124 डिग्री पर तपती ज़मीन पर कैसे काम करते हैं मज़दूर

    • Author, अनंत प्रकाश और देबलिन रॉय
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, बागपत से

124 डिग्री तापमान. यानी उस तापमान से भी डबल, जिसे आपने शायद कभी झेला हो. ये कहानी ऐसे लोगों की है, जिनकी बनाई ईंटों के घरों में आप गर्मी, सर्दी से बचे रहते हैं.

लेकिन इन ईंट भट्ठों में काम करना कितना मुश्किल है?

ये आपको तब पता चलेगा जब आप ईंट भट्ठे पर काम करने वाले मज़दूरों की आंखों में झांककर देखेंगे. उनके पथरीले हो चुके जले हुए हाथों को छूकर देखेंगे.

उस ज़मीन पर खड़े होकर देखेंगे जहां वह लकड़ी की चप्पल पहनकर भट्ठी में कोयला झोंकते हैं.

यहां खड़े होना, काम करना और सांस लेना इतना ख़तरनाक है कि इस तापमान के एक तिहाई हिस्से यानी 40 डिग्री सेल्सियस को भारी गर्मी कहा जाता है.

अब सोचिए कि आख़िर ये लोग इतना ख़तरनाक काम क्यों करते होंगे.

ये भारत के उन करोड़ों असंगठित मज़दूरों की कहानी है जो 45 से 50 डिग्री सेल्सियस पर कड़ी धूप में काम करते हैं ताकि अपना और अपने बच्चों का पेट पाल सकें.

इमेज कैप्शन, लकड़ी की चप्पलें पहनकर काम करते मजदूर

लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ की हालिया रिपोर्ट कहती है कि साल 2030 तक भारत में ऐसी 3.4 करोड़ नौकरियां भी ख़त्म हो जाएंगी.

भारत में ऐसे लोगों की संख्या करोड़ों में है जो कड़ी धूप में सड़क किनारे पकौड़े बेचने, पंक्चर बनाने और पानी बेचने जैसे काम करते हैं.

वहीं, खेतों, बिस्किट बनाने वाली फैक्ट्रियों, धातु गलाने वाली भट्ठियों, दमकल विभाग, खनन, कंस्ट्रक्शन और ईंट भट्ठों पर काम करने वाले करोड़ों मज़दूरों पर इसका ज़्यादा असर पड़ेगा क्योंकि इन जगहों का तापमान पहले से ही अधिक रहता है.

कैथरीन सेगेट के नेतृत्व में तैयार की गई इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि बढ़ती गर्मी की वजह से दोपहर के घंटों में काम करना मुश्किल हो जाएगा जिससे मज़दूरों के साथ-साथ उन्हें काम देने वालों को भी आर्थिक नुक़सान होगा.

बीबीसी ने एक थर्मामीटर की मदद से ये जानने का प्रयास किया है कि असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाले करोड़ों मज़दूर कितने तापमान पर काम करते हैं और इसका उनकी सेहत पर क्या असर पड़ता है.

मजबूरी जला रही है गर्मी नहीं...

भट्ठे पर काम करने वाले मज़दूर राम सूरत बताते हैं, "यहां काम करना कोई आसान बात नहीं है. हमारी मजबूरी है, इसलिए कर रहे हैं. लकड़ी की चप्पल पहनकर काम करते हैं, रबड़ और प्लास्टिक वाली चप्पलें जल जाती हैं."

राम सूरत जिस जगह खड़े होकर काम कर रहे थे, उस ज़मीन का तापमान 110 डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा था.

वहीं, इस जगह की हवा का तापमान 80 डिग्री सेल्सियस था.

बीबीसी ने जब राम सूरत के शरीर पर थर्मामीटर लगाया तो तापमान 39 डिग्री सेल्सियस से शुरू होकर 43 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया.

संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट के मुताबिक़, शरीर का तापमान 39 डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा होने पर व्यक्ति की जान जा सकती है.

