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कल्याणजी-आनन्दजी: सदाबहार धुनों की सरताज जोड़ी
- Author, यतींद्र मिश्र
- पदनाम, कला और संगीत समीक्षक
पिछली शताब्दी में सत्तर के दशक में 'के. ए.' अर्थात कल्याणजी-आनन्दजी जोड़ी ने उसी तरह फ़िल्म संगीत की दुनिया में लोकप्रियता एवं सफलता अर्जित करनी शुरू की थी, जिस तरह चालीस के दशक में हुस्नलाल-भगतराम एवं पचास के दशक में शंकर-जयकिशन की जोड़ियों ने पाई थी.
गुजरात के कच्छ के एक गांव कुंदरोड़ी से आये हुए संगीतकार भाइयों कल्याणजी वीरजी शाह (जन्म:1928) एवं आनंदजी वीरजी शाह (जन्म:1933) के बीच जीवन भर पारिवारिक रिश्ते से कला के रिश्ते ज़्यादा महत्वपूर्ण रहे. इनके पिता वीरजी शाह ने जब गुजरात से बम्बई आकर अपनी छोटी-सी पंसारी की दूकान खोली थी, उस दौरान सिनेमा की दुनिया में मराठी और गुजराती संस्कृति से प्रभावित संगीत का दौर जारी था.
अस्सी के दशक की शुरुआत में जिन तीन संगीतकारों की ख्याति पूरे शबाब पर रही, उसमें कल्याणजी-आनन्दजी भाईयों को छोड़कर आर.डी. बर्मन एवं लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के नाम प्रमुख हैं.
नए काम को अधिक अवसर दिया
'एल.पी.' और पंचम की तुलना में, 'के. ए.' ऐसे अकेले संगीतकार के रूप में उभरते हैं, जिन्होंने नई आवाज़ों को काम देने का सबसे अधिक अवसर जुटाया. उनके निर्देशन में कंचन, मनहर, नाज़िया हसन, साधना सरगम, सपना मुखर्जी जैसे कलाकारों को पार्श्व-गायन का मौक़ा मिला और शोहरत भी.
इसी तरह यह देखना भी सुखद रूप से दिलचस्प है कि पुराने कलाकारों से भी उन्होंने अपनी फिल्मों में गायन का बेहतरीन काम लिया था. इस लिहाज़ से हम कमल बारोट, कृष्णा कल्ले, उषा तिमोथी एवं मुबारक़ बेगम जैसी गायिकाओं को यहाँ याद कर सकते हैं, जो 'के. ए.' के संगीत निर्देशन में नयी रोशनी पा सकीं.
कल्याणजी-आनन्दजी के संगीत पटल से यदि हम बेहद सख़्ती से कुछ अत्यंत सुरमयी फ़िल्मों का चुनाव करें, तो कम से कम डेढ़ दर्जन सदाबहार कृतियाँ ऐसी अवश्य उभरेंगी, जिनकी आस्वादपरक आलोचना से इस संगीतकार का फलक विस्तृत होता जान पड़ेगा.
ऐसे में 'के. ए.' के मधुर संगीत वाली फ़िल्मों में 'मदारी', 'छलिया', 'हिमालय की गोद में', 'दुल्हा-दुल्हन', 'जब-जब फूल खिले', 'हसीना मान जाएगी', 'सरस्वतीचंद्र', 'उपकार', 'पूरब और पश्चिम', 'जॉनी मेरा नाम', 'महल', 'सफ़र', 'कोरा कागज़', 'डॉन', 'मुकद्दर का सिकंदर' एवं 'कुर्बानी' को याद कर सकते हैं. इन फ़िल्मों के माध्यम से इस जोड़ी इतने कर्णप्रिय गीतों का निर्माण किया है कि हम उससे बनने वाली एक सारगर्भित धरोहर को हिन्दी फ़िल्मों की परम्परा में जुड़ता हुआ देख सकते हैं.
अर्द्धशास्त्रीय गानों को रचने में तत्पर
कुछ दिनों तक शंकर-जयकिशन के ऑर्केस्ट्रा में शामिल रहे कल्याणजी ने अपना स्वयं का भी एक ऑर्केस्ट्रा समूह बनाया था. यह जानना भी संगीतकार जोड़ी के काम करने की शैली के बारे में रोशनी डालता है कि शंकर-जयकिशन की ही तरह दोनों भाई अलग-अलग अपनी धुनें तैयार करके किसी फ़िल्म का संगीत रचते थे.
