रामविलास पासवान के वो तीन सबक़ चिराग पासवान जिसका दे रहे हैं इम्तिहान
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- Author, प्रदीप कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
पाँच जुलाई, 2021 के प्रवेश करते ही चिराग पासवान ने अपने पिता रामविलास पासवान को याद करते हुए एक ट्वीट किया. उस ट्वीट से उनकी मौजूदा स्थिति से लेकर आने वाले दिनों के रोड मैप की झलक मिलती है.
चिराग पासवान ने लिखा है, "Happy Birthday Papa Ji. आपकी बहुत याद आती है. मैं आपको दिए वादे को पूरा करने की पूरी कोशिश कर रहा हूं. आप जहां कहीं भी हैं मुझे इस कठिन परिस्थिति में लड़ते देख आप भी दुखी होंगे. आप ही का बेटा हूं, हार नहीं मानूंगा. मैं जानता हूं आपका आशीर्वाद हमेशा मेरे साथ है. Love You Papa Ji."
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ज़ाहिर है चिराग पासवान के सामने मौजूदा समय में अस्तित्व बचाने का संकट है, कठिन परिस्थिति है. पिता भी नहीं हैं कि चिराग उनसे इसका समाधान पूछें. लेकिन सबसे अहम बात यह है कि उनकी लड़ाई किसी और से नहीं बल्कि अपने घर के लोगों से ही है.
ऐसे लोगों से जिन्हें रामविलास पासवान ने कभी अपने घर परिवार से अलग करके नहीं देखा. इस लड़ाई को लड़ने की शुरुआत चिराग पासवान अपने पिता के जन्मदिन पर उनके ही चुनावी क्षेत्र से कर रहे हैं.
चिराग के पटना निकलने से पहले उनकी मां रीना पासवान ने रामविलास पासवान के राजनीतिक जीवन और संघर्षों पर लिखी एक पुस्तक का विमोचन दिल्ली में किया है.
पेंगुइन प्रकाशन से प्रकाशित और वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप श्रीवास्तव की लिखी इस पुस्तक में रामविलास पासवान के 50 साल के राजनीतिक जीवन को सरल ढंग से बताया गया है.
पासवान से मिली सीख
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इस पुस्तक के पन्नों से गुज़रते हुए मालूम होता है कि पूरे परिवार को रामविलास पासवान ने जिस तरह से बढ़ाया, उन्हें राजनीति में स्थापित किया और सबको साथ लेकर चलने की कोशिश की उसे देखते हुए चिराग पासवान के लिए चाचा पशपुति पारस और चचेरे भाई प्रिंसराज का इस तरह अलग होना किसी बड़े झटके से कम नहीं रहा होगा.
इस पुस्तक के एक चैप्टर में चिराग पासवान अपने पिता के बारे में बताते हैं, "डैडी तीन बातों को हमेशा कहते रहे. पहली जो कुछ इंसान अपनी ग़लतियों से सीखता है वह बेहतर होता है. दूसरी मछली के बच्चे को तैरना नहीं सिखाया जाता, वह ख़ुद तैरना सीख लेता है. तीसरी हमेशा इस बात का ध्यान रखना, किसी ऐसे रास्ते पर कभी मत जाना जिससे परिवार और ख़ानदान पर आँच आए."
अजीब संयोग है कि रामविलास पासवान के गुज़रे अभी पूरे एक साल नहीं हुए हैं और चिराग पासवान के सामने इन तीनों सीखों पर खरा उतरने की चुनौती सामने है. चिराग के लिए सबसे बड़ा इम्तिहान तीसरी सीख है.
चिराग कहते हैं, "देखिए मैं तो अपनी ओर से भरसक कोशिश करता रहा कि परिवार एकजुट रहे. लेकिन मेरे पिता के निधन के बाद चाचा का बर्ताव ऐसा होगा, ये मैंने कभी नहीं सोचा था. छोटे चाचा के बेटे को तो मैं बच्चे से पढ़ाता आया था, हर तरह की मुश्किल को लेकर वह मेरे पास आता रहा था, लेकिन अब वह भी साथ नहीं है. अब मैं यही बात डैडी को चाहने वाले लोगों के बीच लेकर जाऊंगा. सर पर किसी बड़े का आशीर्वाद नहीं हो तो जनता के बीच जाना चाहिए."
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जनता के बीच जाने से पहले लोक जनशक्ति पार्टी पर अपना दावा मज़बूत होने की वजह भी चिराग बताते हैं.