इन मज़दूरों के बीच कुछ घंटे बिताने के बाद ही बीबीसी संवाददाता को आंखों में जलन, उल्टी और सिर दर्द जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा.

इसके साथ ही इनके काम की जगह पर खड़े होकर बात करते-करते ऊंचे तापमान की वजह से बीबीसी संवाददाता के जूतों के सोल जल गए.

ऐसे में सवाल उठता है कि ऐसी जगह पर दिन भर काम करने वालों के शरीर पर इसका क्या असर पड़ता होगा.

वीडियो कैप्शन, 124 डिग्री पर तपती ज़मीन पर कैसे काम करते हैं मज़दूर

इसका जवाब राम सूरत देते हैं, "जब यहां काम करना शुरू करते हैं तो पेशाब में जलन होने लगती है. ये काम लगातार चलता रहता है. छह घंटे के काम में एक मिनट का भी आराम नहीं होता है. इससे बचने के लिए पानी पीना बंद कर दो तो पेशाब सफेद होने लगती है."

"डॉक्टर को दिखाया है. लेकिन वो कहते हैं कि भट्ठे पर काम करने की वजह से ये सब हो रहा है. काम न करें तो ठीक भी हो जाते हैं. लेकिन काम कहां छोड़ सकते हैं. मजबूरी है."

ये कहते हुए राम सूरत वापस भट्ठी में कोयला डालने लगते हैं ताकि आग जलती रहे.

इमेज कैप्शन, राम सूरत लोहे के जिस सरिये को को पकड़कर भट्ठी में कोयला डाल रहे हैं, इसका तापमान 50 डिग्री सेल्सियस से कहीं ज़्यादा था.

रिपोर्ट कहती है कि ईंट भट्ठों पर काम करने वाले मज़दूरों पर जलवायु परिवर्तन का ज़्यादा असर होगा क्योंकि ये अकसर निचले सामाजिक-आर्थिक तबक़े से आते हैं और जानकारी के अभाव में ये सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं से भी वंचित रह जाते हैं.

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायर्नमेंट से जुड़े निवित कुमार इस रिपोर्ट पर चिंता जताते हुए कहते हैं, "मुझे आश्चर्य है कि सिर्फ इस 3.4 करोड़ नौकरियों के आंकड़े पर है. क्योंकि हमारी जानकारी के मुताबिक़, आने वाले समय में इससे कहीं ज़्यादा लोगों की रोज़ी-रोटी प्रभावित होगी."

"ईंट भट्ठे पर 60-70 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर बिना किसी ख़ास सुरक्षा उपकरण के लगातार कई घंटे काम करना मुश्किल है. ये जहां खड़े होते हैं, उसके नीचे तो तापमान छह-सात सौ डिग्री सेल्सियस होता है. ऐसे में अगर गर्मी बढ़ेगी तब तो ये नौकरियां करना मुश्किल हो जाएगा."

ये लोग दस्तानों, मास्क समेत दूसरे अन्य सुरक्षा से जुड़े सामानों के बिना नंगे हाथों से ये काम करते रहते हैं ताकि अपने बच्चों के लिए रोजी-रोटी का जुगाड़ कर सकें.

खेतिहर मज़दूरों पर संकट?

पर्यावरण पर काम करने वाली पत्रिका 'डाउन टू अर्थ' की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, साल 2001 से लगातार हर रोज़ 10 हज़ार लोग किसानी छोड़कर खेतिहर मज़दूर बन रहे हैं.

इमेज कैप्शन, खेतिहर मजदूर श्रवण सिंह

बीबीसी ने अपनी पड़ताल में पाया कि बढ़ती गर्मी ने ऐसे खेतिहर मज़दूरों पर अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसी अन्य व्यक्ति के खेत पर मज़दूरी करने वाले साठ वर्षीय श्रवण सिंह बताते हैं कि उन्होंने अपने होश में इतनी गर्मी नहीं देखी है.

