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मोदी का 'पुतला जलाने पर' जेएनयू में विवाद
दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में रावण के पुतले पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित भाजपा नेताओं की तस्वीरें चिपकाकर उसे कथित तौर पर जलाने पर एक बार फिर विवाद पैदा हो गया है.
जेएनयू के उप-कुलपति एम जगदीश कुमार ने (एक अनवेरीफ़ाइड हैंडल से) ट्वीट में कहा कि मामले की जांच की जा रही है और सभी जानकारियों की पड़ताल की जा रही है.
कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई की ओर से जारी एक प्रेस रिलीज़ में कहा गया कि वो पुतले जलाने की प्रथा को बढ़ावा नहीं देता लेकिन इसे पूरी दुनिया में प्रदर्शन करने का एक स्वीकार योग्य तरीका माना गया है.
बीबीसी संवाददाता विनीत खरे ने जेएनयू में एनएसयूआई और एबीवीपी के पदाधिकारियों से बात की. पढ़िए उनका क्या कहना है-
सुनीता मिन्ना, एनएसयूआई.
हमने जिस दिन को चुना, उसका किसी धर्म से ताल्लुक नहीं था. हमने नाथूराम गोडसे, साध्वी प्रज्ञा, आसाराम, साक्षी महाराज, अमित शाह का पुतला जलाया था.
सनी, एनएसयूआई
प्रधानमंत्री मोदी कहते हैं कि मैं बाबा साहब का भक्त हूं. मैं उनका भक्त नहीं, मैं उनके विचारों को मानता हूं.
बाबा साहब ने आज ही विजय दशमी के दिन हिंदू धर्म में कुरीतियों के कारण उसे छोड़कर बौद्ध धर्म अपनाया था. ये भी हमारा एक प्रदर्शन था. इस साल बाबा साहब की 125वीं जयंती है. जाति व्यवस्था निंदनीय है. आरएसएस उसका समर्थन करती है, (इसलिए) वो भी निंदनीय है.
आलोक सिंह, एबीवीपी
पूर्व में भी पुतले जलाए गए हैं. लेकिन इस बार विजयादशमी का दिन चुना गया. वो (मोदी) आपके और हमारे प्रधानमंत्री नहीं हैं. वो राष्ट्र के प्रधानमंत्री हैं. उन्हें रावण की तरह दर्शाना, रावण की तरह पुतला जलाकर दहन करना, वो निंदा करने वाली चीज़ है. उसकी जितनी निंदा की जाए कम है. एबीवीपी ने पुतले जलाए हैं लेकिन विजयादशमी के दिन प्रधानमंत्री का पुतला नहीं जलाया.
जाह्नवी, एबीवीपी
पुतला फूंकना लोकतांत्रिक हक़ है. ये लोकतंत्र है और यहां पर सबको हक़ है पुतला फूंकने का. लेकिन विजयादशमी के दिन बाबा साहब अंबेडकर के लिखे संविधान के मुताबिक जो प्रधानमंत्री बहुमत से चुना गया है, आपने (एनएसयूआई) उसका अपमान किया है.
अनिल कुमार मीना, एनएसयूआई
अभी बिहार में सोनिया गांधी, राहुल गांधी और नवाज़ शरीफ़ का साथ में पुतला जलाया. क्या इन्हें (एबीवीपी) इसकी निंदा नहीं करना चाहिए?
रवि रंजन चौधरी, एबीवीपी
एनएसयूआई को कुल वोटों का मात्र दो प्रतिशत वोट मिलते हैं. (एबीवीपी) सबसे बड़ी पार्टी है. एबीवीपी से डरकर वाम दल साथ आए थे. अगर लोग डरते हैं तो ये हमारी राजनीतिक जीत है.