नज़रिया: 'अखिलेश पार्टी को संकट से निकाल पाएंगे या.....'
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- Author, सुनीता एरॉन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से बीते एक सप्ताह में दो बार मुलायम सिंह यादव की छोटी बहू अपर्णा यादव मिल चुकी हैं.
इसकी पहली वजह तो यही होगी कि अपर्णा यादव के पारिवारिक गुरू और योगी आदित्यनाथ में बहुत अच्छे संबंध हैं.
इसको राजनीतिक तौर पर भी देखा जाने लगा है तो इसकी वजह भी है क्योंकि अपर्णा यादव नरेंद्र मोदी से बहुत प्रभावित रही हैं. प्रधानमंत्री के साथ सैफ़ई में उनकी सेल्फ़ी की ख़ूब चर्चा हुई थी.
लेकिन इसे दो संदर्भ में देखा जाना चाहिए. पहली तो सांकेतिक महत्व ही है. एक तो मुलायम सिंह भी योगी आदित्यनाथ के शपथ ग्रहण समारोह में भी गए थे. उन्होंने वहां नरेंद्र मोदी से मुलाकात भी की है, उनके कान में कुछ कहा भी, जिसकी बहुत चर्चा हुई थी.
मुलाकातों से संदेश
मेरे ख्याल से मुलायम सिंह यादव ने उस मुलाकात से प्रशासन से जुड़े अधिकारियों को ये संदेश देने की कोशिश की थी कि हमारे लोगों को तंग मत करना, हमारे इनसे भी बेहतर संबंध हैं.
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इसी तरह का संकेत मुलायम सिंह यादव ने नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के शपथ ग्रहण समारोह में भी दिया था. वे पीछे बैठे थे, जहां से उन्हें हाथ पकड़कर अमित शाह आगे ले जाते दिखे थे.
तो अपर्णा यादव की इन मुलाकातों से संकेत मिलता है कि उनकी योगी आदित्यनाथ से नज़दीकी है.
लेकिन इसको राजनीतिक तौर पर भी देखना होगा. मौजूदा स्थिति में ये साफ़ हो गया है कि समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव हो गए हैं.
वे पार्टी के सर्वेसर्वा हो गए हैं, ऐसे में अपर्णा यादव और प्रतीक यादव में थोड़ी असुरक्षा पैदा हुई होगी.
इससे पहले प्रतीक यादव की मां भी एक इंटरव्यू में कह चुकी हैं कि वे राजनीति में आना चाहती थीं, लेकिन मेरे पति ने मुझे आने नहीं दिया.
उनकी बातों से ऐसा लगता है कि वे चाहती हैं कि प्रतीक यादव को राजनीति में प्रोमोट किया जाए.
असुरक्षा का बोध
जब मुलायम सिंह नहीं रहेंगे तब हमारा भविष्य क्या होगा, इन बातों के बारे में अपर्णा और प्रतीक यादव सोचते होंगे.
यही वजह है कि अपर्णा यादव ने भारतीय जनता पार्टी से जुड़ने से किसी संभावना को सिरे से ख़ारिज नहीं किया.
उन्होंने ये संकेत दे दिया कि समाजवादी पार्टी में क्या माहौल है और उनके लिए क्या स्पेस है, इस पर काफ़ी कुछ निर्भर करेगा.
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अमूमन अखिलेश यादव अपनी निजी बातों के बारे में नहीं बोलते हैं, लेकिन ये माना जाता है कि दोनों भाईयों में संबंध सहज नहीं हैं.
अगर संबंध अच्छे नहीं हों तो अपर्णा यादव अपने लिए राजनीतिक तौर पर विकल्प देख रही होंगी.
ये भी संभव है कि उन्हें कभी लगे कि समाजवादी पार्टी में बहुत ज़्यादा विकल्प नहीं है या कितना है, तो उनके पास कितना विकल्प है.
ऐसे में अपर्णा यादव बहुजन समाज पार्टी में जा नहीं सकती हैं, भारतीय जनता पार्टी से वैचारिक रूप में वे ज़्यादा नज़दीक दिखाई देती हैं.
बीजेपी में जाने की उम्मीद?
भारतीय जनता पार्टी भी अपर्णा को आसानी से जगह दे सकती है. क्योंकि इससे पहले भी भारतीय जनता पार्टी का इतिहास ऐसा रहा है.
गांधी परिवार से मेनका गांधी जब अलग हुईं तो उन्हें भारतीय जनता पार्टी में ही जगह मिली. वरुण गांधी भी वहीं मौजूद हैं.
सिंधिया परिवार में भी एक धड़ा भारतीय जनता पार्टी में रहा है. जब राजनीतिक परिवारों में इस तरह कोई गुट अलग होता है तो बड़ी पार्टियां उन्हें साथ लेने में नहीं हिचकिचाती हैं.
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लेकिन जब तक मुलायम सिंह हैं, तब तक अपर्णा के भारतीय जनता पार्टी में जाने की संभावना नज़र नहीं आती. क्योंकि अखिलेश के पार्टी की कमान संभालने के बाद भी, ये मुलायम सिंह ही थे जिन्होंने अपर्णा यादव को लखनऊ कैंट से उम्मीदवार बनाया था, जसवंत नगर की सीट पर शिवपाल यादव को टिकट दिलवाया.
दूसरी ओर, अखिलेश यादव कभी अपने पिता के ख़िलाफ़ नहीं जा सकते. ये समझना होगा कि अखिलेश का अपने पिता से एकदम अलग रिश्ता है और ये पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पार्टी के संस्थापक वाले रिश्ते से एकदम अलग है.
इसलिए जब तक मुलायम हैं तब तक अपर्णा जो चाहेंगी, वो उनको मिल सकता है. प्रतीक यादव राज्यसभा में भेजे जा सकते हैं. कुछ भी संभव है.
अखिलेश ही पार्टी का भविष्य
जहां तक शिवपाल सिंह यादव की बात है, तो उनकी प्रतिबद्धता मुलायम सिंह यादव के साथ है. इस पर शक़ नहीं किया जा सकता.
अपनी पार्टी में उनकी स्थिति कहां से कहां पहुंच गई है, लेकिन वे मुलायम सिंह से अलग नहीं जा सकते. होने को तो ये भी हो सकता है कि वे पार्टी को अस्थिर करने की कोशिश करें लेकिन पार्टी के विधायक तो ये देखेंगे कि वोट किसके नाम पर मिलेगा या मिल सकता है, ऐसे में पार्टी तो अखिलेश के साथ ही रहेगी.
जहां तक समाजवादी पार्टी के कमबैक की बात है, तो हमलोगों ने बीते 25 सालों में कई बार समाजवादी पार्टी को ख़त्म माना, लेकिन पार्टी हर बार वापसी करने में कायमाब रही है.
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अखिलेश के नेतृत्व में पार्टी में कमबैक करने की पूरी संभावना है. ये बात दूसरी है कि भारतीय जनता पार्टी की जोरदार जीत के बाद लोग सपा और बसपा की संभावना को ख़त्म मान रहे हैं लेकिन अखिलेश की अपनी लोकप्रियता कायम है.
उन्हें लोग उम्मीद से देख रहे हैं, उनकी हार पर लोग अचरज व्यक्त कर रहे हैं.
ऐसे में बहुत संभावना है कि वे आम लोगों का भरोसा एक बार फिर पाने में कामयाब होंगे.
(बीबीसी संवाददाता प्रदीप कुमार से बातचीत पर आधारित.)
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