ईरान किस रणनीति के दम पर अमेरिका के सामने टिका हुआ है?

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इमेज कैप्शन, 28 फ़रवरी को अमेरिका और इसराइल ने ईरान पर हमला किया था. शुरुआती हमले में ही ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई मारे गए थे
    • Author, अमीर आज़मी
    • पदनाम, संपादक, बीबीसी न्यूज़ फ़ारसी
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

पिछले सप्ताह प्राइम टाइम में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का संबोधन ईरान के साथ युद्ध के हालात पर अपने नियंत्रण को दिखाने के मक़सद से था. लेकिन इसने एक बड़ी विरोधाभासी बात को भी उजागर कर दिया.

अमेरिकी राष्ट्रपति ने घोषणा करते हुए कहा कि ईरान की सैन्य क्षमताएं, उसकी नौसेना, वायुसेना, मिसाइल कार्यक्रम और परमाणु संवर्द्धन से जुड़े बुनियादी ढांचे काफ़ी हद तक नष्ट हो चुके हैं. उन्होंने इस संघर्ष को अब अपने अंतिम चरण की ओर जाते हुए बताया.

इसके बावजूद, उन्होंने अपनी इस बात के साथ ही आने वाले हफ़्तों में संघर्ष के और अधिक बढ़ने की धमकियां भी दीं.

इसका नतीजा यह हुआ कि असल में उनके संदेश में क्या था, ये पता नहीं लग पाया. ईरान पर जीत की घोषणा तो कर दी गई, लेकिन वह अभी तक हासिल नहीं हुई है.

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उनकी इस चेतावनी से बयानबाज़ी और तेज़ हो गई कि ईरान पर बमबारी करके उसे "स्टोन एज (पाषाणकाल) में वापस ले जाएंगे."

इस बात का ईरान के अंदर स्पष्ट असर हुआ है, जिससे सोशल मीडिया पर गुस्सा भड़क गया है. यह ईरान में ट्रंप के उन समर्थकों में भी दिख रहा है जो उन्हें शासन में बदलाव लाने वाले एजेंट के तौर पर देखते थे.

ईरानी सत्ता पर अंदरूनी दबाव बढ़ाने के बजाय, कुछ लोगों के मन में इसने देश के घिरे होने की भावना को और मज़बूत किया है.

सत्ता परिवर्तन का दावा

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इमेज कैप्शन, आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई के बेटे मोजतबा ख़ामेनेई ईरान के नए सर्वोच्च नेता चुने गए हैं (फ़ाइल फ़ोटो)

ट्रंप ने इस दावे पर भी ज़ोर दिया है कि ईरान में "सत्ता परिवर्तन" असल में हो चुका है.

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उनका कहना है कि सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई के साथ ही कई अन्य शीर्ष अधिकारियों और कमांडरों की हत्या के बाद यह बदलाव आ गया है.

इससे ईरान में एक ऐसा नेतृत्व उभरा है जिसे ट्रंप ने "कम कट्टर और कहीं ज़्यादा समझदार" बताया है.

हालाँकि ट्रंप की इस बात के समर्थन में बहुत कम सबूत हैं.

तेहरान में सत्ता की संरचना में कोई बदलाव नहीं आया है. सत्ता का केंद्र अभी भी सुप्रीम लीडर का कार्यालय ही है.

हालाँकि मौजूदा हालात में, उनका सीधा नियंत्रण कितना है, यह साफ़ नहीं है.

लेकिन देश में न तो कोई संस्थागत टूट हुई है और न ही कोई वैचारिक बदलाव आया है.

मसूद पेज़ेश्कियान अभी भी राष्ट्रपति हैं. मोहम्मद बग़र ग़ालिबाफ़ अभी भी संसद का नेतृत्व कर रहे हैं. अब्बास अराग़ची अभी भी विदेश नीति को आकार दे रहे हैं.

हमलों में मारे गए कमांडरों और कई अधिकारियों की जगह उन्हीं वैचारिक खेमों के लोगों ने ली है, जो युद्ध के हालात में और भी ज़्यादा सख़्त हो गए हैं.

