आधार: ज़िंदगी में तांकझांक का तर्क कितना सही?

सुप्रीम कोर्ट, भारत

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भारत के सुप्रीम कोर्ट ने 11 अगस्त को आधार कार्ड पर एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए तीन महत्वपूर्ण आदेश दिए.

पहला ये कि आधार कार्ड बनवाना ज़रूरी नहीं है. किसी को इसे बनवाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता.

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दूसरा ये कि सरकार जनवितरण प्रणाली(पीडीएस) और गैस सिलिंडर(एलपीजी) वितरण में इसका प्रयोग कर सकती है लेकिन इन सेवाओं के लिए आधार कार्ड देना ज़रूरी नहीं होगा.

तीसरा अहम आदेश ये है कि कोर्ट की पाँच जजों वाली संवैधानिक पीठ निजता के सवाल और आधार परियोजना पर जब तक अपनी सुनवाई पूरी नहीं कर लेती तब तक सरकार को किसी भी उद्देश्य से आधार कार्ड माँगकर लोगों को निजता को ख़तरे में नहीं डालना चाहिए.

विश्लेषण- आधार और निजता का मुद्दा

आधार कार्ड

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आधार परियोजना का सवाल इतना महत्वपूर्ण क्यों है? ये समझने के लिए हमें पहले ये जानना होगा कि आधार परियोजना और निजता के अधिकार का आपस में क्या संबंध है.

इस परियोजना के तहत अलग-अलग निजी और सरकारी डेटाबेस (रेलवे यात्रा, वोटर आईडीकार्ड, पैन कार्ड, बैंक अकाउंट, मोबाइल नंबर और पीडीएस आदि) में हर व्यक्ति का आधार नंबर जोड़ने का प्रस्ताव है.

<link type="page"><caption> पढ़ेंः क्या है आधार</caption><url href="https://bbcnews.me/hindi/india/2013/09/130924_adhar_sc_ml" platform="highweb"/></link>

जब ये काम पूरा हो जाएगा, तो किसी व्यक्ति का प्रोफ़ाइल तैयार करना काफ़ी आसान हो जाएगा. उस व्यक्ति ने कब और कैसे यात्रा की, किसे फ़ोन किया, किसके साथ पैसे की लेन-देन किया ...ये जानकारियाँ पाना किसी के लिए बहुत आसान हो जाएगा.

यानी आधार परियोजना आम लोगों की निगरानी करने का सबसे बड़ा तरीका बन सकती है.

आपकी ज़़िंदगी में तांक झांक ?

निगरानी और निजता का मुद्दा आपस में जुड़ा हुआ है. अगर आपको ये पता हो कि आपकी निगरानी की जा रही है तो आप अपना बरताव बदलने पर मजबूर हो जाएंगे.

जैसे, अगर हमें पता हो कि हमारे फ़ोन और ईमेल की निगरानी की जा रही है तो हमें बातचीत करने के लिए दूसरे सुरक्षित तरीकों की तलाश करनी होगी. ये हमारी निजता और स्वतंत्रता में घुसपैठ जैसा है.

भारत, कोर्ट

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अमरीका में एडवर्ड स्नोडेन के किए गए उद्घाटनों के बाद से सर्वेलेंस और निजता पर गंभीर बहस शुरू हो गई है.

स्नोडेन ने उजागर किया कि अमरीका ख़ुद अपने नागरिकों की निगरानी कराता रहा है. ये तब हुआ जब अमरीका में निजता की रक्षा के लिए कड़े क़ानून और दूसरे प्रावधान हैं.

निजता पर क्या है क़ानून ?

चिंताजनक बात ये है कि भारत में निजता संबंधी कोई क़ानून नहीं है. यानी आधार परियोजना एक तरह के क़ानूनी निर्वात या वैक्युम में काम कर रही है.

आधार का इस्तेमाल किस लिए हो सकता है, इससे जुड़ी जानकारी कौन और किन परिस्थितियों में माँग सकता है...इन सवालों को लेकर नियम या दिशा-निर्देश नहीं हैं.

कई लोगों को लगता है कि निजता का सवाल केवल अमीर और प्रभावशाली लोगों के लिए चिंता का विषय है. लेकिन ये सही नहीं है.

हम सबकी निजता की सीमाएँ होती हैं और हम नहीं चाहते कि दूसरे उसका उल्लंघन करें. ग़रीब लोग केवल सिर पर छत के लिए घर नहीं बनाते, बल्कि उन्हें निजता भी चाहिए होती है. वो अपने बैंक अकाउंट की जानकारी गोपनीय रखना चाहते हैं.

हम सब अपने ईमेल और बैंक अकाउंट को पासवर्ड से सुरक्षित रखते हैं. अपनी निजता को बचाने के लिए हम ऐसे कई दूसरे उपाय करते हैं.

पक्ष-विपक्ष में क्या हैं तर्क?

एलपीजी, भारत

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आधार परियोजना से जुड़ी बहस में जब ये सवाल उठाए जाते हैं तो बहुत से लोग तर्क देते हैं कि सामाजिक कल्याणकारी परियोजनाओं को बेहतर तरीके से लागू करने के लिए ये ज़रूरी है. केंद्र सरकार और कई राज्य सरकारें भी आधार के पक्ष में यही तर्क देती रही हैं.

ये सच नहीं है. सामाजिक कल्याणकारी परियोजनाओं में आधार के बग़ैर ही भ्रष्टाचार में कमी आ रही है. जैसे, पीडीएस में होने वाले घपले की दर (लीकेज) 2004-05 और 2011-12 के बीच 75 प्रतिशत से घटकर कई राज्यों (बिहार, छत्तीसगढ़ और ओड़िसा) में 20 प्रतिशत से कम हो गई.

इसी तरह साल 2009 से बैंक अकाउंट के प्रयोग के बाद से नरेगा (राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना) में होने वाले घपले में काफ़ी कमी आई है.

क्या आधार से कम होंगे घपले ?

पीडीएस, छत्तीसगढ़

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आधार के पक्ष में कई बार ये तर्क भी दिया जाता है कि इसके प्रयोग से एक ही योजना का दोहरा लाभ ले रहे लोगों पर लगाम लगेगी.

क्या ये सचमुच कोई गंभीर समस्या है? सुप्रीम कोर्ट में दिए गए एक हलफनामे के अनुसार आंध्र प्रदेश में कुल 3.5 करोड़ कामगारों में से दो लाख (0.6 प्रतिशत) दोहरा लाभ ले रहे थे.

सरकार की तरफ़ से बनाई गई एसजी धांडे समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि एलपीजी डेटाबेस में दो प्रतिशत लोग दोहरा लाभ ले रहे हैं.

मार्च, 2015 में सरकार के मंत्री ने संसद में कहा था कि नौ करोड़ से ज़्यादा नामांकन गुणवत्ता से जुड़े मसलों और संदिग्ध जालसाजी के आधार पर निरस्त कर दिए गए.

क्या आधार माँगने पर रोक लगे ?

योजनाओं का दोहरा लाभ लेने को लेकर दूसरी शिकायतें भी सामने आती रही हैं. दुनिया की कोई भी व्यवस्था 100 प्रतिशत दोषमुक्त नहीं होती.

इसलिए वाजिब यही होगा कि जब तक सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ निजता के अधिकार और आधार परियोजना पर अपना फ़ैसला नहीं सुना देती तब तक भारत सरकार को विभिन्न परियोजनओं के लिए आधार कार्ड नंबर माँगकर उनकी निजता को ख़तरे में नहीं डालना चाहिए.

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