नज़रिया: इससे पहले कि कश्मीर में और ख़ून बहे...

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    • Author, आकार पटेल
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

भारत प्रशासित कश्मीर रसातल में फंसता हुआ दिख रहा है.

9 अप्रैल को श्रीनगर में हुए उपचुनाव से लेकर अभी तक कश्मीर में सुरक्षा बल और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसा के कई मामले सामने आए हैं.

यहां कई मौक़ों पर हमने अत्यधिक बल का प्रयोग होते हुए देखा है. क्रूर, अमानवीय और अपमानजनक व्यवहार भी देखने को मिले हैं.

इसके अलावा आम लोगों को संदिग्ध हथियारबंद समूहों द्वारा डराने-धमकाने की घटनाएं भी देखने में आई हैं.

हर एक नया दिन अपने साथ भय और डर की आशंका ले कर आ रहा है.

मोबाइल से बनाए गए वीडियोज़ में सरकारी और ग़ैर-सरकारी लोगों द्वारा कुछ आपत्तिजनक व्यवहार के मामले सामने आए हैं.

मसलन 14 अप्रैल को एक शॉर्ट वीडियो कश्मीर घाटी में वायरल हुआ था. जिसमें कुछ परेशान करने वाले वीडियो फुटेज थे.

वीडियो में दिखाया गया है कि 24 साल के एक युवक फ़ारूक़ अहमद डार को आर्मी की जीप के बोनेट से बांध कर गांव में घुमाया जा रहा है.

इसके बैकग्राउंड में आवाज़ आ रही है, "पत्थरबाज़ों का यही हाल होगा."

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इमेज कैप्शन, फ़ारुक़ अहमद डार

कुछ मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि आर्मी अधिकारियों ने इस शख़्स को जीप से बांधा था. वो उसका 'मानव ढाल' की तरह इस्तेमाल कर रहे थे ताकि वो सेना के दस्ते पर पत्थर फेंकने वाले लोगों को डरा सके.

लेकिन इससे यह बात कहीं से भी उचित नहीं ठहराई जा सकती. फ़ारूक़ अहमद डार के साथ जो कुछ हुआ वो क्रूर, अमानवीय, और अपमानजनक था.

भले ही सेना के अधिकारी पत्थर फेंकने वालों को चेतावनी देना चाहते हों लेकिन यह तरीक़ा बिल्कुल ग़ैर-क़ानूनी और अस्वीकार्य है.

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इमेज कैप्शन, वो जगह जहां से आईटीबीपी के जवान ने अकील अहमद को गोली मारी

उसी दौरान आए एक दूसरे वीडियो में देखा गया कि 17 साल के एक नौजवान अक़ील अहमद वानी को कथित तौर पर इंडो तिब्बती बॉर्डर पुलिस ने बरवाह, बडगाम में एक मतदान केंद्र के नज़दीक गोली मारी.

अक़ील वानी मतदान केंद्र के नज़दीक सुरक्षा बलों पर पत्थरबाज़ी करने वाले जत्थे का हिस्सा थे. वीडियो में दिख रहा है कि इंडो तिब्बती बॉर्डर पुलिस का एक जवान कथित तौर पर अक़ील वानी को एक दीवार के पीछे से गोली मार रहा है.

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इमेज कैप्शन, अकील अहमद का घर.

बीबीसी ने 12 साल के फ़ैज़ान फ़ैयाज़ डार के बारे में भी ख़बर दी है जो नौ अप्रैल को मारे गए आठ लोगों में शामिल था.

कुछ दिन पहले आए वीडियो में दिखाया गया है कि सीआरपीएफ़ के एक जवान को चुनाव के दिन प्रदर्शनकारी तंग और अपमानित कर रहे हैं.

कई लोग जवानों की ओर से बरते जा रहे संयम की तारीफ़ कर रहे हैं. लेकिन हमेशा से खुले तौर पर इस तरह का संयम नहीं दिखा है.

