आदमखोर बाघिन के शिकार की हैरतअंगेंज़ दास्तान

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    • Author, शिकारी लखपत रावत
    • पदनाम, देहरादून से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

रामनगर इलाक़े में यह चालाक और आदमखोर बाघिन महीनों से हम शिकारियों को छका रही थी. दो लोगों को मार चुकी थी और तीन को इसने ज़ख़्मी कर दिया था. जब हमें इसे मारने का काम सौंपा गया तो हमारे लिए भी यह आसान नहीं था.

मुझे तो लगता है कि शायद ख़ुद जिम कॉर्बेट भी इसका तब शिकार न कर पाते क्योंकि जितना तेज़ ये बाघिन सीख और सोच रही थी उतना तेज़ कोई जानवर उन्हें कभी मिला ही नहीं होगा.

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बाघिन को निशाने पर लेने के लिए ख़ुद मैं एक पिंजरे में चारा बनकर बैठा, पर वह नहीं आई. हमने चारे के लिए भैंस के बच्चे को भी लगाया. मगर उस पर भी उसने तब हमला किया जब उस दिन मचान पर कोई शिकारी नहीं था.

वह इतनी चालाक थी कि हमारे हांका लगाने पर भी कहीं छिपी बैठी रहती थी. अगर हम गन्ने के खेतों में हाथी उतारते तो वह लुकाछिपी करती रहती पर बाहर नहीं निकलती थी.

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मैंने 2002 से लेकर अब तक 49 आदमखोर तेंदुओं और बाघों का शिकार किया है. मगर इतने चालाक जानवर से ये मेरी पहली मुठभेड़ थी.

डेढ़ महीने तक हम पांच शिकारी इस बाघिन के पीछे लगे रहे. जिस दिन 20 अक्टूबर को हमने उसे मारा तो उसे लगी तीन गोलियों में एक मेरी थी.

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आप हमारी तैयारियों का अंदाज़ा इससे लगा सकते हैं कि उत्तराखंड वन विभाग ने 20 किलोमीटर के दायरे में 120 हेलिकॉप्टर ड्रोन और कैमरा ट्रैप लगाए थे ताकि वो बाघिन का पता लगा सकें.

मगर ये बाघिन भी कम चालाक नहीं थी. हमारी हर टेक्नोलॉजी से वो एक क़दम आगे रहती थी. जिस भी ट्रैप कैमरे ने उसकी एक बार तस्वीर ली, उसमें वह दोबारा नहीं दिखी.

एक बार तो उसके जिस रास्ते पर कैमरे की नज़र थी, उस पर वह कैमरे की नज़र से बचती हुई गुज़र गई.

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जिस दिन यह बाघिन मारी गई उससे पिछली शाम को हम लोगों ने हांका लगाया था. इसमें उस दिन हाथी नहीं थे बल्कि लोगों ने इसे लगाया था.

एकाएक वह गन्ने के खेतों में से निकली और हमारी एक टीम के सामने आ गई. हमारी टीम के एक शिकारी ने तुरंत उस पर गोली दाग दी.

हालांकि यह बात हमें बाद में पता चली कि ये गोली उसके अगले पंजे के कोने में लगी थी. इस एक गोली के बाद तो ताबड़तोड़ गोलीबारी शुरू हो गई और वह घबराकर निकल भागी.

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हांका लगाने वाले दल को ख़ून देखकर लगा कि अब वह यहीं-कहीं होगी. ये सोचकर उन्होंने जाल लगा दिए. शाम होने को थी.

तुरंत हम लोगों ने अंधेरा चीरने के लिए खेत में पांच जनरेटरों की मदद से सर्च लाइट्स लगा दीं ताकि वह कहीं और भाग न सके और डेढ़ सौ लोग खेत को घेरकर पूरी रात पड़े रहे.

अगली सुबह जब आख़िरी ऑपरेशन की तैयारी हो रही थी तो पता चला कि बाघिन नदारद है.

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इमेज कैप्शन, शौकिया शिकारी और पेशे से टीचर लखपत रावत.

इतने लोगों की मौजूदगी के बावजूद वो शातिर बाघिन रोशनी और लोगों का घेरा तोड़कर बच निकल गई थी. तभी पता चला कि वह धान के खेत के बगल की झाड़ियों में छिप गई थी. तुरंत शिकारियों ने उसे वहां घेर लिया.

मैं और मेरे साथ दूसरे शिकारी हरीश धामी दोनों क़रीब 22 फ़ीट ऊंची एक मचान पर थे जहां से क़रीब 300 फ़ीट का इलाक़ा हमारी ज़द में था. जैसे ही हाथी के साथ हांका लगाया गया, मुझे मेरे सामने की झाड़ियां हिलती हुई दिखीं.

मैंने तुरंत गोली चला दी तो बाघिन ने एक तेज़ आवाज़ निकाली. मुझे लगा कि बाघिन ज़ख्मी हो गई है. मेरे पास ही दूसरे शिकारी जॉय हुकिल और मेरे असिस्टेंट हरी सिंह को भी पक्का यकीन हो गया था कि उसे गोली लग गई है.

जैसे ही ये साफ़ हुआ उन्होंने भी गोलियां चलानी शुरू कर दीं और इसके बाद हमने अंधाधुंध गोलीबारी की. हम लोगों ने क़रीब 30-32 राउंड गोलियां चलाई थीं.

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मगर आप ये देखिए कि इसके बावजूद बाघिन को सिर्फ़ तीन गोली लगी थीं- मेरी, जॉय हुकिल और हरी सिंह की. हुकिल की बंदूक़ हालांकि इससे पहले 20 नरभक्षी तेंदुओं को गिरा चुकी है.

मगर उनका कहना था कि ग़ुस्साए गांव वालों, तमाशबीनों, मीडिया और बाघिन का पीछा कर रहे फ़ॉरेस्ट के कर्मचारियों की वजह से ये पूरा मामला पेचीदा हो गया था.

वह मानते हैं कि पहले भी दो बार बाघिन को घेरकर मारने का मौक़ा हमें मिला था, पर तमाशबीनों की मौजूदगी की वजह से हम कोई रिस्क नहीं ले सकते थे. हालांकि हमें लगता है कि बाघिन को लेकर लोगों का डर और ग़ुस्सा बेवजह नहीं था.

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तल्ला गोजानी गांव की रहने वाली गोविंदी देवी को इस बाघिन ने 6 सितंबर को जिम कॉर्बेट पार्क से लगे जंगलों में मारा था, उनके घर से सिर्फ़ 200 मीटर दूर. यहां तक कि गोविंदी के बेटे ने इस घटना के बाद डर के मारे काम पर जाना छोड़ दिया था.

हमें लगता है कि वह आदमखोर इसलिए बनी क्योंकि छह साल की इस बाघिन के नाखून घिस गए थे और वह जंगली जानवरों का शिकार करने में चूक रही थी. इसलिए उसने आसान शिकार चुनने शुरू कर दिए थे. और ये शिकार थे जीते-जागते इंसान.

(स्थानीय पत्रकार राजेश डोबरियाल से हुई बातचीत पर आधारित)

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