वसुंधरा को लेकर क्या बीजेपी ने अब रुख़ बदल लिया है?- प्रेस रिव्यू

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इमेज कैप्शन, वसुंधरा राजे के साथ पीएम नरेंद्र मोदी
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बीते बुधवार को राजस्थान के अजमेर में हुई बीजेपी की विशाल रैली में सबकी निगाहें पूर्व सीएम वसुंधरा राजे पर थीं.

अंग्रेजी अख़बार द हिंदू में प्रकाशित ख़बर के मुताबिक़, कुछ समय पहले तक बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व की ओर से रुखा व्यवहार झेलने वालीं वसुंधरा राजे बुधवार के कार्यक्रम में पीएम मोदी के ठीक बगल में मंच पर बैठी दिखाई दीं.

इसके साथ-साथ इस रैली के लिए लगाए गए पोस्टरों में भी वसुंधरा राजे की तस्वीर नज़र आई.

साल 2019 में अंबर से बीजेपी विधायक सतीश पूनिया के राजस्थान बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद बीजेपी की होर्डिंग्स से उनकी तस्वीर ग़ायब हो गई थी. इसके साथ ही राजे ने भी बीजेपी के कार्यक्रमों से दूरी बनाना शुरू कर दिया था.

लेकिन बुधवार को हुई रैली में वसुंधरा राजे न सिर्फ़ पोस्टरों, होर्डिंग और मंच पर दिखाई दीं बल्कि पीएम मोदी ने हाथ जोड़कर वसुंधरा राजे का अभिवादन स्वीकार किया है. इसके बाद दोनों के बीच कुछ देर तक बातचीत भी हुई है.

अख़बार के मुताबिक़, इस रैली के दौरान ऐसे कई संकेत मिले हैं, जो बताते हैं कि बीजेपी आने वाले विधानसभा चुनाव की कमान वसुंधरा राजे को सौंप सकती है.

इसे कर्नाटक में बीजेपी की हार के बाद बदली रणनीति के रूप में भी देखा जा रहा है क्योंकि इस हार ने बीजेपी को अपने क्षेत्रीय नेताओं की ताक़त को भी स्वीकारने के लिए मजबूर किया है.

बीजेपी इससे पहले तक राजस्थान का चुनाव भी सिर्फ़ पीएम मोदी के दम पर लड़ना चाहती है. लेकिन कर्नाटक की हार ने पार्टी को इस रणनीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया है.

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पहलवानों के प्रदर्शन से हरियाणा बीजेपी में मची खलबली

बीजेपी सांसद बृजभूषण शरण सिंह की गिरफ़्तारी को लेकर पहलवानों और केंद्र सरकार के बीच टकराव जिस तरह ख़त्म होने का नाम नहीं ले रहा है, उससे हरियाणा के बीजेपी नेताओं की असहजता बढ़ती जा रही है.

अंग्रेजी अख़बार द इंडियन एक्सप्रेस में छपी ख़बर के मुताबिक़, इस असहजता की वजह चुनावों का नजदीक होना है. अगले साल आम चुनाव के ठीक बाद हरियाणा में विधानसभा चुनाव होने हैं.

ऐसे में हरियाणा के बीजेपी नेता आशंका जता रहे हैं कि इस विरोध प्रदर्शन की वजह से ज़मीन पर पार्टी को लेकर लोगों की राय बदल सकती है.

एक नेता ने कहा है कि 'कुछ मुद्दे ऐसे होते हैं जिनका समाधान पार्टी नीतियों से ऊपर उठकर किया जाना चाहिए. किसी को सिर्फ़ अपने मन की बात कहने का ही साहस नहीं होना चाहिए, बल्कि सुनने और ज़मीनी हक़ीकतों को समझने का भी साहस होना चाहिए. इस विरोध प्रदर्शन के पीछे कारण जो भी हो, लेकिन इस मसले का तार्किक निष्कर्ष निकलने में देरी जमीन पर लोगों की धारणाएं बदल देगी."

हरियाणा के मुख्यमंत्री एमएल खट्टर समेत बीजेपी नेताओं ने अब तक इस मुद्दे पर एक तरह से चुप्पी साधी हुई है.

लेकिन धीरे-धीरे उनके लिए चुप रहना मुश्किल होता जा रहा है.

हाल ही में मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को अपने जनसंवाद कार्यक्रम के दौरान विरोध का सामना करना पड़ा था. इस दौरान कुछ मौकों पर उन्हें अपना आपा भी खोते भी देखा गया.

इस बीच हरियाणा के किसान नेताओं के साथ-साथ कांग्रेस पार्टी ने पहलवान को अपना समर्थन देना शुरू कर दिया है. क्योंकि ज़्यादातर पहलवान जाट समुदाय से आते हैं और इस वर्ग में कांग्रेस का अच्छा ख़ासा जनाधार है. इसके साथ ही पहलवानों को जाट केंद्रित पार्टी आईएनएलडी और आम आदमी पार्टी का भी समर्थन मिल गया है.

ऐसे में जैसे - जैसे ये विरोध प्रदर्शन आगे बढ़ रहा है, वैसे - वैसे बीजेपी के लिए ज़मीन पर दिक्कतें बढ़ती जा रही हैं.

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रामपुर तिराहा कांड: सीबीआई ने बताया, गायब हुए बलात्कार और हत्याओं के असली दस्तावेज़

केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई ने साल 1994 के रामपुर तिराहा कांड की सुनवाई कर रही मुज्जफ़रनगर कोर्ट को बताया है कि इस मामले से जुड़े असली दस्तावेज़ गायब हो गए हैं.

अंग्रेजी अख़बार द टाइम्स ऑफ़ इंडिया में प्रकाशित ख़बर के मुताबिक़, साल 1994 में उत्तराखंड राज्य की मांग करने वाले प्रदर्शनकारियों पर उत्तर प्रदेश पुलिस की ओर से लाठीचार्ज और गोलियां चलाई गयी थीं जिसमें कई लोगों की जान गयी थी.

इस दौरान कई महिलाओं और बच्चियों के साथ बलात्कार किए जाने की भी ख़बरें आई थीं.

इन घटनाओं के असली दस्तावेज़ सीबीआई के पास मौजूद थे. और कोर्ट ने सीबीआई से इस मामले पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी थी.

इसके बाद सीबीआई ने कोर्ट में दाखिल अपने आवेदन में कहा है कि जब तक दस्तावेज़ नहीं मिल जाते तब तक इस मामले की सुनवाई को स्थगित करना चाहिए.

अदालत ने बीती मार्च में ही इस मामले में गंभीर आरोप झेल रहे 29 पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ सुनवाई प्रक्रिया में शामिल नहीं होने की वजह से ग़ैर-जमानती वारंट जारी किया था.

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