17 साल बाद बेगुनाही का सबूत लेकर लौटे वानी

वीडियो कैप्शन, 'मैं बेगुनाह हूं, यह समझाने में 17 साल लगे'
    • Author, माजिद जहांगीर
    • पदनाम, कश्मीर से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

भारत प्रशासित कश्मीर के बारामुला ज़िले के टॉपरपटन गांव के गुलज़ार अहमद वानी को सत्रह साल बाद अदालत ने कुछ दिनों पहले बरी किया है.

साल 2000 में उन्हें साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन में धमाके करने के इल्ज़ाम में दिल्ली के आज़ादपुर इलाके से गिरफ़्तार किया गया था.

साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन धमाके में नौ लोग मारे गए थे.

इमेज स्रोत, courtesy- Majid jahangir

इमेज कैप्शन, गिरफ़्तारी से पहले की गुलज़ार अहमद वानी की तस्वीर.

गिरफ़्तारी के समय गुलज़ार अहमद की उम्र महज़ 26 साल थी. उस वक्त वो अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में अरबी में पीएचडी कर रहे थे.

उन्होंने बीबीसी को बताया, "जिस समय मुझे दिल्ली से गिरफ़्तार किया गया उस समय दुनिया भर में आतंकवाद के ख़िलाफ़ जंग की शुरुआत हुई थी. भारत में एनडीए की सरकार थी. भारत सरकार छात्र संगठन सिमी पर प्रतिबंध लगाना चाहती थी और ये दिखाने की कोशिश की गई कि कश्मीरियों और सिमी में आपसी संबंध है. इसके बाद कुछ धमाकों के मामले में सिमी पर आरोप लगने के कारण मुझे भी गिरफ़्तार कर लिया गया."

हालांकि वानी ने इस बात से इंकार किया कि सिमी से उनका कभी कोई संबंध रहा है.

इमेज स्रोत, Majid jahangir

वानी अचानक कहीं जैसे गुम हो जाते हैं और गहरी सोच में डूब जाते हैं.

वानी बताते हैं कि जिस दिन उन्हें गिरफ़्तार किया गया उसके दस दिन बाद उनकी गिरफ़्तारी दिखाई गई. उन्होंने बताया कि इस दौरान उन्हें जिस तरह की प्रताड़ना झेलनी पड़ी वो बताया नहीं जा सकता.

इमेज स्रोत, Majid jahangir

घर लौटने के बाद वानी बहुत कम लोगों को पहचान पा रहे हैं.

वह कहते हैं, "किसी किसी को तो चहरे से पहचान पाता हूँ किसी को नाम से. जो घर और पड़ोस की नई पीढ़ी है उनको तो बिलकुल ही नहीं पहचानता हूँ."

सबसे बड़ा नुकसान पढ़ाई का

वानी कहते हैं कि जेल में बिताए गए सत्रह सालों के दौरान सब से बड़ा नुकसान पढ़ाई पूरी न होने का है. वो कहते हैं, "मेरी पढ़ाई पूरी न होना मेरे लिए सबसे बड़ा नुकसान है. और शायद इंसानियत की भी कुछ सेवा हो पाती, जो ना हो सकी."

साहित्य पढ़ने का शौक़ रखने वाले वानी को जेल में किताबें पढ़ने को नहीं मिलती थी. फिर भी जो भी किताब उनके हाथ लगती वो उसे पढ़ते थे.

उन्होंने बताया, "मैंने चे ग्वेरा तक को भी पढ़ा है. बचपन से ही साहित्य पढ़ने का शौक़ रहा है. मैंने जेल में पीएचडी पूरी करने की कोशिश की थी लेकिन ऐसा नहीं करने दिया गया. फिर मैंने हिंदी में एमए करने की भी कोशिश की, लेकिन वो भी नहीं करने दिया गया."

इमेज स्रोत, Majid jahangir

पीएचडी के बिना शादी नहीं

जिस दिन अदालत में उनके मुकदमे की सुनवाई होनी थी उस दिन उनके दिल में एक खौफ था. लेकिन उन्होंने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा था.

उन्होंने बताया, "खौफ तो था ही क्योंकि अदालतों में एजेंसीज का दबाव रहता है, लेकिन मुझे ऐसे जज मिले थे, जो बहुत बेबाक थे और जो मेरे ख़िलाफ़ बनाए गए मामले थे वो फर्जी थे. वो पूरी तरह से बेबुनियाद थे. इसलिए मुझे तो इंसाफ़ मिलना ही था."

जब उन्हें गिरफ़्तार किया गया था, उस समय वानी शादी करने की भी सोच रहे थे. वह आज भी इस सदमे में हैं और कहते हैं कि जब उनकी पीएचडी पूरी अभी नहीं हुई है तो शादी का कैसे सोच सकते हैं.

