गुजरात में प्रचार के अंत में 'विकास' भगवा क्यों हो गया?
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- Author, अर्चना पुष्पेंद्र
- पदनाम, बीबीसी गुजराती संवाददाता
गुजरात विधानसभा के लिए मैदान में उतरे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहली जनसभा याद करते हैं तो उसमें "मैं हूं विकास, मैं हूं गुजरात" के नारे लगाये जा रहे थे.
'अडीखम गुजरात' (अडिग गुजरात) कह कर लोगों को वहां हुए विकास के बारे में बताया जा रहा था, लेकिन चुनाव प्रचार का अंत आते-आते वो साफ़्ट हिंदुत्व से प्रेरित हो गया.
'विकास पगला गया है'
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विकास की गाड़ी पाकिस्तान, औरंगज़ेब, अलाउद्दीन ख़िलजी और तीन तलाक़ पर आ कर रुक गई. इस तरह का प्रचार दूसरे चरण के मतदान को कितना प्रभावित करेगा?
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वरिष्ठ पत्रकार अजय उमट कहते हैं, "विधानसभा चुनावों की तारीखें तय भी नहीं हुई थीं उससे पहले ही कांग्रेस ने "विकास पगला गया है" अभियान के तहत भाजपा के ख़िलाफ़ माहौल बना दिया था. सोशल मीडिया में 'विकास पगला गया है' वायरल होने तक भाजपा को उसकी भनक नहीं लगी थी. जब भाजपा को इसकी जानकारी हुई तो उन्होंने 'मैं हूं विकास, मैं हूं गुजरात' और 'अडीखम गुजरात' जैसे नए नारों के साथ प्रचार में एंट्री की. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी शुरुआती रैलियों में बार-बार विकास के कामों को गिनाते थे."
वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिशें
अजय उमट ने कहा, "दूसरी तरफ कांग्रेस ने गुजरात मॉडल पर सवाल उठाने जारी रखे. राहुल गांधी ने ओबीसी, अल्पसंख्यकों, दलितों, किसानों और बेरोज़गारी पर सवाल उठाए. इस दौरान राहुल ने हार्दिक से मुलाकात की. इसके अलावा, खाम रणनीति यानी क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुस्लिम मतों को अपने साथ एक जुट करने की कोशिश की."
भाजपा को जब कांग्रेस की इस रणनीति का आभास हुआ तो उन्होंने हिंदुत्व के मुद्दे को उठाना शुरू किया.
इस तरह से गुजरात के चुनाव में भाजपा ने औरंगज़ेब, अलाउद्दीन ख़िलजी, तीन तलाक़ और पाकिस्तान के मुद्दे को उछाल कर वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिशें कीं.
इस बार टक्कर कीलड़ाई
वरिष्ठ पत्रकार आर के मिश्रा कहते हैं, "अनुमान के मुताबिक पहले दौर के मतदान में ग्रामीण वोट अपने ख़िलाफ़ जाते देख भाजपाई खेमे में ख़ौफ़ बैठ गया जिसकी वजह से उन्होंने अपने प्रचार का मुद्दा ही बदल दिया."
वो आगे कहते हैं, "जब मोदी मुख्यमंत्री थे तब भी हमने उनके भाषण की यह शैली देखी है, लेकिन प्रधानमंत्री के पद को इस स्तर की राजनीति शोभा नहीं देती."
उन्होंने कहा कि 'जिस तरह हार्दिक की रैलियों में भीड़ उमड़ रही थी उससे तो ऐसा लगता है कि इस बार लड़ाई टक्कर की है. गुजरात की जनता सब कुछ देख रही है, परिणाम में इसका प्रभाव देखने को मिलेगा.'
विकास पर हिंदुत्व को तरजीह क्यों?
राजनीतिक विशेषज्ञ अच्युत याग्निक कहते हैं, "जब भाजपा को लगने लगता है कि केवल विकास की बातों से काम नहीं चलेगा तो वो हिंदुत्व का मुद्दा उठाती हैं. जब मोदी मुख्यमंत्री थे तब भी 2001-02 के चुनाव के दौरान अक्सर परवेज़ मुशर्रफ़ का नाम 'मियां मुशर्रफ़' के रूप में लिया करते थे. जैसे-जैसे चुनाव प्रचार आगे बढ़ा विकास का मुद्दा पीछे रह गया. कांग्रेस ने शुरू से ही भाजपा को विकास के मुद्दे पर ही चुनौती दी थी.''
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कांग्रेस के प्रचार में बदलाव नहीं
याग्निक कहते हैं, "कांग्रेस ने शुरुआत से अब तक अपने प्रचार का अंदाज़ नहीं बदला. पार्टी ने बेरोज़गारी को शुरू से ही अहम मुद्दा बनाया है. इस बार राहुल ने पूरे गुजरात का दौरा किया है और यहां की ज़मीनी समस्याओं को समझा है. इसी दौरान जब उन्होंने भाजपा से 'विकास' का पता पूछा तो भाजपा बौखला गई और उसने अपने प्रचार का तरीका ही बदल दिया.''
गुजरात के मतदाता भाजपा के इस एजेंडे को समझ पायेंगे कि नहीं उसके जवाब में याग्निक कहते हैं कि 'शहर के मध्यमवर्ग का झुकाव अब भी भाजपा की ओर हो सकता है, लेकिन ग्रामीण मतदाता कांग्रेस का समर्थन कर सकते हैं.'
छोटे और मध्यम उद्योग ख़त्म होने के कगार पर हैं. वहीं जीएसटी की वजह से कारोबारी परेशान हैं. ऐसे में लग रहा है कि गुजरात के इस बेटे को उनका गृह राज्य इस चुनाव में पूरी थाली सजा कर देने वाला नहीं है.
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