पंजाब: चन्नी को मुख्यमंत्री बनाकर कांग्रेस की नैया संभलेगी या डूबेगी?

    • Author, अतुल संगर
    • पदनाम, संपादक, बीबीसी पंजाबी सेवा

कांग्रेस ने पंजाब में चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाकर एक बहादुरी भरा फ़ैसला लिया है.

चन्नी दलित-सिख समुदाय से ताल्लुक रखते हैं जिसकी आबादी पंजाब में सबसे ज़्यादा (32%) है.

इसमें कोई शक़ नहीं है कि सभी प्रमुख राजनीतिक पार्टियाँ अचानक हुए इस नए बदलाव पर ध्यान देने के लिए मजबूर हो गई हैं.

कैप्टन अमरिंदर सिंह को इस्तीफ़ा देने पर लगभग मजबूर करने और उनके उत्तराधिकारी के ऐलान में देरी के लिए कांग्रेस को आलोचनाओं का सामना करना पड़ा.

मगर इसके बाद अपने फ़ैसले से कांग्रेस हाईकमान ने पंजाब में अपने विरोधियों को हैरान कर दिया.

विरोधी पार्टियों को अब कुछ अलग करना होगा

वैसे तो पंजाबी लोग राज्य में होने वाले प्रगतिशील सामाजिक आंदोलनों पर गर्व करते हैं लेकिन यह एक तरह से चौंकाने वाली बात ही है कि सबसे ज़्यादा दलित आबादी वाले पंजाब को आज़ादी के बाद एक दलित मुख्यमंत्री मिलने में 74 साल लग गए.

पंजाब में दलितों की पहचान को लेकर काफ़ी पहले से आंदोलन होते रहे हैं जैसे कि साल 1932 में हुआ आद-धरम आंदोलन.

मगर इसी राज्य के मुख्यमंत्री अक्सर तथाकथित ऊँची जाति के हिंदू या जाट सिख रहे. पंजाब में ओबीसी समुदाय से मुख्यमंत्री भी बने लेकिन अब से पहले तक कोई दलित मुख्यमंत्री नहीं बना था.

बेशक़, पंजाब के दलित समुदाय के लिए यह ख़ुशी का मौका है. सुखबीर सिंह बादल की अगुआई वाली पार्टी अकाली दल ने वादा किया था कि अगर वो चुनाव जीतती है तो किसी दलित नेता को उप मुख्यमंत्री बनाया जाएगा.

अकाली दल ने बहुजन समाज पार्टी के साथ भी गठबंधन किया है लेकिन अब उसे कुछ बेहतर आइडिया सोचना होगा. आम आदमी पार्टी के सामने भी ऐसी ही चुनौती होगी.

पंजाब चुनाव 2022: दलित फ़ैक्टर कैसे काम करेगा?

लेकिन चरणजीत सिंह चन्नी की मुख्यमंत्री के रूप में पदोन्नति कांग्रेस के लिए सीधे-सीधे दलित वोटों में नहीं बदल जाएगी.

पंजाब में 32 फ़ीसदी दलित आबादी है और 117 विधानसभा सीटों में से 30 सीटें अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित हैं.

आरक्षित सीटों में से कई क्षेत्रों में अनुसूचित जाति के मतदाताओं की भरमार है तो कहीं दलित आबादी कम ही है.

कुल मिलाकर देखें तो राज्य में कुल 50 ऐसी सीटें हैं जहाँ की दलित आबादी चुनाव पर कुछ असर डाल सकती है.

बीएसपी के साथ गठबंधन वाले अकाली दल ने वादा किया था चुनाव जीतने पर उप मुख्यमंत्री दलित समुदाय के नेता को बनाया जाएगा. हालाँकि साल 2017 में बीएसपी को महज 1.59 फ़ीसदी वोट मिले थे.

असल में पंजाब में दलित वोट भी कई खाँचों में बँटे हुए हैं. वो स्थानीय मुद्दों, हितों और झुकाव के हिसाब से वोट देते हैं.

अगर ऐसा नहीं होता तो कांशीराम और मायावती के खड़े किए उम्मीदवार यहाँ लगातार चुनाव नहीं हारते.

वहीं, साल 1996 में जब कांशीराम ने चुनाव जीता तब अकाली दल और बीएसपी गठबंधन में थे.

ग़ैर दलित और जाट सिखों के वोट का क्या होगा?

जातियों और उप-जातियों में बंटे हुए समाज में चन्नी के मुख्यमंत्री बनने का मतलब जाट सिखों को ख़ुद से दूर करना भी है.

