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मध्य प्रदेश: मधुमक्खियों से 25 बच्चों को बचाने के लिए अपनी जान गंवाने वाली कंचन बाई
- Author, विष्णुकांत तिवारी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
"अगर कंचन बाई ने हिम्मत नहीं दिखाई होती तो न जाने कितने बच्चे मर जाते."
मध्य प्रदेश के नीमच ज़िले के रानपुर गाँव में जिससे बात कीजिए वह यही कहते हुए कंचन बाई की बहादुरी और साहस की कहानी सुना रहा है.
दरअसल, ज़िला मुख्यालय से 26 किलोमीटर दूर बसे रानपुर का आंगनबाड़ी परिसर सोमवार दो फ़रवरी की दोपहर मधुमक्खियों के हमले की चपेट में आ गया.
जहाँ आमतौर पर बच्चों की हँसी और शरारतें सुनाई देती हैं, वहाँ अचानक चीख पुकार की आवाज़ आने लगी. इसी आंगनबाड़ी परिसर में दोपहर दो बजे से प्राथमिक स्कूल चलता है.
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ग्रामीण बताते हैं कि क़रीब साढ़े तीन बजे का समय था, जब आंगनबाड़ी के आसपास मौजूद बच्चों पर मधुमक्खियों का झुंड टूट पड़ा. उस वक़्त परिसर में क़रीब 20 से 25 बच्चे थे.
'बच्चों को बचाने दौड़ पड़ीं'
स्कूल की एक शिक्षिका गुणसागर जैन बताती हैं, "मधुमक्खियां सीधे बच्चों की ओर बढ़ रही थीं और पूरी तरह से अफ़रा तफ़री का माहौल हो गया था."
उसी समय वहाँ मौजूद 55 साल की आंगनबाड़ी सहायिका कंचन बाई ने हालात को भांपा और बच्चों को बचाने दौड़ पड़ीं.
प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि कंचन बाई ने बिना समय गंवाए बच्चों को भीतर की ओर ले जाना शुरू किया. उन्होंने पहले आंगनबाड़ी में रखी दरियां और कंबल निकालकर बच्चों को ढका और फिर अपनी साड़ी से बच्चों को बचाने का प्रयास किया.
उनके इस साहसी क़दम ने लगभग 25 बच्चों की जान बचा ली, जिसमें उनका अपना पोता भी शामिल था लेकिन वह ख़ुद मधुमक्खियों के हमले में बुरी तरह घायल हो गई थीं.
अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया.
नीमच के पुलिस अधीक्षक अंकित जायसवाल ने मीडिया से कहा, "यह सोमवार दोपहर की घटना है, जब जावद थाना अंतर्गत रानपुर गांव की आंगनबाड़ी में मधुमक्खियों ने हमला कर दिया था. इसी दौरान वहां काम करने वाली कंचन बाई ने बच्चों को बचाने का प्रयास किया. कंचन बाई को मधुमक्खियों ने घायल कर दिया था, जिसके चलते उनकी मृत्यु हो गई".
परिवार शोक में, बेटे ने कहा 'मां पर गर्व है'
कंचनबाई के घर में उनके एक बेटे रवि मेघवाल और पति शिवलाल हैं. बेटे की शादी हो चुकी है और कंचन बाई का एक पोता है, जो उस समय स्कूल में ही था.
कंचन बाई के पति कुछ साल पहले लकवाग्रस्त हो गए थे और उसके बाद से ही बिस्तर पर हैं.
पूरा परिवार शोक में है लेकिन उनके बेटे रवि मेघवाल कहते हैं कि उन्हें अपनी मां पर बहुत गर्व है.
रवि ने बीबीसी से कहा, "मैं तो उस वक़्त गांव में नहीं था लेकिन सबने बताया कि कैसे मेरी मां ने दर्जनों बच्चों की जान बचाई. मेरी मां का स्वभाव बहुत अच्छा था. वह हर किसी से प्यार करती थीं लेकिन बच्चों से सबसे ज़्यादा. वह हमेशा कहती थीं कि बच्चे भगवान का रूप होते हैं. वह उन्हें अपने बच्चों की तरह नहीं, बल्कि भगवान की तरह मानती थीं."