यह सत्ता परिवर्तन से ज़्यादा सत्ता की मज़बूती जैसा लगता है. यह मज़बूती कोई इत्तेफ़ाक नहीं है.

युद्ध में ईरान का लक्ष्य पारंपरिक अर्थों में जीत हासिल करना नहीं, बल्कि टिके रहना है.

लड़ाई में टिके रहना 'विकल्प नहीं मक़सद'

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इमेज कैप्शन, तेहरान में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) की नौसेना के प्रमुख अलीरेज़ा तंगसिरी के अंतिम संस्कार में उमड़ी भीड़ की तस्वीर

सालों से, तेहरान एक सीधे-सादे सिद्धांत पर काम करता रहा है कि एक ज़्यादा ताक़तवर फ़ौजी का ताक़त के सामने टिके रहना ही कामयाबी है.

इसराइल और अमेरिका के साथ अपनी लंबी लड़ाई में ईरान ने हमेशा यही माना है कि किसी एक के साथ लड़ाई हुई, तो दूसरा भी उसमें खिंच आएगा.

ईरान के लिए "अभी भी टिके रहना" कोई दूसरा विकल्प नहीं है, बल्कि यही उसका असली मक़सद है.

लड़ाई शुरू हुए एक महीना हो चुका है, लेकिन ईरान का कमांड ढांचा अभी भी काम कर रहा है, उसका सरकारी तंत्र मज़बूत है, और उसकी विरोध वाली ताक़त भले ही थोड़ी कमज़ोर हुई हो, लेकिन टूटी नहीं है.

इस हिसाब से देखें, तो ईरान की स्थिति अभी भी काफ़ी अहम है.

महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों, ख़ासकर होर्मुज़ स्ट्रेट पर, उसका दबदबा अभी भी कायम है.

इसी रास्ते से दुनिया की तेल सप्लाई का लगभग पांचवां हिस्सा गुज़रता है. सिर्फ़ इसी वजह से लगातार हमलों के बावजूद ईरान के पास चीज़ों को बिगाड़ने की ज़बरदस्त ताक़त बनी हुई है.

अमेरिका के लिए ईरान की यह क्षमता एक मुश्किल खड़ी करती है.

अगर अमेरिका अभी पीछे हट जाता है, तो इस बात का ख़तरा है कि ईरान का सबसे अहम सबक सही साबित हो जाएगा कि 'टिके रहना ही काम आता है.'

अगर वह लड़ाई जारी रखता है, तो उसे लगातार बढ़ती लागत का सामना करना पड़ेगा और निर्णायक जीत का कोई स्पष्ट रास्ता भी नज़र नहीं आएगा.

ट्रंप के भाषण में दिखती दुविधा

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इमेज कैप्शन, ट्रंप के सामने मुश्किल यह नज़र आती है कि उन्हें अमेरिका की ताक़त भी दिखानी है और लंबी लड़ाई से बचना भी है

ट्रंप के भाषण में यही दुविधा झलकती है. लड़ाई जारी रखते हुए भी जीत का दावा करके वह अपनी दो परस्पर विरोधी ज़रूरतों के बीच तालमेल बिठाने की कोशिश कर रहे हैं.

ये है अपनी ताक़त दिखाना और साथ ही लंबी लड़ाई में फंसने से बचना.

इस माहौल में ट्रंप के भाषण से ठीक पहले पेज़ेश्कियान का यह बयान कि ईरान के पास लड़ाई ख़त्म करने की "ज़रूरी इच्छाशक्ति" है, किसी रियायत के बजाय एक सोची-समझी चाल ज़्यादा लगती है.

बुधवार को सोशल मीडिया पर अमेरिकी जनता के नाम लिखे अपने खुले ख़त में उन्होंने यह सवाल उठाया कि क्या 'अमेरिका फ़र्स्ट' की नीति का पालन हो रहा है, और क्या अमेरिका इसराइल के इशारे पर काम कर रहा है.

इसका सीधा निशाना अमेरिका के वे घरेलू दर्शक थे जो पहले से ही इस लड़ाई को लेकर परेशान थे. यह अमेरिका पर राजनीतिक दबाव बढ़ाने की एक कोशिश थी, ताकि ईरान को अपनी बातचीत की शर्तों में कोई बदलाव न करना पड़े.

