कोरोना महामारी के दौर में इंटरनेट नहीं होना कितनी बड़ी मुसीबत?
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- Author, स्वामीनाथन नटराजन
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
कोरोना महामारी के दौरान इंटरनेट कई लोगों के लिए लाइफ़लाइन बन गया है. करोड़ों लोगों को घर से काम करने, मेडिकल सेवाएं लेने और एक दूसरे से जुड़े रहने का एकमात्र ज़रिया इंटरनेट ही रह गया है. कोरोना वायरस ने इंटरनेट पर हमारी निर्भरता को उजागर तो किया ही है, इसे मानवाधिकार की तरह देखे जाने वाले अभियान को भी प्रोत्साहन दिया है.
लेकिन कई लोगों के पास हाई स्पीड ब्रॉडबैंड या तो उपलब्ध नहीं है या उनके पास इतने पैसे नहीं हैं कि वो एक कनेक्शन ले सकें.
इंटरनेट के लिए छत पर जाने को मजबूर छात्र
केरल की रहने वालीं 20 साल की छात्रा नमिता नारायण फ़ोन और इंटरनेट की ख़राब कनेक्टिविटी से परेशान थीं. उनके मुताबिक, "मैंने अपने घर के आसपास और पड़ोस में कई जगहों पर इंटरनेट इस्तेमाल करने की कोशिश की, लेकिन कहीं भी अच्छा सिगनल नहीं मिला.
नमिता आगे बताती हैं, "जब भी कोई फ़ोन आता था, बात करने के लिए घर के बाहर भागना पड़ता था."
नमिता के गांव में हाई स्पीड ब्रॉडबैंड की सुविधा नहीं है. उन्होंने अलग-अलग सर्विस प्रोवाइडर के मोबाइल कनेक्शन लिए लेकिन किसी में भी स्पीड नहीं मिली. लॉकडाउन में पहले से ज़्यादा लोग फ़ोन का इस्तेमाल कर रहे हैं इसलिए सर्विस बदतर हुई है.
नमिता कहती हैं, "मैं सिगनल के लिए इधर उधर भागती रहती थी, लेकिन कहीं भी सही सिग्नल नहीं मिलता था,"
1 जून से नमिता के कॉलेज की ऑनलाइन पढ़ाई भी शुरू हो गई. उनके मुताबिक," मैं लेक्चर देख या सुन नहीं पाती थी. ख़राब कनेक्शन के कारण मैं परेशान थी."
वो बेहतर ऑडियो के लिए वीडियो को बंद कर देती थीं, बावजूद इसके आवाज़ अच्छी नहीं आती थी.
उनके मुताबिक, "मेरे कई दोस्तों को यही दिक्कत आ रही थी, उन्होंने अपने फ़ोन और नेटवर्क कनेक्शन बदल दिए."
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छत पर पढ़ने को मजबूर
इंटरनेट नमिता के लिए पढ़ने का एकमात्र ज़रिया है, वो न लाइब्रेरी जा सकती हैं, न ट्यूशन पढ़ने.
"मेरे पिता ने एक दिन कहा कि छत पर जा कर कोशिश करो, मैं लकड़ी की जिस सीढ़ी का इस्तेमाल आम तोड़ने के लिए करती हूं, उसी को लेकर छत पर पहुंच गई."
आइडिया काम कर गया.
वो कहती हैं, "छत पर मैं लेक्चर देखकर नोट्स ले सकती थी. कभी-कभी बारिश होती थी इसलिए मैं छाता लेकर जाती थी."
नमिता सिविल सेवा की तैयारी कर रही हैं, ख़राब कनेक्टिविटी उनकी तैयारियों पर असर डाल रहा था.
बेहतर कनेक्टिविटी से कई लोगों को फ़ायदे
देश और दुनिया के कई इलाकों में कनेक्टिविटी पिछले कुछ सालों में बेहतर हुई है. सस्ते स्मार्ट फ़ोन के कारण इंटरनेट बूम आया है जिसने कई आर्थिक और सामाजिक बदलाव के रास्ते खोले.
उदाहरण के लिए इंटरनेट की मदद से मौसम, कीटनाशक, सरकारी स्कीम और बाज़ार की जानकारियां किसानों और मछुआरों तक अब बहुत आसानी से और जल्दी पहुंच जाती है.
संयुक्त राष्ट्र ब्रॉडबैंड कमिशन ब्रॉडबैंड की कनेक्टिविटी को दुनिया की 75 प्रतिशत आबादी तक पहुंचाना चाहता है. अभी ये 60 प्रतिशत है. हालांकि एशिया और अफ़्रीका ने मुल्कों में ये आंकड़ा और भी कम है.
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डिजीटल डिवाइड
इंटरनेशनल टेलीकम्यूनिकेशन यूनियन के मुताबिक साल 2019 तक अमीर देशों में 87 प्रतिशत आबादी के पास इंटरनेट की सुविधा थी, वहीं कई कम विकसित देशों में ये आंकड़ा 19 प्रतिशत तक है. इसी रिपोर्ट के मुताबिक पुरुषों के मुकाबले महिलाओॆ तक इंटरनेट की पहुंच कम है.
रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के 58 प्रतिशत पुरुष इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं, महिलाओं में ये आंकड़ा 48 प्रतिशत है.