उन्होंने कहा, "लोक जनशक्ति पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में कुल 75 सदस्य थे. इनमें से 66 सदस्यों का समर्थन मुझे प्राप्त है और पार्टी हमारे ही नेतृत्व में है, यह ज़रूर है कि पाँच सांसदों ने अलग गुट बना लिया है, लेकिन पार्टी का पूरा सपोर्ट मुझे मिल रहा है."
वहीं दूसरी ओर पशुपति पारस भी दावा कर रहे हैं कि उनके गुट के पास पाँच सांसदों के अलावा आम लोगों का बड़ा समर्थन है.
ऐसे में स्पष्ट है कि 2014 में भारतीय जनता पार्टी के साथ जाने के जिस फ़ैसले के चलते चिराग पासवान की जिस राजनीतिक सूझबूझ की बात होती रही है, अब उसका भी इम्तिहान होना है. उन्हें यह दर्शाना होगा कि राजनीति के तालाब में वे तैरना सीख चुके हैं.
उन्होंने हाजीपर से अपनी आशीर्वाद यात्रा शुरू करने का फ़ैसला किया है. हाजीपुर रामविलास पासवान का चुनावी क्षेत्र रहा है लेकिन फ़िलहाल पशुपति पारस वहां से सांसद हैं.
हाजीपुर से पासवान का लगाव
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2019 से पहले रामविलास पासवान इस सीट से चुनाव लड़ते आ रहे थे और यहीं से उन्होंने पहली बार 1977 में चुनाव लड़ा. पहले ही चुनाव में उन्होंने चार लाख 24 हज़ार से ज़्यादा रिकॉर्ड मतों से चुनाव जीतने का करिश्मा दिखाया था.
2019 में राम विलास पासवान ने हाजीपुर के मतदाताओं को पत्र लिखा कि ख़राब सेहत के कारण वे चुनाव नहीं लड़ेंगे और लंबे समय तक संसदीय सीट पर चुनाव इंचार्ज रहे छोटे भाई पशुपति पारस यहां से चुनाव लड़ेंगे. पासवान ने लोगों से ज़्यादा से ज़्यादा मतों से पशुपति पारस को जीताने की अपील की थी.
चिराग पासवान की राजनीति किस करवट बैठेगी, यह काफ़ी हद तक हाजीपुर में यात्रा के दौरान मिले जनसमर्थन से तय होगा. यह एक तरह से पशुपति पारस का भी इम्तिहान होगा क्योंकि सांसद भले यहां से रामविलास पासवान चुने जाते रहे हों लेकिन स्थानीय कार्यकर्ताओं से वास्ता पशुपति पारस का ही पड़ता रहा है.
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हालांकि वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार जयशंकर गुप्त के मुताबिक़ चिराग पासवान को अपना स्टैंड जल्द से जल्द स्पष्ट करना होगा, तभी जाकर राजनीतिक विरासत की लड़ाई में वे टिक पाएंगे.
वे कहते हैं, "चिराग पासवान ख़ुद को प्रधानमंत्री मोदी का हनुमान बताते रहे हैं. ऐसा लग रहा है कि इस परिस्थिति में राम ने हनुमान का जितना इस्तेमाल करना था कर लिया है. बीजेपी की मजबूरी भी है कि वह बिहार में नीतीश कुमार का साथ छोड़ नहीं सकती है. नीतीश कुमार किसी भी हाल में एनडीए में चिराग को नहीं चाहते हैं. ऐसे में चिराग को भी तय करना होगा कि वे किधर हैं?"
नीतीश कुमार का विरोध
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जयशंकर गुप्त के मुताबिक़, "चिराग ख़ुद को हनुमान भी बताएं और नीतीश कुमार पर सवाल भी उठाएं, ये एकसाथ नहीं चल पाएगा. इस लिहाज़ से उन्हें यह तय करना होगा कि वे क्या करेंगे. बीजेपी की चुप्पी ने भी उनकी समस्या को कई गुना बढ़ा दिया है. लेकिन उन्हें अपनी नीति भी चुननी होगी और नेता भी चुनना होगा."
दरअसल राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव ने भी चिराग पासवान को ऑफ़र दिया है लेकिन वह सशर्त ऑफ़र है जिसके तहत चिराग पासवान को पहले बीजेपी और संघ की नीतियों की आलोचना करनी होगी, तब राष्ट्रीय जनता दल उन्हें अपने साथ लेने पर विचार करेगा.
हालांकि चिराग पासवान इस ऑफ़र पर सोच विचार करने से पहले ख़ुद अपनी ताक़त भी आंकना चाहते हैं. संख्या बल के लिहाज़ से वे सबसे निचले पायदान पर हैं, पार्टी के पास कोई विधायक नहीं है, पाँच सांसद भी उनका गुट छोड़ चुके हैं.
