पश्चिम बंगाल में योगी आदित्यनाथ की रैलियों और भाषा को लोग कैसे देख रहे हैं?

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इमेज कैप्शन, पश्चिम बंगाल की धुपगुड़ी विधानसभा क्षेत्र में 18 अप्रैल को एक चुनावी रैली के दौरान योगी आदित्यनाथ
    • Author, रजनीश कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, कोलकाता से
  • पढ़ने का समय: 6 मिनट

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ 22 अप्रैल को जब उत्तरी कोलकाता को जोड़ासांको विधानसभा क्षेत्र में चुनावी रैली को संबोधित करने आए, तो शुरुआत में ऐसा लगा कि यह यूपी-बिहार की चुनावी रैली है.

योगी जैसे ही मंच पर पहुँचे, यहाँ से बीजेपी के उम्मीदवार विजय ओझा ने पैर छूकर आशीर्वाद लिया.

योगी आदित्यनाथ के समर्थक अपने हाथों में बुलडोज़र की तस्वीरें लिए मंच के पास खड़े थे.

जय श्रीराम और हर हर महादेव के नारे लगे. योगी चुनावी रैलियों में विपक्षी सरकारों और पार्टियों पर हिन्दू विरोधी होने का आरोप लगाते हैं.

इस रैली में भी उन्होंने ऐसा ही किया. यहाँ फ़र्क़ बस इतना था कि निशाने पर ममता बनर्जी थीं.

कोलकाता में उमस भरी प्रचंड गर्मी है. लोग पसीने से लथपथ हैं.

योगी रैली को संबोधित करते हुए जैसे ही कहते हैं- कोलकाता का मेयर बांग्ला की जगह उर्दू लाने की बात कर रहा है और टीएमसी सांसद माँ काली की धरती को काबा की धरती बनाना चाहती है.

योगी की इस बात को सुन भीड़ जयश्रीराम का नारा ज़ोर से लगाती है.

माफ़ी चाहते हैं, हम इस स्टोरी का कुछ हिस्सा लाइटवेट मोबाइल पेज पर नहीं दिखा सकते.

जोड़ासांकों विधानसभा क्षेत्र में हिन्दी भाषी बड़ी संख्या में हैं. रैली में आए लोग भी ज़्यादातर हिन्दी भाषी ही थे.

इसके बावजूद जोड़ासांको विधानसभा क्षेत्र को बीजेपी कभी जीत नहीं पाई है. योगी उन इलाक़ों में रैलियां ज़्यादा कर रहे हैं, जहाँ हिन्दी भाषी बड़ी संख्या में रहते हैं.

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इमेज कैप्शन, योगी की रैलियां पश्चिम बंगाल में हिन्दी भाषियों के बीच ज़्यादा हो रही हैं

योगी की रैली का बांग्ला भाषियों पर कैसा असर?

रैली में आए एक बांग्ला भाषी बिप्लब डे से हमने पूछा कि योगी के भाषण का असर ग़ैर-हिन्दी भाषियों पर भी होता है?

इसके जवाब में उन्होंने कहा, ''ममता की सरकार से हम बहुत ख़ुश नहीं हैं. टीएमसी के लोगों की दखलअंदाज़ी बहुत बढ़ी है. मैं आपको एक उदाहरण देता हूँ. मैंने अपने घर में काम कराने के लिए सीमेंट, बालू और कंक्रीट मंगवाया. अगले दिन टीएमसी के गुंडे पहुँच गए और पूछने लगे कि किस दुकान से लिए हो. सामान उनकी चहेती दुकान से नहीं लिया था. ऐसे में मुझे उन्हें पैसे देने पड़े.''

बिप्लब कहते हैं, ''टीएमसी की सरकार में स्थानीय नेताओं और उनके लोगों की मनमानी बहुत बढ़ी है. यहाँ कोई भी नया कारोबार करना संभव नहीं है. यहाँ मुद्दा हिन्दू बनाम मुसलमान का नहीं है. योगी अगर इन मुद्दों को उठाएँ, तो ज़्यादा अच्छा रहेगा. हम टीएमसी से परेशान हैं लेकिन योगी कुछ और ही मुद्दा उछालते हैं.''

वीडियो कैप्शन, पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम में वोटर लिस्ट से कटे नामों में 95 फीसदी मुसलमान, क्या वजह?
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वरिष्ठ पत्रकार सुमन भट्टाचार्य को लगता है कि योगी आदित्यनाथ बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को नुक़सान से ज़्यादा फ़ायदा पहुँचा रहे हैं.