कंचन बाई गांव के जय माता दी स्व-सहायता समूह की अध्यक्ष थीं और आंगनबाड़ी से जुड़े काम संभालती थीं. बच्चों के लिए खाना बनाना, पानी पिलाना और देखभाल उनकी रोज़मर्रा की ज़िम्मेदारी थी.
रवि कहते हैं कि जिन बच्चों को उनकी मां ने बचाया, उनमें उनका अपना बच्चा भी शामिल है. "उसके शरीर से भी पांच छह मधुमक्खियों के डंक निकाले गए थे."
रवि, मां को याद करते हुए कहते हैं, "उन्होंने कभी इस काम को काम नहीं समझा. उनके लिए ये जीवन का अभिन्न हिस्सा था. वह कभी लेट नहीं पहुंचीं, न ही कभी छुट्टी लेती थीं. अगर कभी बहुत मुसीबत में न भी जा पाईं तो पहले बच्चों के खाना पानी की व्यवस्था करती थीं".
सुरेश चंद्र मेघवाल, जिनका बेटा उसी आंगनबाड़ी में पढ़ता है, उस समय बच्चों को लेने पहुंचे थे.
वह कहते हैं, "मैं बाहर पहुंचा तो मैडम चिल्ला रही थीं और अंदर से बच्चों के रोने की आवाज़ें आ रही थीं. थोड़ा नज़दीक पहुंचा तो पता चला कि मधुमक्खियों का हमला हो गया है. कंचन बाई बच्चों को दरियों, चादरों और अपनी साड़ी से ढक रही थीं. वहां मधुमक्खियों का बहुत बड़ा झुंड था."
उनके मुताबिक़, बच्चों को बचाने के दौरान कंचन बाई ने मधुमक्खियों के बहुत हमले सहे. सुरेश कहते हैं, "अगर वह उस दिन वहां नहीं होतीं, तो कई बच्चों की जान जा सकती थी."
सबसे पहले बचाव के लिए पहुंचे ग्रामीणों ने क्या बताया?
दिलीप मेघवाल जो रिश्ते में कंचन बाई के देवर लगते हैं, उन्होंने कहा कि उनके पास गांव के ही एक व्यक्ति का फोन आया और उन्हें बताया गया कि आंगनबाड़ी में मधुमक्खियों ने हमला कर दिया है.
दिलीप ने बताया कि जब वह आंगनबाड़ी पहुंचे, तब हालात बेकाबू हो चुके थे.
"मैंने देखा कि कंचन बाई ज़मीन पर गिरी हुई थीं. उनके शरीर पर मधुमक्खियों के बहुत ज़्यादा डंक लगे थे. और कुछ मधुमक्खियां अब भी वहां पर थीं. कंचन बाई होश में नहीं थीं, उनके मुंह से झाग निकल रहा था और वह कुछ बोल भी नहीं पा रही थीं".
घटना का मंजर याद करते हुए दिलीप कहते हैं, "आसपास बच्चे रो रहे थे और लोग घबराए हुए थे. मैंने कंचन बाई को उठाया और एक बच्चे के साथ बाहर लेकर आया. सुरेश चंद्र भी तब तक पहुंच चुके थे उन्होंने एंबुलेंस और पुलिस को फोन किया."
पुलिस की गाड़ी आने के बाद कंचन बाई को सबसे नजदीकी सरवानिया महाराज प्राथमिक स्वास्थ केंद्र (पीएचसी) ले जाया गया था, जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया.
सरवानिया महाराज प्राथमिक स्वास्थ केंद्र के प्रभारी और इकलौते डाक्टर संदीप शर्मा ने बीबीसी से कहा, "मैं उस दिन कलेक्टोरेट में मीटिंग के लिए गया हुआ था. इसी बीच शाम के दौरान मुझे पीएचसी से फ़ोन आया कि एक महिला को मधुमक्खियों के भीषण हमले के बाद अस्पताल लाया गया है."