हालांकि बिहार विधानसभा चुनाव में चिराग पासवान को भले कोई कामयाबी नहीं मिली लेकिन एक झटके में उन्होंने पार्टी का संगठन 143 विधानसभा सीटों पर फैला दिया. पहली बार इतने बड़े पैमाने पर चुनाव में उतरने के बाद भी चिराग पासवान 5.8 प्रतिशत वोट बटोरने में कामयाब हुए, यह पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में क़रीब-क़रीब एक प्रतिशत ज़्यादा था और एक करोड़ से ज़्यादा वोट भी मिल थे और तो और लोक जनशक्ति पार्टी ने कम से कम दो दर्जन सीटों पर नीतीश कुमार के उम्मीदवार को हराने की व्यवस्था कर दी.
2020 के विधानसभा चुनाव के दौरान बिहार में चिराग पासवान जिस आक्रामकता से नीतीश कुमार की आलोचना करते रहे हैं, उसे लेकर लोगों में उम्मीद भी बढ़ी है.
राज्य की राजनीति पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर कहते हैं, "चिराग पासवान अभी जिस तरह की मुश्किल में दिख रहे हैं, उससे यह नहीं माना जाना चाहिए कि वे बहुत बड़े संकट में हैं. दरअसल जिस दृढ़ता के साथ उन्होंने 2020 के बिहार विधानसभा में अपनी पार्टी का अभियान चलाया है, उससे लोगों में उम्मीद जगी है. उनके पास अपना एक विज़न है, जिसे उन्होंने बिहारी फ़र्स्ट का नाम दिया है. लेकिन इससे बड़ी बात यह है कि बीते 15-16 सालों में वे एक ऐसे नेता रहे जिसने नीतीश कुमार पर भ्रष्टाचार पर सीधा आरोप लगाया. तो उनमें संभावना तो दिख रही है."
बिहारी फ़र्स्ट की मुहिम
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जयशंकर गुप्त के मुताबिक़, आने वाले दिनों में चिराग पासवान की मुश्किल कम नहीं होने वाली है. वे कहते हैं, "चिराग पासवान को तब सबसे बड़ा झटका लगेगा जब नीतीश कुमार बीजेपी पर दबाव डलवा कर इनसे 12 जनपथ का बंगला ख़ाली करवा सकते हैं. इसकी चिंता भी उन्हें होगी क्योंकि लंबे समय से वे वहां रह रहे हैं. नीतीश कुमार किसी भी सूरत में चिराग को बीजेपी के ख़ेमे में देखना नहीं चाहेंगे."
लेकिन जयशंकर गुप्त मानते हैं कि राम विलास पासवान का अपने जातीय समाज पर ठीक ठाक असर था और उसकी वजह से लोगों की सहानुभूति चिराग पासवान के साथ हो सकती है, लेकिन हाल फ़िलहाल राज्य में कोई चुनाव नहीं है और लंबे समय तक लोगों को इंगेज रखना लोजपा के लिए बड़ी समस्य होगी. उन्हें साथ ही यह भी दिखाना होगा कि वे सड़कों पर उतरकर संघर्ष कर सकते हैं और आम लोगों से घुलमिल सकते हैं.
चिराग पासवान भी इसकी ज़रूरत को समझते हुए कहते हैं, "आशीर्वाद यात्रा के बाद मैं बिहार में पदयात्रा भी निकालने जा रहा हूं. बिहारी फ़र्स्ट की मुहिम को घर-घर तक पहुँचाना है. मेरे लिए अब बिहार के लोग ही सबकुछ हैं."
मणिकांत ठाकुर भी मानते हैं कि राजनीतिक समीकरणों के लिहाज़ से चिराग भले कहीं फ़िट नहीं बैठ रहे हों लेकिन उनकी ख़ासियत यही है कि वे कहीं भी फ़िट हो सकते हैं और जहां जाएंगे वह कुछ ना कुछ समर्थन जोड़ेंगे. मणिकांत ठाकुर ये भी मानते हैं कि चिराग पासवान को लेकर जो उम्मीद है वह केवल उनके जातिगत आधार को लेकर नहीं है बल्कि युवा पीढ़ी भी उन्हें उम्मीद से देख रही है.
लेकिन मौजूदा समय क्या चिराग अकेले चलने का जोखिम उठा पाएंगे, यह बात दावे से अब तक चिराग भी नहीं कह पा रहे हैं. लेकिन वास्तविकता में उन्होंने अपने सभी विकल्प खोल रखे हैं.
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