं था.
हालांकि, रिफाइनिंग का यह चरण 'विज्ञान' की शक्ति पर नहीं बल्कि मानव शरीर की धार्मिक और आध्यात्मिक शक्ति पर निर्भर था.
आत्मा, मानव जीवन की शक्ति
यूरोपीय पुनर्जागरण के दौरान, यह आम धारणा थी कि मानव आत्मा ही शारीरिक दुखों के लिए ज़िम्मेदार है.
सिद्धांत यह था कि आत्मा का ख़ुद तो कोई रूप नहीं है, लेकिन यह ख़ून और हवा के मिश्रण से जिस्म से जुड़ी रहती है. आत्मा का यह मिश्रण शरीर में घूमता रहता है.
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पुनर्जागरण दौर के कई विचारकों के अनुसार, लाशों से उपचार करना एक ऐसा रासायनिक विज्ञान था जो ज़िंदगी की बेहतरी के लिए ज़रूरी रूहानी ताक़त को ख़ुद में उतार लेने का मौक़ा देता है.
और जब ताज़ा ख़ून पीने की बात आती है तो यह बात और भी स्पष्ट हो जाती है. इस तरह से, रोगी जीवन के मूल पदार्थ को उसी तरह अपने अंदर उतार लेता जैसे वह जीवित शरीर के अंदर मौजूद था.
सत्रहवीं सदी के अंत में, कवि और चिकित्सक एडवर्ड टेलर ने लिखा था, कि "गर्म या ठंडा इंसानी ख़ून बीमारियों के लिए फ़ायदेमंद है."
और 1747 तक, अंग्रेज़ चिकित्सक मिर्गी के इलाज के लिए 'ताज़े, गर्म' ख़ून का सुझाव देते रहे.
इसके अलावा, 'आध्यात्मिक फिज़ियोलॉजी' के कारण भी इंसानी मांस खाया जाता रहा.
याद रहे, कि संरक्षित की गई लाश के बारे में कहा गया था कि यह एक नौजवान की लाश होनी चाहिए जिसकी 'दर्दनाक मौत' हुई हो.
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दर्दनाक मौत डर को भी जन्म देती.
मेडिकल थ्योरी में कहा जाता है कि डर के कारण आत्मा महत्वपूर्ण अंगों (जिगर, हृदय और मस्तिष्क) को छोड़कर मांस में समां जाती है, इसलिए ऐसी स्थिति में या तो रोंगटे खड़े हो जाते या आँखों में एक रहस्यमय चमक पैदा हो जाती.
इसलिए ऐसे व्यक्ति के मांस को विशेष रूप से बेहतर माना जाता था.
इसलिए पहली नज़र में, मिस्र की ममी जो अपने सूखेपन के लिए जानी जाती हैं, उनमें तो ये जीवन शक्ति नहीं होनी चाहिए? लेकिन उनके ठीक हालत में पाए गए गोश्त से ये मतलब निकाला जाता था कि इन लाशों में आत्मा अभी भी बरक़रार है, जिन्हें संरक्षण के चरणों से गुज़ारने के बाद सील कर दिया गया है.
उसी तरह बहुत समय पहले मरने वाले व्यक्ति की खोपड़ी पर लगने वाली फफूंद को भी आध्यात्मिक शक्ति से भरपूर माना जाता था.
कुछ विचारकों का मानना था कि अगर किसी व्यक्ति का गला घोंट दिया जाए तो उसके सिर में मौजूद आध्यात्मिक शक्ति सात साल तक उसकी खोपड़ी में रह सकती है.
साल 1604 में हम विलियम शेक्सपियर के चरित्र ओथेलो को उसके रूमाल की प्रशंसा करते हुए देखते हैं, क्योंकि उसका रेशम 'एक कुंवारी महिला के संरक्षित दिल से बने तरल से रंगा गया था."
ज़ाहिर है, कि उस दौर में युवा, कुंवारी महिलाओं को आध्यात्मिक शुद्धता का उच्चतम स्तर माना जाता था.
वैसे तो हृदय के चिकित्सीय उपयोग को अजीब नहीं माना जाता था, लेकिन यह कथन इस आम धारणा पर आधारित हो सकती है कि आत्मा के सबसे शुद्ध और सबसे उत्तम भाग बाएं वेंट्रिकल या हृदय की गुहा में पाए जाते हैं.
अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग अर्थ
लाशों से इलाज का मतलब अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग था.
जो लोग इसे वर्जित मानते थे, शायद उनका ये विचार व्यापार, पश्चिमी चिकित्सा, पुस्तकों और तकनीकी विकास की वजह से बदलने लगा हो और उनके लिए यह स्वीकार्य हो गया हो.
जबकि दूसरे लोगों के लिए, यह मानव जीवन के सबसे पवित्र और मौलिक तत्व के साथ संपर्क का एक ज़रिया था.
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हास्यास्पद बात यह है कि लाश को संरक्षित किया जाना मुख्यधारा की चिकित्सा में अप्रचलित माना जाता था, केवल इसलिए नहीं कि डॉक्टर सैमुअल जॉनसन के समकालीन इसे अंधविश्वास या क्रुर मानने लगे थे, बल्कि इसलिए भी कि चिकित्सा ने मानव शरीर के आध्यात्मिक महत्व को कम करना शुरू कर दिया था.
साल 1782 में, हम देखते हैं कि चिकित्सक विलियम ब्लेक ख़ुशी का इज़हार करते हैं कि "मिस्र की ममी" और "पुरुषों की खोपड़ी" जैसे "गंदे और महत्वहीन" उपचार अब अप्रचलित हो रहे हैं. "ये और अन्य दूषित पदार्थों के मिश्रण अब चिकित्सा में अपना स्थान खो चुके हैं."
इस प्रकार, प्रबुद्ध विज्ञान के विकास का बचाव करते हुए, विलियम ब्लेक ने इस पूरे चरण के दौरान क्या प्रभावित हुआ था, इस पर विचार नहीं किया.
क्योंकि जिन लोगों ने लाशों के ज़रिये इलाज कराया था, वे अब इसके प्रति अपनी घृणा पर क़ाबू पा चुके थे, हताशा की वजह से नहीं, बल्कि आत्मा के लिए अपने सम्मान की वजह से, जिसे मानव जीवन का सार माना जाता था.
(रिचर्ड सिग डरहम यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं. उनकी पुस्तक, मर्डर आफ्टर डेथ, चिकित्सयी आदमख़ोरी पर प्रकाश डालती है)
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