किसान आंदोलनः दिल्ली की सरहदों तक ही सीमित नहीं, जगह-जगह जुट रहे किसान

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इमेज कैप्शन, जींद में हुई किसान महापंचायत की तस्वीर
    • Author, दिलनवाज़ पाशा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 4 मिनट

केंद्र सरकार के तीनों कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ चल रहा किसान आंदोलन अब दिल्ली की सरहदों या हरियाणा-पंजाब तक ही सीमित नहीं रह गया है.

बुधवार को हरियाणा के जींद और रोहतक, उत्तराखंड के रुड़की और उत्तर प्रदेश के मथुरा में किसानों के मुद्दों को लेकर किसान महापंचायतों का आयोजन हुआ.

इन महापंचायतों में बड़ी संख्या में किसान जुटे. किसान नेता राकेश टिकैत ने जींद की महापंचायत में किसानों से 'दिल्ली चलो' का आह्वान किया है.

जींद के कंडेला में हुई किसान महापंचायत में भारी भीड़ जुटी. इस किसान महापंचायत की तस्वीरें सोशल मीडिया पर भी खूब शेयर की जा रहीं हैं. हरियाणा में गांव-गांव में किसान आंदोलन के लिए समर्थन भी जुटाया जा रहा है.

वहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी किसान संगठन सक्रिय हो गए हैं. अब तक मुज़फ्फरनगर, बागपत, बिजनौर और मथुरा में बड़ी किसान महापंचायतें हो चुकी हैं. पश्चिमी यूपी और हरियाणा की किसान महापंचायतों में बड़ी संख्या में महिलाएं भी शामिल हो रही हैं. इसे भी एक बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है.

इमेज कैप्शन, मथुरा में हुई किसान महापंचायत की तस्वीर

मथुरा की महापंचायत में राष्ट्रीय लोक दल और दूसरे राजनीतिक दलों ने भी हिस्सा लिया था. हालांकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की महापंचायतों में विपक्ष के नेता शामिल तो हो रहे हैं लेकिन उन्हें मंच से दूर ही रखा जा रहा है.

इन पंचायतों में आंदोलन की आगे की रणनीति और दिल्ली की सरहदों पर आंदोलन को और मज़बूत करने के मुद्दे पर चर्चा हुई है.

26 जनवरी के घटनाक्रम के बाद दिल्ली-उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर बॉर्डर पर प्रदर्शन कर रहे किसान नेता राकेश टिकैत की भावुक अपील के बाद उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान और हरियाणा में गांव-गांव में किसान सक्रिय हो गए हैं और किसान आंदोलन में अपना योगदान कर रहे हैं.

बुधवार को उत्तराखंड के रुड़की के मंगलौर में हुई किसान महापंचायत में भी भारी तादाद में किसान जुटे. वहीं मथुरा के बलदेव कस्बे में भी किसान पंचायत हो रही है. मथुरा में हो रही किसान महापंचायत में नेताओं ने आंदोलन को जमीन पर और मजबूत करने और जब तक तीनों क़ानून वापस न हों, आंदोलन को चलाए रखने का आह्वान किया.

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मथुरा के बलदेव में हुई किसान महापंचायत में राष्ट्रीय लोकदल के स्थानी नेता भी शामिल रहे. इस पंचायत में 6 फरवरी को प्रस्तावित देशव्यापी चक्का जाम को कामयाब करने की अपील भी की गई है.

उधर राजस्थान के दौसा जिले के मीन भगवान मंदिर मेंहदीपुर बालाजी में 1 फरवरी को हुई किसान महापंचायत में 5 फरवरी को एक और बड़ी किसान महापंचायत करने का फ़ैसला लिया गया है. इस दौरान पांच हजार ट्रैक्टरों का मार्च निकालने की घोषणा भी की गई है.

इस महापंचायत में मीणा समुदाय और दूसरी जातियों के लोग शामिल हुए. राजस्थान की महापंचायत में किसानों ने हर घर से एक किसान को दिल्ली की सीमाओं पर भेजने की घोषणा भी की है. 07 फरवरी को शाहजहांपुर बॉर्डर कूच करने का ऐलान भी किया गया. वहीं राजस्थन के अन्य जिलों में भी किसान महापंचायतें करने की घोषणा की गई है.

आने वाले दिनों में राजस्थान, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कई जिलों और गांवों में और भी किसान महापंचायतें होने जा रही हैं. इससे पता चलता है कि किसान आंदोलन अब यूपी और राजस्थान के भी गांव-गांव में फैल रहा है.

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इन महापंचायतों का एक स्पष्ट असर ये है कि अब बड़ी तादाद में किसान दिल्ली कूच कर रहे हैं. गाजीपुर बॉर्डर पर यूपी के बुलंदशहर से आए किसान संजीव गुर्जर कहते हैं, "यूपी में इन क़ानूनों के ख़िलाफ़ जाट-गूजर सब एक हो गए हैं. जब तक क़ानून वापस नहीं होंगे, धरना और मज़बूत होता रहेगा.'

वहीं बुलंदशहर के ही हामिद अली कहते हैं, "ये आंदोलन धर्म और जाति से बहुत ऊपर हो गया है. यहां कोई हिंदू या मुसलमान या जाट या गूजर नहीं है. सब किसान है. किसान अब अपनी आवाज़ उठाना सीख गया है. अब जब तक मांगें नहीं मानी जाएँगी, ये आंदोलन चलता रहेगा."

समाजवादी पार्टी से जुड़े हामिद अली के मुताबिक़ उनके गृह जिले में आंदोलन को मज़बूत करने के लिए गांव-गांव में लोग छोटी-छोटी पंचायतें कर रहे हैं.

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मेरठ से आए धर्मेंद्र मलिक कहते हैं, "इस किसान आंदोलन का अब उत्तर प्रदेश में राजनीतिक असर भी होगा. पिछले कुछ चुनावों में जाटों ने भाजपा को खुलकर वोट दिया था. अब प्रदर्शन में अधिकतर जाट ही शामिल हैं, ऐसे में ये लोग सरकार के ख़िलाफ़ वोट भी दे सकते हैं."

मलिक कहते हैं, "ये आंदोलन गांव-गांव में मजबूत हो गया है. लोग अब खेती-किसानों के मुद्दे पर बात कर रहे हैं. किसानों को लग रहा है कि उनकी धरती मां पर हमला हो रहा है, किसान को जो समझना था समझ गया है, अब क़ानून वापस कराकर ही हटेगा."

मेरठ के ही डब्बू प्रधान कहते हैं, "उत्तर प्रदेश में 1987 में बाबा महेंद्र सिंह टिकैत ने कांग्रेस की वीर बहादुर सिंह की सरकार के ख़िलाफ़ आंदोलन किया था. उसके बाद से यूपी में कांग्रेस की सरकार नहीं आई है. यदि ये आंदोलन और आगे बढ़ा तो इसके राजनीतिक प्रभाव दिखने लगेंगे."

ग़ाज़ीपुर प्रदर्शनस्थल पर मेरठ से आए एक और बुजुर्ग किसान कहते हैं, "हम सब किसान के बेटे हैं. किसान अब अपने साथ हो रहे अन्याय को समझ रहा है. हम झूठी सच्ची बातों में आ गए थे. पंद्रह लाख के लालच में फंस गए थे. लेकिन अब सब समझ आ रहा है. साफ़-साफ़ दिख रहा है कि हमला सीधे किसान पर हो रहा है."

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