ईरान की शर्तें

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इमेज कैप्शन, ईरान के राष्ट्रपति पेज़ेश्कियान ने कहा कि युद्ध ख़त्म करने की 'ज़रूरी इच्छाशक्ति' ईरान के पास है (फ़ाइल फ़ोटो)

युद्ध ख़त्म करने के लिए ईरान की सीमाएं पहले की तरह ही दिख रही हैं. जो कुछ इस प्रकार हैं,

  • सत्ता का अस्तित्व बचाना और देश की संप्रभुता की रक्षा
  • भविष्य में अमेरिका और इसराइल की ओर से हमले न होने की भरोसेमंद गारंटी
  • प्रतिबंधों में सार्थक और ऐसी राहत जो लागू हो सके
  • अपनी रक्षा क्षमताओं को बनाए रखना

अब तक ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है कि ईरान इन मांगों पर कोई समझौता करने को तैयार है.

लेकिन जैसे-जैसे अमेरिका और इसराइल की बमबारी जारी रहेगी, यह स्थिति बदल भी सकती है.

इसमें कोई शक नहीं है कि इसका ईरान की सैन्य क्षमताओं और उसकी अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ रहा है. उसकी अर्थव्यवस्था तो युद्ध शुरू होने से पहले ही बुरी तरह से लड़खड़ा रही थी.

अगर ईरान की मौजूदा सत्ता युद्ध के बाद भी बनी रहती है, तो उसे इन संकटों से जूझ रहे देश को फिर से खड़ा करना होगा.

लेकिन सत्ता के बने रहने का एक और भी गहरा नतीजा होगा. सालों से उसकी अपनी 'रक्षा क्षमता' अमेरिका या इसराइल के किसी बड़े हमले का गुप्त ख़तरा ही ईरान पर एक लगाम का काम करता रहा है.

अगर वह सीधे टकराव के बाद भी सुरक्षित बच निकलता है, तो भविष्य में दी जाने वाली धमकियों का असर कम हो जाएगा.

इस बदलाव का असर अभी से ही क्षेत्रीय समीकरणों पर दिखने लगा है.

अरब देशों की मुश्किल

कुछ अरब देश, जो शुरू में इस युद्ध के ख़िलाफ़ थे, अब कथित तौर पर ट्रंप से यह कह रहे हैं कि वे युद्ध को बीच में न छोड़ें, बल्कि इसे अंजाम तक पहुंचाएं, वरना उन्हें ज़्यादा आत्मविश्वास से भरे ईरान का सामना करना पड़ सकता है.

उनके नज़रिए से, युद्ध का कोई ठोस नतीजा न निकलना, ख़ुद युद्ध से भी ज़्यादा अस्थिरता पैदा कर सकता है.

इन देशों को डर है कि अमेरिका के मुक़ाबले युद्ध के नतीजों का खामियाज़ा उन्हें ही ज़्यादा भुगतना पड़ेगा.

इसलिए, अमेरिका एक जानी-पहचानी, लेकिन बेहद मुश्किल दुविधा में फंसा हुआ है.

अगर वह युद्ध छोड़कर चला जाता है, तो इससे ईरान के 'डटे रहने' के मॉडल को ही सही साबित होने का मौक़ा मिल जाएगा.

और अगर वह युद्ध में बना रहता है, तो उसे एक ऐसे युद्ध में और भी गहराई तक उलझना पड़ सकता है, जिसका कोई स्पष्ट अंत नज़र नहीं आता.

इस जंग में अब तक कोई 'नया ईरान' उभरकर सामने नहीं आया है.

अगर युद्ध ख़त्म होने के बाद भी स्थिति वैसी ही बनी रहती है तो सवाल यह उठेगा कि क्या अमेरिका अपनी 'जीत के दावों' को उस ज़मीनी हक़ीक़त से जोड़ पाएगा, जिसमें उसका दुश्मन, जिसे वह बदलना चाहता था, असल में वैसा ही बना रहा.

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