भट्टाचार्य कहते हैं, ''योगी आदित्यनाथ बंगाल की संवेदनशीलता, संस्कृति, इतिहास और समाज को ठीक से नहीं समझते हैं. योगी जो भी बोलते हैं, उसका संदेश बांग्ला भाषियों के बीच सकारात्मक नहीं जाता है. उन्हें लगता है कि ये बंगालियों पर थोपना चाहते हैं. योगी आदित्यनाथ की रैलियों से संभव है हिन्दी भाषी आकर्षित होते हों लेकिन बांग्ला भाषियों को दूर कर दे रहे हैं. बीजेपी के लोग मछली दिखाकर खाने पर क्यों मजबूर हुए?''

सुमन भट्टाचार्य कहते हैं, ''योगी अगर विशेष रूप से हिन्दी भाषियों को आकर्षित करने के लिए ये सब करेंगे तो बांग्ला प्राइड का रुख़ कुछ और होगा. योगी अगर बंगाल को ठीक से समझते, तो बांग्ला अस्मिता की राजनीति को हिन्दुत्व से जोड़ सकते थे.''

''लेकिन हिन्दी प्रदेश वाला फॉर्मूला यहाँ नहीं चलेगा. यहाँ हिन्दुत्व बांग्ला अस्मिता के साथ मुस्लिम विरोधी होकर नहीं जुड़ सकता. टीएमसी के ख़िलाफ़ सत्ता विरोधी लहर बहुत थी लेकिन बीजेपी ने इसे कैप्चर करने के बजाय उत्तर भारत की धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति पर ज़्यादा ज़ोर दिया. इसमें कोई शक नहीं है कि टीएमसी से लोग ख़ुश नहीं हैं लेकिन बीजेपी को लेकर लोगों के मन में शंकाएँ भी हैं.''

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इमेज कैप्शन, योगी आदित्यनाथ अपनी रैलियों में पश्चिम बंगाल की सरकार को हिन्दू विरोधी बताते हैं

'सवाल सर्वाइवल का है'

हालांकि वरिष्ठ पत्रकार दीप हलदर सुमन भट्टाचार्य की बातों से सहमत नहीं हैं. दीप कहते हैं कि योगी की भाषा बहुत अलग है, ये बात सही है लेकिन बंगाल की डेमोग्राफ़ी भी बदली है.

दीप कहते हैं, ''कोलकाता की आबादी में बड़ी संख्या ग़ैर-बंगालियों की है. बिहार और यूपी के लोग बड़ी संख्या में बंगाल के वोटर हैं. योगी की रैलियां जहाँ हो रही हैं, वहाँ हिन्दी भाषी ही नतीजों को प्रभावित करते हैं. बीजेपी की रणनीति देखिए- प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य और बंगाल के नेता प्रतिपक्ष सुवेंदू अधिकारी. दोनों की भाषा में बहुत फ़र्क़ है. समिक आक्रामक नहीं हैं लेकिन सुवेंदू बहुत आक्रामक हैं. योगी की ही क्यों आप अमित शाह की भाषा देखिए. वे तो खुलेआम कह रहे हैं कि उल्टा लटका देंगे.''

दीप कहते हैं, ''मुझे लगता है कि टीएमसी के ख़िलाफ़ बहुत मुद्दे हैं. ऐसे में योगी की भाषा कोई मुद्दा नहीं है. जिन्हें योगी की शैली और रैली पसंद नहीं हैं, वे बंगाली ऐसे भी बीजेपी को वोट नहीं करते हैं. बंगाल की राजनीति अभी बहुत ही विभाजित है. जो स्विंग वोटर है, उसके लिए ये सब मायने नहीं रखता है. बीजेपी हिन्दुत्व को भी बंगाल से जोड़ती है लेकिन यहाँ का हिन्दुत्व उत्तर भारत वाला नहीं चलेगा.''

वीडियो कैप्शन, योगी आदित्यनाथ की रैली में लोग क्या बोले?

2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी की जीत की भविष्यवाणी की जा रही थी लेकिन वो 77 सीटें ही जीत पाई थी.

हालाँकि यह 2016 के विधानसभा चुनाव की तुलना में ये बीजेपी का बहुत बेहतर प्रदर्शन था.

लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की सीट 2019 के लोकसभा चुनाव की तुलना में कम हो गई.

2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को पश्चिम बंगाल में 18 सीटें मिली थीं, जो 2024 में कम होकर 12 हो गईं.