कम विकसित देशों की बात करें तो हर चार में से एक पुरुष के पास इंटरनेट की सुविधा है और हर 8 में से सिर्फ एक महिला के पास इंटरनेट सुविधा है.
इंटरनेशनल टेलीकम्यूनिकेशन यूनियन के सीनियर स्ट्रैटेडी एडवाइज़र एलेक्स वॉन्ग के मुताबिक, "जिन लोगों के पास कम स्पीड या ख़राब क्वालिटी का इंटरनेट है वो घर बैठे अपनी स्किल बेहतर नहीं कर पाते, उन्हें बेहतर नौकरी नहीं मिल पाती और परिवार और दोस्तों के कनेक्ट नहीं हो पाते."
रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर के क़रीब 75 करोड़ लोगो के पास इंटरनेट की सुविधा नहीं है. वॉन्ग कहते हैं, "130 करोड़े लोगों के पास सस्ता मोबाइल प्लान नहीं है."
द एलायंस फॉर अफोर्डेबल इंटरनेट एक वैश्विक गठबंधन है जो कि जो कि दुनियाभर में सस्ते इंटरनेट की वकालत करता है. वो चाहते हैं कि एक जीबी डेटा की कीमत किसी व्यक्ति के महीने की आमदनी के 2 प्रतिशत से ज़्यादा नहीं होनी चाहिए.
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रिसर्च मैनेजर टेडी वुडहाउस कहते हैं, " ये करने के कई तरीके हैं, इन्फ्रास्ट्रक्चर को साझा करना, मार्केट कॉम्पिटिशन को सपोर्ट करना, नेटवर्क ऑपरेशन की फीस कम करना और पब्लिक एक्सेस को सपोर्ट करना. ये सभी ऐसे फ़ैसले हैं, जिन्हें देश इंटरनेट एक्सेस को और सस्ता बनाने के लिए अपना सकते हैं."
वुडहाउस आगे कहते हैं, "आज की दुनिया में इंटरनेट के बिना होना बहुत नुकसानदेय है. जब तक हम अधिक लोगों को ऑनलाइन लाने के लिए निवेश नहीं करते हैं, तब तक यह डिजिटल विभाजन मौजूदा असमानताओं को और भी बदतर बनाता रहेगा. समय आ गया है कि हम इंटरनेट की सुविधा को आवश्यक, सार्वजनिक, ज़रूरी और बुनियादी अधिकार के रूप में पहचानें"
वर्ल्ड वाइड वेब के संस्थापक टिम बर्नर्स-ली का मानना है कि इसे लेकर जल्द क़दम उठाने की बहुत ज़रूरत है. उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में एक मीटिंग के दौरान कहा था, "हमारा सबसे बड़ा फ़ोकस डिजिटल डिवाइड को ख़त्म करने पर होना चाहिए."
बर्नर्स-ली ने कहा कि इंटरनेट ने अरबों लोगों को कोरोनो महामारी के दौरान "जीवन रेखा" प्रदान की है, जिससे काम, शिक्षा और सामाजिक कनेक्शन ऑनलाइन हो रहे हैं, लेकिन 3.5 बिलियन से अधिक लोग छूट गए हैं।
"ये समानता के रास्ते में एक बाधा है, और हम जानते हैं कि यह उन लोगों को सबसे अधिक प्रभावित करता है जो पहले से ही हाशिए पर हैं जैसे कि विकासशील देशों के लोग, कम आय वाले लोग, महिलाएं और लड़कियां."
संयुक्त राष्ट्र ने 2016 के एक प्रस्ताव में समानता के लिए कोशिश पर ज़ोर दिया था . प्रस्ताव में ऑनलाइन स्वतंत्रता को एक मानवीय अधिकार बाताया गया जिसका बचाव किया जाना चाहिए.
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केरल में अपने घर से बात करते हुए नमिता कहती हैं
"इंटरनेट एक बहुत शक्तिशाली उपकरण है। लेकिन जब कनेक्शन नहीं रहता जाता है, तो पढ़ाई करना मुमकिन नहीं होता. सभी को अच्छी गुणवत्ता और तेज़ स्पीड वाला इंटरनेट मिलना चाहिए। तभी सबके बीच समान स्पर्धा होगी.
इस बीच नमिता की हालात थोड़ी सुधरी है. उनकी बहन ने छत पर उसकी ली गई एक तस्वीर अपलोड की थी, जो वायरल हो गई। उसके बाद एक कनेक्शन प्रोवाइडर ने संज्ञान लिया औऱ उनके यहां नेटवर्क को बेहतर बनाया.
अब वो कमरे में पढ़ाई कर पा रही हैं. वह पढ़ाई की सामग्री का उपयोग कर रही हैं और दोस्तों से नोट्स बांट रही हैं.
ये नया कनेक्शन भी उसके कंप्यूटर पर वाईफाई इस्तेमाल करने के लिए पर्याप्त नहीं है, लेकिन वो अपने शिक्षकों से बात कर अपने सवाल पूछ पा रही हैं.
वो कहती हैं,"अब मैं लाइव स्ट्रीम वीडियो देख सकती हूं और पूरी तरह से कक्षा में भाग ले सकती हूं,"
हालांकि ग्रामीण इलाकों में उसके सभी दोस्त ऐसा नहीं कर सकते। मानसून की बारिश के हर वक़्त दौरान छत पर जाना भी मुमकिन नहीं होता."
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