श्रवण सिंह बताते हैं, "हमने बहुत गर्मी देखी है. लेकिन इस साल जितनी गर्मी कभी नहीं देखी. अभी कल मेरी बच्ची ने थोड़ी देर काम किया और उसे उल्टी दस्त होने लगे. दवाई कराई किसी तरह, अब ऐसे में क्या करें? खाली हम बैठ नहीं सकते."

"इस बार बारिश पड़ गई होती तो अब तक ये फसल हमारे कंधे तक होती. लेकिन बारिश नहीं हुई. और गर्मी कितनी पड़ी ये बात जिसने झेली वो जाने. एसी में रहने वाले क्या जानें कि मज़दूर कितने तापमान पर उनके लिए अनाज पैदा करता है."

इमेज कैप्शन, खेत पर तापमान 52 डिग्री सेल्सियस

ख़त्म हुआ दोपहर का रोज़गार

बीबीसी की टीम जब हाइवे किनारे परंपरागत रोज़गार में लगे लोगों का हाल जानने पहुंची तो वहां का तापमान 48 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड दर्ज किया गया.

इमेज कैप्शन, हाइवे किनारे गाड़ियां सुधारने का काम करने वाले मैकेनिक मोहम्मद मुस्तकीम सैफ़ी

हाइवे किनारे मोटर साइकिल ठीक करने वाले मोहम्मद मुस्तकीम सैफ़ी बताते हैं कि पिछले कुछ साल से दोपहर 12 बजे से 5 बजे तक काम बिल्कुल नहीं आता है.

सैफ़ी बताते हैं, "गर्मी अब इतनी बढ़ने लगी है कि दिन भर कोई काम नहीं आता है. पूरा परिवार लगा है इस काम में. लेकिन अब काम ही नहीं आता. 12 बजे के पास सड़क पर सन्नाटा खिंच जाता है."

"अल्लाह ही जाने आने वाले सालों में जब और गर्मी बढ़ेगी तो हमारा क्या होगा. कौन हमारी मदद करेगा? मोदी सरकार से तो कोई उम्मीद नहीं है. अब बस अल्लाह का ही सहारा है."

निवित कुमार बताते हैं, "आने वाले समय में गर्मी इतनी बढ़ेगी कि परंपरागत तरीक़े से ऐसे काम करना मुश्किल हो जाएगा. ऐसे में ऐसे तमाम उद्योगों को अपने आपको बदलना होगा. उदाहरण के लिए अगर ईंट भट्ठों को मशीनीकरण की ओर ले जाया जाए तो इस समस्या का कुछ निदान निकल सकता है. लेकिन सरकार को इस बारे में गंभीरता से सोचना होगा."

"पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कुछ भट्ठों ने अपनी तकनीक में बदलाव लाकर, मजदूरों के लिए आराम करने की जगह बनवाकर पाया है कि उनका उत्पादन पारंपरिक भट्ठों के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा हो रहा है. ऐसे में हमें ये समझना होगा कि आने वाले समय में हम पुराने तौर-तरीक़ों से व्यवसायों को नहीं चला सकते हैं. और हमें बदलना ही होगा."

"उदाहरण के लिए, भट्ठों को ज़िग-ज़ैग तकनीक से चलाकर प्रदूषण कम किया जा सकता है, इसके अलावा अगर उन्हें आधुनिक फैक्ट्रियों की शक्ल दे दी जाए तो यहां लोगों को साल भर रोज़गार मिल सकता है."

भारत में नए रोज़गार पैदा करना अब भी राजनीतिक पार्टियों के लिए एक समस्या बना हुआ है.

ऐसे में सवाल उठता है कि अगर बढ़ती गर्मी इन पारंपरिक रोज़गारों के लिए ख़तरा पैदा करेगी तो ऐसे रोज़गारों में लगे लोग अपना और अपने बच्चों का पेट कैसे पालेंगे.

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