त्रिपुरा में सांप्रदायिक हिंसा के मामले अचानक क्यों बढ़ गए हैं?
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- Author, पिनाकी दास
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
- पढ़ने का समय: 5 मिनट
त्रिपुरा के उत्तर त्रिपुरा ज़िले में गुरुवार को एक बार फिर मुसलमान समुदाय पर हमले की घटना सामने आई है.
ये हमला उस जगह से थोड़ी ही दूर पर हुआ जहां 48 घंटा पहले एक मस्जिद तोड़ दी गई थी, दुकानें जला दी गईं थीं और अल्पसंख्यकों के घरों में तोड़फोड़ की गई थी.
इस हमले के लिए विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं को ज़िम्मेवार ठहराया जा रहा है. हालांकि पुलिस ने इस मामले में किसी को गिरफ़्तार नहीं किया है.
वीएचपी का पक्ष
वीएचपी के वरिष्ठ नेता पूर्णाचंद्रा मंडल के मुताबिक त्रिपुरा के कुल 51 जगहों पर बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमले की घटनाओं को लेकर विरोध प्रदर्शन किए गए थे.
उनके मुताबिक हिंसा तब शुरू हुई जब एक प्रदर्शनकारी पर अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों ने पत्थर से हमला किया और अशोक कुमार सरकार नाम के एक व्यक्ति को अस्पताल ले जाना पड़ा.
उनका दावा है कि पानीसागर पुलिस स्टेशन में इस घटना के बाद अशोक कुमार की पत्नी रानी शिल सरकार ने शिकायत भी दर्ज कराई है.
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'डरे हुए हैं अल्पसंख्यक'
स्थानीय मुस्लिम समुदाय में बार-बार हो रहे हमलों को लेकर डर का माहौल है, जो कि पूर्वोत्तर राज्यों के लिए नई बात है.
साल 2018 में हुए चुनाव में बीजेपी ने सीपीएम के नेतृत्व वाली लेफ़्ट सरकार को हराया था. लेफ़्ट राज्य पर 25 सालों तक सत्ता में रही थी.
इस घटना से चार दिन पहले राज्य में मुसलमानों के सबसे बड़े संगठन जमात-ए-उलेमा (हिंद) ने मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब से मुलाक़ात कर आगाह किया था कि ऐसी घटना हो सकती है और हिंदू और मुस्लिम समुदाय के बीच शांति को ख़तरा है.
इसी डेलीगेशन का हिस्सा रहे इमाम अब्दुल रहमान ने कहा, "अगर पुलिस और प्रशासन ने कड़ाई से परिस्थिति को संभाला होता तो ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता था."
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रहमान अगरतला शहर के जामा मस्जिद के मुख्य इमाम भी हैं. त्रिपुरा के लगभग 40 लाख लोगों में मुसलमानों की आबादी क़रीब 9 फ़ीसद है.
उन्होंने कहा, "इतिहास की बात करें तो त्रिपुरा में जब राजशाही थी तब भी और 1949 में भारत में विलय के बाद भी धार्मिक हिंसा कभी नहीं हुई है. पहली बार 2019 बैदादीगीह में एक संगठित भीड़ ने मस्जिदों और मुसलमानों पर हमला किया और अब ये पूरे राज्य में हो रहा है."
त्रिपुरा के शाही परिवार के प्रमुख प्रियदत्त किशोर देब बर्मा कहते है कि राज्य में हिंदू-मुस्लिम विभाजन एक हालिया घटना है जो कि 'धार्मिक ध्रुवीकरण के ज़रिए राजनीतिक फ़ायदे' के लिए किया जा रहा है.
वे कहते हैं, "त्रिपुरा में कभी हिंदू मुस्लिम के बीच झगड़े नहीं थे, दोनों सालों से शांति से रह रहे हैं और उनके साथ यहां के लोग भी रहते हैं. अब हम देख रहे हैं कि त्रिपुरा में कुछ गुट आ रहे हैं और मस्जिदों को जलाने और मुस्लिमों के ख़िलाफ़ नारे लगाने का काम कर रहे हैं."
"ये लोग बांग्लादेश के उन लोगों के बहकावे में आ रहे हैं जो चाहते हैं कि वहां से हिंदुओं को निकाला जाए और भारत के शेख हसीना की सरकार के साथ रिश्ते ख़राब हों. अगर वो बांग्लादेश में अपने लक्ष्य में कामयाब हो जाते हैं तो इसका असर सीधा इस इलाके के विकास पर पड़ेगा और पहले से ही घनी आबादी वाले इस राज्य में और रिफ्यूजी आ जाएंगे और यहां की शांति भंग होगी."
आरोप-प्रत्यारोप और राजनीति
देब बर्मन त्रिपुरा कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके हैं और उन्होंने सीएए और एनआरसी पर दोहरे मापदंड का आरोप लगाते हुए इस्तीफ़ा दे दिया था और एक नई पार्टी शुरू की. वे कहते हैं कि कि ये अलग-अलग घटनाएं नहीं है और उन्हें इसमें एक राजनीतिक डिज़ाइन दिखती है.