इसमें जहाँ कल्याणजी, गम्भीर और अर्द्धशास्त्रीय गानों को रचने में तत्पर रहे, वहीं आनंदजी के हिस्से में चुलबुले एवं हलके मूड के रूमानी गीतों को तर्ज़ पर बाँधने का काम आता रहा. दोनों मिलकर सुगम व शास्त्रीय संगीत का एक ऐसा संतुलन बनाते थे, जिनमें हर रंग और मनःस्थिति का गाना मौजूद मिलता है.
यह जानना कल्याणजी-आनंदजी के संगीत संसार के बारे में प्रासंगिक है कि उन्होंने अपनी ज़्यादातर कम्पोज़ीशन्स को तीन रागों के इस्तेमाल द्वारा संगीतबद्ध किया है. ये राग- ;भैरवी', 'पीलू' और 'चारुकेशी' हैं. हालाँकि यह भी 'के.ए.' की विशेषता ही रही कि इनके अधिकाँश गीतों में किसी एक राग की शुद्ध ढंग से स्वर-संगति प्रदर्शित होती नहीं दिखाई देती. कारण यह कि तमाम सारे रागों के प्रयोग में अपने धुनों की नैसर्गिक सुंदरता बढ़ाने के लिए कई बार उन रागों के स्वभाव के विपरीत कुछ कोमल या शुद्ध स्वरों को विवादी स्वर की तरह बरतते रहे हैं, जिसके चलते धुन की मिठास में अतिरिक्त व्यंजना दिखने लगती है.
यह कहना भी समीचीन जान पड़ता है कि रागदारी की उचित जानकारी के साथ-साथ अपनी पसंद के रागों के प्रयोग के चलते कुछ लोगों के लिए जैसे कुछ विशिष्ट राग उनकी पहचान ही बन गए. कल्याणजी-आनन्दजी के सन्दर्भ में यह स्थिति जहाँ राग चारुकेशी की रही है. वहीं शंकर-जयकिशन के लिए वह भैरवी एवं शिवरंजनी, नौशाद के लिए पीलू और ख़माज, एस. डी. बर्मन के लिए यमन और बहार, मदन मोहन के लिए छायानट और भीमपलासी तथा खय्याम के लिए पहाड़ी को देखा जा सकता है.
धुनों से संगीत को लाऊड नहीं होने दिया
कल्याणजी-आनंदजी की एक विशेषता यह भी रही कि उन्होंने बड़े जतन और सजगता के साथ अपनी धुनों को शोर या वाद्यों के अत्यधिक इस्तेमाल से ज़्यादा लाऊड नहीं होने दिया है. उनकी धुनों को सम्पूर्णता तक पहुँचाने में जो वाद्य अनिवार्य रूप से सम्मिलित रहे हैं, उसमें बेहद संतुलित भाव से पियानो, संतूर, गिटार, सैक्सोफ़ोन एवं क्ले-वॉयलिन का हाथ रहा है.
इसी समय यह तथ्य भी रोचक ढंग से अपना रूपाकार लेता है कि यदि कथानक के अनुसार गीत का भाव मस्ती और प्रेम की उन्मुक्त दशा को व्यक्त कर रहा है, तो उस क्षण साज़ों का काम बिल्कुल दूसरे ढंग से मस्ती-भरे उत्सवी गीतों की संरचना में लिया गया. ऐसे में उनके वाद्य-संयोजन का बुद्धिमत्तापूर्ण काम, तैयार होने वाली धुनों की अनुगूंजों को थोड़ा और गाढ़ा कर गया.
अपनी लोकप्रिय और सदाबहार छवि के लिए विख्यात कल्याणजी-आनंदजी जैसे बड़े संगीत-निर्देशक की यही सार्थक उपलब्धि है कि उनके आँगन में 'सरस्वतीचन्द्र', 'छलिया', 'जब-जब फूल खिले', 'उपकार', 'सफ़र' जैसी तमाम अमर संगीतमय फ़िल्में पूरी सुंदरता के साथ मौजूद हैं.
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