टीम इंडिया के दिग्गजों का दौर ख़त्म हुआ या 'आख़िरी सपना' होगा सच?
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- Author, विमल कुमार
- पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिन्दी के लिए
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
मायूसी के दौर में अक्सर ये कहा जाता है कि 'इस रात की सुबह नहीं होगी.'
मुंबई में न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ लगातार तीसरे टेस्ट मैच में लंच के ठीक बाद मिली हार के बाद ये कहा जा सकता है कि भारतीय क्रिकेट में इस दोपहर के बाद शाम नहीं दिखती. और अगर वो शाम आती भी है तो अगले साल जनवरी से पहले भारतीय क्रिकेट में नए युग की सुबह नहीं नज़र आ रही है.
आख़िरकार, क्रिकेट में जिस भारतीय किले को अभेद्य और सबसे दुर्गम माना जाता था, उसे न्यूज़ीलैंड की टीम ने अपने सबसे कामयाब बल्लेबाज़ और अनुभवी खिलाड़ी केन विलियमसन की गैर-मौजूदगी में ही ना सिर्फ़ तोड़ा, बल्कि घरेलू ज़मीन पर लगातार 18 सिरीज़ जीतने वाले उसके 'घमंडी आंकड़े' को भी चकनाचूर कर दिया.
जब आप ये सोचें कि मुंबई में तो पुणे टेस्ट के हीरो मिचेल सैंटनर भी नहीं थे, तो आपको एहसास होगा कि पिछले 25 सालों में टेस्ट क्रिकेट में भारतीय क्रिकेट का ये सबसे निराशाजनक दौर है.
1999-2000 में दक्षिण अफ़्रीका के ख़िलाफ़ दो मैचों की सिरीज़ में सचिन तेंदुलकर की टीम का सूपड़ा साफ़ हो गया था और इस निराशा के बाद मास्टर ब्लास्टर ने कप्तानी से हमेशा के लिए तौबा कर ली थी.
ये वो दौर था जब भारतीय क्रिकेट मैच-फिक्सिंग के साए से उबरने की कोशिश कर रहा था.
इसके बाद सौरव गांगुली की कप्तानी में भारतीय क्रिकेट में एक नए युग की शुरुआत हुई.
घरेलू मैदान में हार के बाद आत्ममंथन के ज़रिए एक मज़बूत आधार बनाया गया, जिससे भारत को न सिर्फ़ घरेलू मैदानों पर ऐतिहासिक जीतें मिलीं, बल्कि विदेशी दौरों पर भी नियमित अंतराल में सफलता देखने को मिली.
भारतीय क्रिकेट अब किस दिशा में जाएगा?
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अब सवाल ये है कि क्या भारतीय क्रिकेट में एक बार फिर से आत्ममंथन होगा? क्या मुख्य चयनकर्ता अजीत अगरकर और हेड कोच गौतम गंभीर अनुभवी खिलाड़ियों के योगदान और उनके भविष्य को लेकर संवेदनशील मुद्दों पर ईमानदारी से राय बना पाएंगे?
ये पूरी तरह मुमकिन है कि कप्तान रोहित शर्मा और विराट कोहली इस महीने से शुरू हो रहे ऑस्ट्रेलिया दौरे में अपने बल्ले की ख़नक को वापस हासिल कर लें.
मुमकिन है कि टीम इंडिया लगातार तीसरी बार चमत्कारिक रूप से ऑस्ट्रेलिया में टेस्ट सिरीज़ भी जीत ले.
लेकिन, तब भी भारतीय क्रिकेट को एक कड़वे सच से रूबरू होना ही पड़ेगा. वो सच जो न्यूज़ीलैंड ने भारतीय क्रिकेट को दिखाया है, ये कि शायद रोहित और विराट के दबदबे वाले दौर का अब अंत हो चुका है.
ये दोनों महान खिलाड़ी हैं और उनकी काबिलियत रातों-रात ख़त्म नहीं होगी. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि भारतीय क्रिकेट के भविष्य का रास्ता इन अनुभवी कंधों के सहारे तय किया जा सकता है.
क्रिकेट के इतिहास पर अगर ग़ौर करें तो ये अक्सर अपने सबसे प्यारे सपूत के साथ आख़िरी वक्त में निर्ममता से ही पेश आता है. इस खेल ने सर डॉन ब्रैडमन को उनकी आख़िरी पारी में नहीं बख्शा और शून्य पर विदाई दी. अगर वो सिर्फ 4 रन और बना लेते तो उनका औसत 100 रन का होता.
विवियन रिचर्ड्स, रिकी पोन्टिंग और यहां तक कि सचिन तेंदुलकर को भी क्रिकेट ने ये बताने से गुरेज़ नहीं किया कि बढ़ती उम्र का असर उनके खेल पर भी पड़ता है.
विराट कोहली और रोहित शर्मा
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तो क्या विराट कोहली और रोहित शर्मा भी उसी दौर में पहुंच चुके हैं?