वे कहते हैं, "ये राजनीति से प्रेरित है क्योंकि जब समाज में धर्म के नाम पर ध्रुवीकरण होते हैं तो लोग रोज़गार, विकास, शिक्षा नहीं मांगते और सिर्फ़ हिंदू मुस्लिम के झगड़े में फंस जाते हैं."
"ये सत्ता में बैठी पार्टी की नाकामी को छुपाने के लिए किया जा रहा है और वो बांग्लेदेश में हुई हिंसा का फ़ायदा उठाना चाहते हैं. वो अगले महीने होने वाले नगर निगम चुनाव को ध्यान में रखकर ये कर रहे हैं."
त्रिपुरा तीन तरफ़ 856 किलोमीटर लंबे बॉर्डर से बांग्लादेश से घिरा है. लेकिन बांग्लादेश में बहुसंख्यक मुसलमानों द्वारा पूर्व में की गई हिंसा का यहां बहुत असर नहीं देखने को नहीं मिला है, सिवाय कुछ प्रदर्शनों के.
1980 में त्रिपुरा में बंगाली और आदिवासियों के बीच हिंसा हुई थी, जिसमें दोनों हिंदू मुस्लिम शामिल थे.
त्रिपुरा में आदिवासी विद्रोह और आज़ाद देश की असफल मांग को लेकर सशस्त्र विद्रोह का एक लंबा इतिहास रहा है और ग़ैर-आदिवासी बंगालियों पर हमला करते रहे हैं, वो उनपर आरोप लगाते हैं कि उन्होंने आदिवासी समुदाय को अल्पसंख्यक में बदल दिया है.
विपक्ष का आरोप
त्रिपुरा कांग्रेस ईकाई राज्य की राजधानी अगरतला में हालिया हिंसा के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन कर रही है. कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने ट्विटर पर लिखा, "हमारे मुसलमान भाइयों के साथ त्रिपुरा में हिंसा की जा रही है. हिंदू होने के नाम पर हिंसा और नफ़रत फैलाने वाले लोग हिंदू नहीं हैं. सरकार कब तक नहीं देखने और सुनने का नाटक करती रहेगी."
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सीपीआईएम के विधायक ने कहा, "त्रिपुरा में कभी भी हिंदू मुस्लिम झगड़े नहीं हुए हैं. 1992 में जब बाबरी मस्जिद को गिराया गया था तब भी राज्य में सिर्फ़ दो जगहों कालाछारा और पानीसागर में छिटपुट घटनाएं हुई थीं. यहां सभी समुदाय शांतिपूर्ण तरीके से रहते हैं लेकिन अब सांप्रदायिकता का ख़तरा बढ़ रहा है, ये कोविड-19 से भी ख़तरनाक है"
बीजेपी का दावा
वहीं, बीजेपी नेताओं का समूह जिनमें सांसद रेबाती त्रिपुरा और विधायक बिनय भूषण दास शामिल थे, हिंसा वाली जगहों पर पहुंचे और वहां रहने वालों से बात की. बिनय भूषण दास ने कहा कि मुख्यमंत्री ने संपत्ति के नुकसान के लिए मुआवज़े का एलान किया है.
उन्होंने ये भी बताया कि मामले में कोई गिरफ़्तारी नहीं हुई है.
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उन्होंने कहा, "मुमकिन है कि कुछ असामाजिक तत्व रैली में या बाहर से आए हों, और उन्होंने विपक्षी दलों के समर्थन से हिंसा फैलाई हो. पुलिस की जांच में सच सामने आएगा और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा."
बीजेपी सांसद विनोद सोनकर ने हिंसा के लिए तृणमूल कांग्रेस को ज़िम्मेदार ठहराया, जो त्रिपुरा में अपने पैर पसारने की कोशिश में हैं.
आरोपों पर जवाब देते हुए राज्य में टीएमसी की प्रभारी सुष्मिता देव ने कहा, "अगर हिंसा के पीछे तृणमूल है तो बिप्लब देव की सरकार और पुलिस किसी को गिरफ़्तार करने में कामयाब क्यों नहीं हो पाई. मुझे लगता है कि सरकार पुलिस के एक धड़े की मदद से आग में घी डालने का काम करके धर्म के नाम पर ध्रुवीकरण करने का काम कर रही है जैसा कि बीजेपी के डीएनए में है."
पुलिस का कहना है कि उन्होंने सुरक्षा के कड़े बंदोबस्त किए हैं. हालांकि उत्तर त्रिपुरा ज़िले के एसपी भानुपाड़ा चक्रवर्ती ने कहा कि पानीसागर इलाके में मस्जिद के जलाए जाने की ग़लत ख़बर सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही है.
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