दीप कहते हैं, ''मेरा मानना है कि पश्चिम बंगाल में बीजेपी का अपना वोट बहुत ज़्यादा नहीं है लेकिन ममता और टीएमसी के ख़िलाफ़ वोट बहुत ज़्यादा हैं, जो बीजेपी के पास आते हैं. अगर सीपीआईएम और कांग्रेस यहाँ मज़बूत होती तो ये वोट बीजेपी के पास नहीं आते. ये वोट टीएमसी के ख़िलाफ़ हैं. 2011 में पूरा का पूरा लेफ़्ट काडर उठकर टीएमसी में आ गया था. लेफ़्ट का जो काडर बचा था वो टीएमसी के डर से बीजेपी में शिफ़्ट में हो गया. ये बोलने के लिए ठीक है कि हिन्दुत्व की राजनीति बंगाल में काम करेगी या नहीं लेकिन यहाँ मामला सर्वाइवल का है. पश्चिम बंगाल में विपक्ष के लिए सत्ता से लड़ना बहुत मुश्किल काम है.''

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इमेज कैप्शन, ममता बनर्जी ने गुरुवार को भबानीपुर में पदयात्रा निकाली थी

टीएमसी का विकल्प

गुरुवार को ममता बनर्जी कोलकाता की भबानीपुर सीट पर पदयात्रा कर रही थीं. ममता का साथ देने के लिए कोलकाता के मेयर और टीएमसी के वरिष्ठ नेता फ़िरहाद हाकिम भी थे.

उनसे मैंने पूछा कि योगी उन्हें रैलियों में ख़ूब निशाने पर ले रहे हैं. इस पर फिरहाद हाकिम ने कहा, ''योगी जी को लगता है कि उर्दू मुसलमानों की भाषा है. लेकिन उर्दू भारतीय भाषा है. मेरा मानना है कि योगी जिस लाइन पर रैली कर रहे हैं, वो हमारे हक़ में ही है. दरअसल योगी बांग्ला प्राइड को चुनौती दे रहे हैं और इसे बंगाली कभी स्वीकार नहीं करेंगे.''

ममता बनर्जी की पदयात्रा में महिलाओं की बड़ी संख्या थी. क़रीब 60 साल की एक महिला अपने घर से निकल ममता के आने का इंतज़ार कर रही हैं.

ममता पहुँचती हैं तो हाथ जोड़कर अभिवादन करती हैं और वह मुस्कुरा देती हैं.

मैंने उनसे पूछा कि उन्हें ममता बनर्जी की कौन बातें पसंद हैं? जवाब में वह कहती हैं, ''मैं भबानीपुर की ही वोटर हूँ. मुझे हर महीने लक्ष्मी भंडार योजना के तहत 1500 रुपए मिलते हैं. ममता हमलोग का बहुत ख्याल रखती हैं.'' लेकिन बीजेपी तो 3000 रुपए देने का वादा कर रही है. इसके जवाब में वह कहती हैं, ''मुझे इस पर भरोसा नहीं है. ममता पर मैं भरोसा कर सकती हूँ.''

जब इन्होंने भरोसे वाली बात कही तो मुझे खड़गपुर में बीजेपी के वरिष्ठ नेता और खड़गपुर सदर से बीजेपी के उम्मीदवार दिलीप घोष के घर के बाहर खड़े एक स्थानीय युवा पत्रकार की बात याद गई.

उनका कहना था कि बीजेपी दमख़म के साथ चुनाव लड़ रही है लेकिन यह शहर और संकल्प पत्र में ज़्यादा है, गाँवों में कम है.

उस युवा पत्रकार का कहना था, ''हम टीएमसी से बहुत परेशान हैं लेकिन मेरी माँ को हर महीने 1500 रुपए मिलते हैं. उसे भरोसा नहीं है कि बीजेपी 3000 रुपए देगी क्योंकि टीएमसी के लोग आकर मेरी माँ से सवाल पूछते हैं कि कोई ऐसा राज्य बताओ जहाँ बीजेपी 300 रुपए दे रही है? गाँवों में बीजेपी का संगठन टीएमसी की तरह मज़बूत नहीं है. बंगाल के चुनाव में मुद्दा ये नहीं है कि कौन उर्दू बोलेगा और कौन बांग्ला. लोगों को लग रहा है कि टीएमसी भी सीपीएम बन गई है, ऐसे में टीएमसी के विकल्प को लेकर लोग बहुत सतर्क भी हैं.''

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.