"उस वक्त मौजूद हॉस्पिटल स्टाफ के मुताबिक उनकी अस्पताल पहुंचने से पहले ही मृत्यु हो चुकी थी. मधुमक्खियों के हमले में ऐसा बिल्कुल संभव है क्योंकि इंसान एनाफ़िलेक्टिक शॉक में चला जाता है जो कि जानलेवा हो सकता है".
एनाफ़िलेक्टिक शॉक एक गंभीर, अचानक होने वाली और जानलेवा एलर्जिक प्रतिक्रिया है जो एलर्जी पैदा करने वाली चीजों के संपर्क में आने के कुछ मिनटों के भीतर हो सकती है. डॉक्टर संदीप के मुताबिक़ मधुमक्खियों का हमला ऐसे शॉक को लाने में एक जायज़ कारण है.
कंचन बाई की मौत ने पूरे रानपुर गांव को शोक में डुबो दिया है. गांव वाले उन्हें सिर्फ़ एक आंगनबाड़ी से जुड़ी महिला नहीं, बल्कि आंगनबाड़ी में एक भरोसेमंद मौजूदगी के तौर पर याद करते हैं.
एक ग्रामीण ने कहा, "कंचन बाई वहां रहतीं थीं तो हम लोगों को भरोसा था कि बच्चे सुरक्षित हाथों में हैं और उनकी देखभाल की फ़िक्र नहीं होती थी".
दिलीप बताते हैं कि वह बच्चों को साथ बैठाकर खाना खिलाती थीं और उनसे हंसी मज़ाक करती थीं.
आर्थिक स्थिति ख़राब, सरपंच ने दिया सहायता का भरोसा
परिवार की आर्थिक हालत पहले से ही मुश्किल थी. रवि के पिता को चार पांच साल पहले दिमाग़ में ब्लीडिंग के बाद लकवाग्रस्त हो गए थे.
रवि ने बताया, "घर की सारी ज़िम्मेदारी मां पर थी. पिता के इलाज में पांच-छह लाख रुपये खर्च हो चुके हैं. इसके लिए मुझे ज़मीन तक बेचनी पड़ी. आज भी हर महीने दवाइयों पर ढाई से साढ़े तीन हज़ार रुपये लगते हैं."
रवि कहते हैं कि, "मां सिर्फ़ घर में ही नहीं बाहर भी परिवार के लिए मज़बूती से संघर्ष कर रहीं थीं. सुबह घर की ज़िम्मेदारी, पिता जी की देखभाल, फिर स्कूल में और इसके बीच स्व-सहायता समूह का काम. पता नहीं कैसे लेकिन वह सब कुछ कर लेती थीं".
गांव के सरपंच लालाराम रावत कहते हैं, "मधुमक्खियों का हमला बहुत बड़ा था. कंचन बाई बच्चों को बचाते-बचाते अपनी जान गंवा बैठीं. परिवार की हालत बहुत गंभीर है."
उनका कहना है कि ग्राम पंचायत अपने नियमों के तहत परिवार को सहायता देगी. "हम सरकार से भी अनुरोध करते हैं कि परिवार को आर्थिक मदद मिले और बेटे के रोज़गार पर भी विचार किया जाए."
गांव में डर का माहौल
घटना के बाद गांव में डर का माहौल है. आंगनबाड़ी के पास लगा हैंडपंप पूरे गाँव के लिए पानी का एकमात्र स्रोत है. उसी जगह मधुमक्खियों का छत्ता होने की वजह से लोग वहां जाने से कतरा रहे हैं.
रवि कहते हैं, "स्कूल की इमारत जर्जर है, इसलिए बच्चों को आंगनबाड़ी में पढ़ना पड़ता है. मैं सरकार से अपील करता हूं कि स्कूल की हालत सुधारी जाए, बाउंड्री और पानी की व्यवस्था हो, ताकि बच्चों को आंगनबाड़ी में न बैठना पड़े. अगर सब ठीक होता तो मेरी मां उस वक्त आंगनबाड़ी में होती ही नहीं."
स्थानीय पत्रकार आकाश श्रीवास्तव की रिपोर्टिंग के साथ
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.