लड़कियों के साथ #MeToo पोस्ट पर लड़के क्यों?

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- Author, पायल भुयन
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
सोशल मीडिया पर हैशटैग 'मी टू' में महिलाओं के साथ-साथ अब पुरुष भी शामिल हो गए हैं और अपने यौन उत्पीड़न के अनुभव साझा कर रही हैं.
वो हैशटैग 'हाओ विल आई चेंज' का भी इस्तेमाल कर रहे हैं.
इनमें वो न सिर्फ आपबीती सुना रहें है बल्कि इस बात की भी चर्चा हो रही है कि क्या उन्होंने कभी किसी को अपने यौन उत्पीड़न का शिकार बनाया है.
क्या कहते हैं आंकड़े
यूनीसेफ के एक आंकड़े के मुताबिक़ दुनिया में एक करोड़ बीस लाख लड़कियां ऐसी हैं जो कभी न कभी यौन उत्पीड़न का शिकार हुई हैं. इन लड़कियों को ये तजुर्बा 20 साल या उससे कम उम्र में झेलना पड़ा है.
यानी हर 10 में से एक लड़की ने अपने जीवन में कभी न कभी यौन उत्पीड़न का सामना किया है.
इस रिपोर्ट के मुताबिक़ लड़के भी यौन उत्पीड़न के ख़तरे से अछूते नहीं. हालांकि इस पर कोई ठोस वैश्विक आंकड़ा उपलब्ध नहीं हैं.
ज्यादातर मामलों में लोग ऐसी बातें करने से कतराते हैं. शर्मिंदगी इसकी एक बड़ी वजह है .
लड़कों के साथ होने वाला यौन उत्पीड़न खुलकर सामने नहीं आ पाता है. पीड़ित शर्म औऱ डर के वजह से अपनी बात नहीं कह पाता है. एसे में जागरूकता की ज़रत है कि यौन उत्पीड़न लड़का औऱ लड़की दोनो के साथ हो सकता है .

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वो मेरे भाई का सबसे अच्छा दोस्त है
नितिश आनंद पेशे से एक मॉडल हैं और पढ़ाई पूरी कर रहे हैं.
वो अपने अनुभव के बारे में बताते हैं, ''मैं तब चौथी क्लास में था जब मेरे साथ ये सब हुआ. वह मेरे भाई का सबसे अच्छा दोस्त था. वह आराम से हमारे घर आ-जा सकता था. उसने एक दिन मुझे खेलने के बहाने बुलाया और धमकाने लगा. उसने कहा कि जैसा वो कहता है वैसा नहीं किया तो भगवान पाप देंगे.
नीतिश ने बताया , ''वह शख्स मेरे साथ पेनिट्रेटिव सेक्स करता था. मुझे बहुत दर्द होता था. पर घर में बताने की हिम्मत कभी नहीं पड़ी. एक बार हिम्मत जुटा कर दादा जी को बताया तो उन्होंने कहा चुप रहो.''
नितिश को अपने साथ हुआ ये वाक्या आज भी रह-रह कर याद आता है. वो कहते हैं कि आज भी उन्हें अपनी बात रखने में डर लगता है. आज भी वो मंज़र याद कर सहम जाते है.
मनोचिकित्सक जयंती दत्ता कहती हैं कि बच्चों के साथ यौन उत्पीड़न के मामले में अमूमन घर वाले बच्चों पर भरोसा नहीं करते. यहीं से सारी परेशानी शुरू होती है.
वो कहती हैं कि भारत में 90 प्रतिशत बच्चे यौन शोषण के शिकार हैं. उनके मुताबिक़ इन मामलों में सबसे ज्यादा क़रीबी शामिल होते हैं. इसलिए बच्चों को यौन शिक्षा , गुड टच बैड टच बताना बहुत ज़रूरी है.

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अब भी याद आता है बचपन का हादसा
सुबोध एक छात्र हैं और बचपन में हुए हादसे ने उनका पीछा अब तक नहीं छोड़ा है.
वो बताते हैं ''मैं चौथी-पांचवी कक्षा में था. हमारे घर के पास एक ही दर्जी था, हम उसी से कपड़े सिलवाते थे. नाप लेते वक्त वो मेरे गुप्तांगों को छूने की कोशिश करता था. पहले तो मुझे कुछ समझ नहीं आया, पर उसका छूना मुझे अच्छा नहीं लगा. और कभी घर पर बताने की हिम्मत नहीं हुई. आज भी जब कभी मेट्रो या बस में कोई छू लेता है तो पहले वाला एहसास वापस आ जाता है. आज भी में ब्लैंक हो जाता हूं. ''
सुबोध कहते हैं कि लड़को के लिए यौन उत्पीड़न के बारे में बात करना उतना आसान नहीं. वो कहते हैं कि पहले तो बताने में शर्म आती है, और फिर बाद में लोग मज़ाक उड़ाते हैं और कहते हैं, तुम लड़के हो यार!
जयंती दत्ता कहती हैं कि यौन शोषण जेंडर देख के नहीं होता. लड़का या लड़की कोई भी सुरक्षित नहीं.
वो कहती हैं कि आप इतने सहमे होते हैं, आपको लगता है कि ये तो आपके जानकार हैं फिर कैसे आप इनके ख़िलाफ़ बोल सकते हैं. क्या आपके बोलने से लोग कहीं आपको तो ग़लत नहीं समझेंगे. और बचपन में हुए ये हादसे आपका पीछा ताउम्र करते हैं.
यौन उत्पीड़न के शिकार लोगों में अमूमन मनोवैज्ञानिक और शारीरिक परेशानियां हो जाती हैं, मसलन सांस लेने में तकलीफ, हकलाना, उनके बर्ताव में बदलाव आ जाता है, रिश्तों में समस्या, और यहां तक कि यौन संबंधो में भी दिक्क़त का सामना करते हैं.

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एनसीआरबी के आंकड़े
एनसीआरबी की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार साल 2014-2015 में देश में दुष्कर्म की 34,651 वारदातें हुई हैं.
इनमें सबसे ज्यादा 4,391 वारदातें मध्य प्रदेश में हुई हैं.
क्या करें
जयंती दत्ता कहती हैं कि अभिभावकों को ज़रूरत है कि अपने बच्चों से बात करें , उन्हें यौन शिक्षा के बारे में बताएं.
और जो लोग इस समस्या से गुज़र चुकें हैं वो किसी प्रोफेशनल मनोचिकित्सक की मदद जरूर लें.
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