तबलीग़ी जमात: निज़ामुद्दीन मरकज़ के मौलवी मोहम्मद साद कौन हैं?

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    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

तबलीग़ी जमात और इसके अमीर (नेता) मौलाना मोहम्मद साद कांधलवी इन दिनों सुर्ख़ियों में हैं.

उनके सुर्खियों में होने की वजह दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम है जिसके बाद देश भर में कोविड -19 के कई मामले सामने आए.

दिल्ली पुलिस ने मंगलवार को मौलाना साद के ख़िलाफ़ एक एफ़आईआर दर्ज की.

पुलिस का कहना है मौलाना ने निज़ामुद्दीन बस्ती में एक विशाल धार्मिक सभा आयोजित करके सरकार के आदेशों का उल्लंघन किया है.

मीडिया ने जब मौलाना साद को लापता बताना शुरू किया तो मंगलवार रात उन्होंने एक ऑडियो मेसेज जारी करके कहा कि वो इन दिनों ख़ुद आइसोलेशन में हैं.

अब लोग जानना चाहते हैं कि 55 वर्षीय मौलाना साद हैं कौन?

अगर आप गूगल करें तो उनके बारे में न तो कुछ ख़ास जानकारी मिलेगी और न ही उनकी तस्वीरें या वीडियो दिखेंगे. अगर कुछ लेख मिलेंगे भी तो ग़लत जानकारी के आधार पर लिखे मिलेंगे.

ऐसा इसलिए नहीं कि जमात और मौलाना ख़ुफ़िया तरीक़े से काम करते हैं. ऐसा इसलिए कि जमात टीवी, फ़िल्म, वीडियो और इंटरनेट वगैरह के ख़िलाफ़ है.

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निज़ामुद्दीन बस्ती के 'लोकल बॉय'

मौलाना साद के सबसे क़रीबी रिश्तेदार और उनके बहनोई मौलाना ज़िआउल हसन ने बीबीसो को फ़ोन पर बताया, "हमारे घरों में टीवी कभी नहीं आया. हम न टीवी देखते हैं और न तस्वीरें खिचवाते हैं."

जमात वालों की नज़रों में टीवी, फ़ोटो और फ़िल्में मायूब यानी धर्म के ख़िलाफ़ हैं. जमात के कई लोगों के पास मोबाइल फ़ोन भी नहीं हैं.

मौलाना साद के क़रीब रिश्तेदारों और उन्हें बरसों से जानने वालों से बातचीत के आधार पर उनकी एक तस्वीर उभर कर सामने आती है:

-वो निज़ामुद्दीन बस्ती के 'लोकल बॉय' हैं.

-तबलीग़ी जमात की लीडरशिप उन्हें विरासत में मिली है.

-वो इस्लाम के बहुत बड़े ज्ञानी नहीं हैं लेकिन संस्था पर पकड़ सख़्त है.

-वो दूसरों की कम सुनते हैं लेकिन एक साधारण व्यक्ति हैं और किसी को अपना दुश्मन नहीं मानते.

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इस्लाम के विद्वान नहीं माने जाते मौलाना साद

मौलाना साद 1926 में तबलीग़ी जमात की स्थापना करने वाले मौलाना मोहम्मद इलियास कांधलवी के पड़पोते हैं. एक तरह से कहा जा सकता है कि उन्हें जमात की लीडरशिप विरासत में मिली है.

उनका जन्म 55 साल पहले निज़ामुद्दीन बस्ती के उसी घर में हुआ जहाँ आज भी वो रहते हैं. उनका घर जमात के मुख्यालय यानी मरकज़ से सटा है.

जमात के लाखों सदस्य दुनिया के 80 से अधिक देशों में हैं, जिनमे पाकिस्तान, बांग्लादेश, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और अमरीका ख़ास हैं. मौलाना साद अपनी जमात के लाखों लोगों के रूहानी लीडर भी हैं.

अपने परदादा मोहम्मद इलियास और अपने दादा मोहम्मद यूसुफ़ के उलट मौलाना साद इस्लाम के विद्वान नहीं माने जाते. उनके बहनोई मौलाना हसन के अनुसार, "मौलाना साद की शिक्षा मरकज़ स्थित मदरसे काशिफ़ुल उलूम में मुकम्मल हुई."

मदरसे से इस्लामी तालीम हासिल करने के बावजूद उनका दर्जा जमात में इस्लाम के विद्वान और बड़ी शख़्सियत जैसे मौलाना इब्राहिम देओल और मौलाना अहमद लाट के बराबर नहीं था.

शायद इसलिए जब वो पांच साल पहले जमात के अमीर बने तो उन्हें इन बुज़ुर्ग आलिमों से उतनी इज़्ज़त नहीं मिली जितनी एक संस्था के लीडर को मिलनी चाहिए थी.

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जमात में फूट

नतीजा ये हुआ कि इनके बीच मतभेद बढ़ने लगे. तीन साल पहले जमात में फूट पड़ गई और ये दो धड़ों में बँट गई.

मौलाना इब्राहिम और मौलाना लाट, जो दोनों गुजरात के हैं और 80 साल की उम्र से अधिक के है, अलग हुए धड़े के सबसे जाने चेहरे हैं. इस गुट के साथ कितने लोग गए, इस बारे में सही जानकारी नहीं है.

कुछ कहते हैं 60 प्रतिशत अलग हुए गुट के साथ चले गए लेकिन कुछ दूसरे कहते हैं 10 प्रतिशत लोग नई जमात में शामिल हो गए.

संस्था में फूट मौलाना साद की लीडरशिप की पहली बड़ी परीक्षा थी जिसमे वो फ़ेल हो गए. जानकारों के अनुसार उनकी शख़्सियत की सबसे बड़ी कमज़ोरी उनकी ज़िद है. वो किसी की नहीं सुनते.

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मौलाना हसन जमात में फूट के लिए मौलाना साद को ज़िम्मेदार नहीं मानते.

वो कहते हैं, "मौलाना इब्राहिम और मौलाना लाट हर हफ़्ते एक नए अमीर (नेता) बनाने का आइडिया दे रहे थे. आप ही बताएं किसी संस्था या किसी कंपनी में अगर हर हफ़्ते एक नया नेता नियुक्त हो तो फ़ैसले कैसे लिए जाएंगे?"

जमात के दोनों गुटों से क़रीब ज़फर सरेशवाला कहते उन्होंने दोनों गुटों के बीच सुलह कराने की पूरी कोशिश की लेकिन उन्हें इसमें कामयाबी नहीं मिली.

वो कहते हैं, "मैं मौलाना साद को पिछले 40 सालों से जानता हूँ. वो साधारण से इंसान हैं. काफ़ी सिंपल हैं".

मौलाना के ज़िद्दी स्वभाव के बारे में उनके बहनोई मौलाना हसन कहते हैं, "ये इलज़ाम पूरी तरह से सही नहीं है. वो दुनिया भर में जमात के लीडर हैं और उन्हें कई मसलों पर फ़ैसले लेने होते हैं."

भारत में फूट का असर इसकी अंतरराष्ट्रीय शाखाओं पर भी पड़ा. उदाहरण के तौर पर बांग्लादेश की तबलीग़ी जमात पर अब मौलाना साद का असर बहुत कम है. पाकिस्तान का भी यही हाल है. हालांकि यूरोप और अमरीका में अब भी मौलाना साद के मानने वाले सदस्यों की संख्या अधिक है.

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