दूसरे कई वीडियोज़ में देखा गया है कि सुरक्षा बल प्रदर्शनकारियों के साथ मार-पीट कर रहे हैं.

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घाटी में चल रहे इस 'वीडियो वार' के बीच दो बातें बहुत स्पष्ट तौर पर सामने आई हैं.

पहली बात यह कि घाटी में राज्य और केंद्र सरकार के प्रति ज़ाहिर तौर पर बहुत ग़ुस्सा भरा हुआ है. कश्मीर के विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले छात्र अब सुरक्षा बलों के मौजूदा रवैये का खुलेआम विरोध कर रहे हैं.

15 अप्रैल को स्थानीय पुलिस और पारामिलिट्री बल के साथ प्रदर्शनकारियों की हुई झड़प में कई छात्र घायल हुए थे. टकराहट की इन स्थितियों की वजह से कई स्कूल-कॉलेजों को दोबारा से बंद करना पड़ा है और विरोध-प्रदर्शनों के थमने की उम्मीद भी नहीं दिख रही है.

दूसरी बात यह है कि राज्य सरकार, केंद्र सरकार और सुरक्षा बल तीनों ही उन संदिग्ध जवानों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने में नाकाम रहे हैं जिन्होंने कथित तौर पर मानवाधिकार का उल्लंघन किया है.

सरकार के कई लोग यहां तक कि अटॉर्नी जनरल भी बिना उनके अधिकारों और गरिमा का ख़्याल रखते हुए फ़ारूक़ डार के साथ हुए अमानवीय व्यवहार को सही ठहरा चुके हैं.

उन्होंने इस बात का भी ख़्याल नहीं रखा कि वो ऐसा कर के जम्मू-कश्मीर के आम लोगों को क्या संदेश दे रहे हैं.

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सुरक्षा बलों को मिलने वाली इस तरह की छूट से उन्हें अपना मनमाना करने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा. क़ानून और मौलिक अधिकारों की परवाह किए बग़ैर उन्हें जो सही लगेगा सुरक्षा बल वही करेंगे.

अधिकारियों को यह ज़रूर ही सुनिश्ति करना चाहिए कि जो जवान ग़लत करेंगे, उन्हें आफ्सपा रहते हुए भी आम अदालत का सामना करना पड़ेगा. आफ्सपा की वजह से सुरक्षा बलों को अप्रत्यक्ष रूप से मुक़दमे से बचने का मौक़ा मिलता है.

ऐसा नहीं है कि सुरक्षा बलों और पुलिस को ख़ुद की आत्मरक्षा का अधिकार नहीं है या फिर हिंसक प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ वे ताक़त का इस्तेमाल नहीं कर सकते.

लेकिन उन्हें हमेशा इसकी ज़रूरत और कितनी सख़्ती बरतनी है इसका ख़्याल ज़रूर रखना चाहिए.

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आत्मरक्षा के लिए गोली का इस्तेमाल हमेशा आख़िरी विकल्प होना चाहिए.

पेलेट गन यानी छर्रे वाली बंदूक़ें जिनकी वजह से शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और दूसरे निर्दोष लोगों को अपनी आंखे गंवानी पड़ी हैं, उनके इस्तेमाल पर कश्मीर में पाबंदी होनी चाहिए.

घाटी में इंटरनेट सर्विस के बाधित होने से ऐसे हिंसा के माहौल में यहां के लोगों को ज़रूरी सूचनाएं नहीं मिल पा रही हैं.

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कश्मीर में अलगाव की भावना मानवाधिकार का उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई नहीं होने से जुड़ी हुई है. यह कश्मीरियों के जीवन में व्यापक रूप से घर कर चुका है.

अब और ख़ून बहे उससे पहले भारत सरकार को इसपर तत्काल क़दम उठाना चाहिए.

(लेखक एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के एक्जिक्यूटीव डायरेक्टर हैं.)

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