रोहित ने तो मैच हारने के बाद खुद सार्वजनिक तौर पर माना कि एक बल्लेबाज़ और कप्तान के तौर पर वो अपनी लय में नहीं थे.
भारतीय क्रिकेट में सिरीज़ हारने के बाद कोई कप्तान सरेआम इस तरीके़ से अपनी ग़लती नहीं क़बूल करता है. लेकिन, क्या रोहित के पास कोई दूसरा विकल्प भी बचा था जब मुंबई के ही दिग्गज खिलाड़ी चाहे वो सुनील गावस्कर हों या फिर रवि शास्त्री या फिर संजय मांजरेकर, जो मौजूदा कप्तान के टेम्परामेंट और तकनीक पर तीखी टिप्पणियां करने से नहीं हिचक रहे थे?
विराट कोहली के लिए ये दौर 2014 के इंग्लैंड दौरे के बाद उनके करियर का सबसे ख़राब दौर है. पिछले 5 सालों में उनका औसत 55 से गिरते हुए अब 30 के क़रीब पहुंच गया है.
इस दौरान बड़ी पारियां तो दूर की बात, शतक भी बड़ी मुश्किल से आ रहे हैं. दूसरी तरफ उनके समकालीन और ''फेव4'' के अहम सदस्य जो रूट, शतकों का अंबार लगा रहे हैं ( पिछले 4 सालों में 18 शतक).
वहीं कोहली के लिए इस सिरीज़ में छह पारियों में कुल मिलाकर भी 100 रन नहीं बना पाना उनकी बादशाहत वाली छवि के साथ बिल्कुल अटपटा सा लगता है.
आख़िर चूक किससे हो रही है?
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रविंद्र जडेजा ने भले ही मुंबई में दोनों पारियों में 5-5 विकेट लेकर आलोचकों को शांत कर दिया हो, लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू ये भी है कि इस मैच से पहले पिछली 24 पारियों में जडेजा ने सिर्फ एक बार पारी में 5 विकेट लिये थे.
सिर्फ इस साधारण सिरीज़ के बाद रविचंद्रन अश्विन की आलोचना करना शायद सही नहीं हो क्योंकि वो बांग्लादेश के ख़िलाफ़ पिछली ही सिरीज़ में मैन ऑफ़ द सिरीज़ रहे थे.
तो इसका मतलब, क्या आप यशस्वी जायसवाल की आलोचना करेंगे जिन्होंने इस साल टेस्ट क्रिकेट में भारत के लिए सबसे ज़्यादा रन बनाये हैं, या फिर मुंबई की दोनों पारियों में नाकाम होने वाले युवा सरफ़राज़ ख़ान की, जिसने सिर्फ एक मैच पहले बैंगलोर में 151 रनों की पारी खेली थी?
या फिर आलोचना शुभमन गिल की होगी जो लगातार बेहतर होते तो दिख रहे हैं, लेकिन जिस तरह की काबिलियत उनमें दिखती है, अब भी उस अंदाज़ में रन नहीं बटोर रहे हैं.
केएल राहुल जो अक्सर ऐसे मौकों पर सोशल मीडिया में बलि का बकरा बनते हैं वो पिछले दो मैचों से प्लेइंग इलेवन का ही हिस्सा नहीं रहे.
ऋषभ पंत और वॉशिंगटन सुंदर पूरी मायूसी के बीच सिर्फ उम्मीद की किरण बनकर उभरे. इत्तेफ़ाक़ की बात ये है कि इन दोनों ने ऑस्ट्रेलिया दौरों पर भारतीय क्रिकेट को बेहद नाज़ुक लम्हों से उबारते हुए मैच नहीं बल्कि सिरीज़ जिताई है.
लेकिन, ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ कुछ हफ्तों बाद होने वाली टेस्ट सिरीज़ में सिर्फ इन दोनों के बूते वापसी की उम्मीद नहीं की जा सकती.
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पिछले साल नंवबर में वन-डे वर्ल्ड कप के फ़ाइनल में नाकामी के बावजूद रोहित शर्मा और उनके साथियों ने टीम के अनुभवी खिलाड़ियों पर भरोसा नहीं खोया था और छह महीने बाद ही टी20 वर्ल्ड कप में एक यादगार जीत हासिल की.
लेकिन, न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ इस करारी हार के बाद टेस्ट क्रिकेट में भारतीय क्रिकेट के पास छह महीने का संयम नहीं होगा और न दिग्गजों के पास अगले छह हफ्ते से ज़्यादा वक्त.
अगर इन छह हफ्तों के दौरान रोहित-विराट-अश्विन-जडेजा और बुमराह अपनी लय हासिल कर लेते हैं तो 29 जून 2024 को बारबाडोस में जो हुआ, वो 7 जनवरी 2025 को सिडनी में भी मुमिकन है.
ऐसा हुआ तो, एक सपने वाली यादगार जीत के साथ ही मौजूदा पीढ़ी की चैंपियन चौकड़ी की एक यादगार विदाई भी हो सकेगी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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