अगर ज़ैल सिंह के दौर को छोड़ दें तो पिछले 55 वर्षों में जाट सिख पंजाब में सत्ता के ढाँचे में सबसे ऊपर रहे हैं.

जाट सिख पंजाब की आबादी का 20-25 फ़ीसदी हिस्सा हैं और पारंपरिक तौर पर ये ताकतवर जाति रही है.

जाट सिखों के एक बड़े तबके को हरित क्रांति का फ़ायदा मिला है. पंजाब के आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक मामलों में इस समुदाय का काफ़ी दबदबा है.

साल 1966 में पंजाब के पुर्नगठन के बाद से ही जाट सिख हर क्षेत्र में सबसे आगे रहे हैं. अब राज्य का बदला राजनीतिक समीकरण नौकरशाहों के बीच चन्नी के लिए चुनौतियाँ पैदा कर सकता है.

अहम पदों पर काबिज नौकरशाह चन्नी की योजनाओं में देरी का कारण बन सकते हैं और अभी वक़्त ही सबसे महत्वपूर्ण है.

इससे भी अहम बात है, जिसकी तरफ़ पंजाब के राजनीतिक विश्लेषक भी ध्यान दिलाते हैं. उनका मानना है कि राज्य के कुछ तबकों को "अपने आदमी" को सर्वोच्च पद पर देखने की आदत है और मौजूदा हालात उन्हें असहज कर सकते हैं.

इन वजहों से जाट सिखों और तथाकथित ऊंची जाति के हिंदुओं के वोट कांग्रेस के लिए बंट सकते हैं.

हालाँकि अभी यह कहना मुश्किल है कि इसका फ़ायदा अकाली दल या आदमी पार्टी को मिलेगा या फिर किसी और को.

सत्ता विरोधी लहर से पार पा लेगी कांग्रेस?

चरणजीत सिंह चन्नी पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के मंत्रियों में से एक थे और वो उन नेताओं में से भी एक थे जिन्होंने अमरिंदर सिंह के ख़िलाफ़ बग़ावती सुर ज़ाहिर किए.

भले ही कांग्रेस ने कैप्टन अमरिंदर सिंह और उनसे जुड़ी सत्ता विरोधी लहर से पार पाने की कोशिश की हो लेकिन बाकी मंत्रियों और विधायकों से जुड़ी विरोधी लहर अब भी वैसे ही है.

यह लहर "बदले हुए शासन" को लेकर मतदाताओं के विचारों पर असर डालेगी.

जिन्होंने पिछले साढ़े चार साल में कैप्टन अमरिंदर के साथ सत्ता का लुत्फ़ उठाया है, वोटर उन पर अपने आप अचानक ही भरोसा नहीं कर लेंगे. भरोसे के लिए लोग जवाबदेही, एक्शन और सबूत माँगेंगे.

मतदाता, ख़ासकर दलित मतदाता अगले चार महीनों में चन्नी सरकार से ठोस काम की उम्मीद करेंगे. इसी के आधार पर वो तय कर पाएंगे कि उनके शासन के वादों में कुछ अलग है या नए पैकेट में पुराने सामान जैसा है.

काम करके दिखाना होगा

चन्नी पुराने शासन का हिस्सा थे और अब उन्हें अपने काम से साबित करना होगा कि उनका शासन पिछले शासन से बेहतर है. इसके लिए उनके पास ज़्यादा वक़्त नहीं है.

चन्नी और पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू को अब उन 18 बिंदुओं वाले एजेंडा के अधूरे वादों को पूरा करना होगा, जिसे पूरा ना कर पाने के लिए उन्होंने अमरिंदर सिंह को निशाना बनाया था.

अब जब अमरिंदर सिंह पद से हट गए हैं और महज़ चार महीनों के भीतर इन वादों को पूरा करना चन्नी की चुनौती होगी.

इन अधूरे वादों में ड्रग्स की समस्या में निबटना, हर परिवार के एक सदस्य को नौकरी देना, रेत और अन्य माफ़िया को ख़त्म करना और 2014-15 की फ़ायरिंग में मारे गए लोगों के परिजनों को न्याय दिलाना शामिल है.

चन्नी सरकार को इन सभी मुद्दों पर काफ़ी काम करना होगा क्योंकि इन्हें पहले नवजोत सिंह सिद्धू ने ही उठाया था जिसका बाद में कइयों ने समर्थन किया.

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