ये पूछने पर कि आपको सबसे ज्यादा गुस्सा किस बात पर आ रहा है तो उन्होंने कहा, "नहीं, मुझे किसी पर कोई गुस्सा नहीं है. सब को ख़ुदा के आगे जवाब देना है."

इमेज स्रोत, Majid jahangir

इमेज कैप्शन, अपने गांव में लोगों से घिरे हुए गुलज़ार अहमद वानी.

अफ़ज़ल से मुलाक़ात

तिहाड़ जेल में रहने के दौरान वानी की कई बार अफ़ज़ल गुरु से मुलाक़ात हुई थी. वानी कहते हैं कि अफ़ज़ल गुरु के साथ जब भी बातें होती थीं तो कश्मीर के बारे में बातें होती थीं.

वह ये भी कहते हैं कि अफ़ज़ल कश्मीर की आज़ादी के बड़े समर्थक और हीरो थे.

साबरमती एक्सप्रेस धमाके में मारे गए लोगों के बारे में वानी कहते हैं कि उन्हें उनके परिजनों से पूरी हमदर्दी है.

इमेज स्रोत, Majid jahangir

इमेज कैप्शन, गुलज़ार अहमद के पिता गुलाम मोहमद वानी

किसी से शिकवा नहीं, ख़ुदा सब देख रहा है

गुलज़ार अहमद के पिता गुलाम मोहमद वानी की आँखों में आंसुओं का एक समंदर है जो बहना चाहता है. बीते सत्रह सालों के बारे में वह कहते हैं, "ये तो मैं ही जानता हूँ कि मेरे सत्रह साल किन तकलीफों में गुजरे है. जब एक बाप उस बेटे की तलाश में निकले, जिस पर मेरा उस समय तक का सारा सरमाया खर्च हुआ था, क्योंकि मैं एक बहुत छोटा चौथे दर्जे का कर्मचारी था. और उन हालात में भी मैंने बेटे को पीएचडी तक पढ़ाया था."

गुलाम मोहमद को एक अख़बार के जरिए अपने बेटे की गिरफ़्तारी की ख़बर मिली थी.

वो कहते हैं, "जब मैंने ये ख़बर सुनी कि मेरा बेटा धमाकों के इलज़ाम में गिरफ़्तार हुआ है तो मुझ पर जैसे आसमान टूट पड़ा हो. उसने सारी उम्र पढ़ाई में ही खर्च की है. ये तब छोटा बच्चा था जब हम ने गुलज़ार को भारत के एक मदरसे में पढ़ाई के लिए भेजा था. जो इलज़ाम उनपर लगाए गए थे उसके बारे में हम तो सोच भी नहीं सकते थे."

इमेज स्रोत, Majid jahangir

अपने बेटे की बेगुनाही पर वो कहते हैं, "मेरा बेटा एक स्कॉलर था, जिसने दो बार नेट की परीक्षा पास की थी. उनके जो सत्रह साल बर्बाद हो गए वो कौन देगा? उसकी तो सारी उम्र बर्बाद हो गई."

गुलाम मोहमद पुलिस के ख़िलाफ़ किसी कार्रवाई की मांग नहीं कर रहे हैं. वो सिर्फ़ यह कहते हैं कि ख़ुदा सब देख रहा है.

वो बताते हैं, "जब बेटे से मिलने जाते थे तो हमको भी शक़ की नज़र से देखा जाता था. बेटा जेल में मुजरिम था और हम बाहर मुजरिम थे. इलज़ाम साबित होने के बगैर ही उनको मुजरिम साबित करने की कोशिश की गई."

इस बीच गुलज़ार अहमद की दो बहनों और एक भाई की शादी भी हो गई जिनमें वो शिरकत नहीं कर सके.

इमेज स्रोत, Majid jahangir

इमेज कैप्शन, गुलज़ार अहमद की माँ सराह बेगम

गुलज़ार अहमद की माँ सारा बेगम के दिल का बोझ बेटे के घर वापस आने से हल्का हो गया है.

वह कहती हैं, "पूरी उम्र तो बेटे ने जेल में गुजारी. गिरफ़्तारी के आठ महीने के बाद मैंने बेटे को देखा था. मैं तो हमेशा कहती थीं कि अब गुलज़ार अगली ईद पर घर पहुंच जाएगा. लेकिन ऐसा पूरे सत्रह सालों तक हम सोचते रहे. ईद आती तो थी लेकिन मेरे लिए कोई ख़ुशी नहीं होती. बहनों की जब शादी हुई तो वह रोते-रोते गुलज़ार बिना ही अपने घरों को रुख़्सत हो गईं. तीनों शादियों पर उनके बिना कोई ख़ुशी नहीं थी. क्या बताएं हमने इन सत्रह सालों में क्या-क्या बर्दाश्त नहीं किया."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)