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'मेरी मार्कशीट जला दो मुझे उसकी ज़रूरत नहीं': आंदोलनकारी से लेकर मुख्यमंत्री बनने तक की हिमंत बिस्वा सरमा की कहानी
- Author, जुगल पुरोहित
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, जोरहाट, असम
- पढ़ने का समय: 10 मिनट
"तुम मेरी मार्कशीट जला सकते हो. मुझे उसकी ज़रूरत नहीं पड़ेगी, उन्होंने मुझसे कहा था.''
क़रीब तीस साल पहले राहुल महंता, छात्र जीवन में हिमंत बिस्वा सरमा के साथ हॉस्टल में रहते थे. वो याद करते हैं कि सरमा अपने करियर को लेकर बिलकुल स्पष्ट थे यानी राजनीतिक जीवन.
महंता ने बताया, "ग्रेजुएशन के बाद हम अपनी मार्कशीट्स को लेकर बहुत गंभीर थे, लेकिन वह नहीं थे."
तीन दशक से भी पहले, ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (ऐएएसयू) के छात्र कार्यकर्ता के रूप में शुरुआत करने वाले सरमा आगे चलकर कांग्रेस के प्रमुख नेता बने, जिन्होंने अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर बीजेपी की राजनीति को चुनौती दी.
2014 में तेजपुर में भाषण देते हुए उन्होंने गुजरात में हिंसा की राजनीति पर टिप्पणी की थी जिस पर चुनाव आयोग ने उनसे जवाब मांगा था.
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हालांकि, एक साल बाद उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी. आज 11 साल बाद वो बीजेपी के सबसे मुखर और विवादास्पद चेहरों में से एक हैं.
पांच साल मुख्यमंत्री रहने के बाद 9 अप्रैल को होने वाले विधानसभा चुनाव में वो एक और कार्यकाल की तलाश में हैं. उनके राजनीतिक सफ़र, प्रेरणा और कामकाज पर एक नज़र डालते हैं.
आंदोलन के बीच राजनीति की ओर आकर्षण
1969 में जोरहाट में जन्मे सरमा के पिता सरकारी कर्मचारी थे. उनका पालन-पोषण गुवाहाटी में हुआ.
सरमा के चाचा सोमनाथ बताते हैं, "मुझे याद है कि हिमंत जी ने 10-12 साल की उम्र में ही राजनीति में क़दम रख दिया था. उस समय पूरे राज्य में आंदोलन चल रहे थे."
1980 के दशक की शुरुआत में असम में 'बाहरी' लोगों (मुख्यतः बांग्लादेश से आए शरणार्थियों और अवैध प्रवासियों) के ख़िलाफ़ छात्र आंदोलन ने पूरे राज्य को हिला दिया था.
1985 में भारत सरकार, असम सरकार, ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन और ऑल असम गणसंग्राम परिषद के बीच असम समझौता हुआ. उसी साल आंदोलन के नेताओं ने चुनाव जीता और सरकार बनाई.
इसी दौरान सरमा को एक असमिया फ़िल्म में काम करने का मौक़ा मिला. हाथी पर सवार उनका एक गाना उनके यूट्यूब चैनल पर मौजूद है. किशोरावस्था में ही सरमा राजनीति की समझ रखने लगे थे.
महंता याद करते हैं, "वह बेहतरीन वक्ता और सभी से मेलजोल रखने वाले छात्र नेता थे. वो उस समय भी कहते थे, "एक दिन मैं असम का मुख्यमंत्री बनूंगा."
सरमा ने पॉलिटिकल साइंस में एमए किया और 1995 में क़ानून की डिग्री हासिल की थी. 2006 में उन्होंने गुवाहाटी विश्वविद्यालय से पीएचडी पूरी की.
महंता बताते हैं, "हेमंत कहते थे कि अगर पॉलिटिक्स में करियर बनाना है तो राष्ट्रीय राजनीति में बनाओ, क्षेत्रीय राजनीति में नहीं. शायद उस समय उनकी उम्र 22 साल रही होगी."
कांग्रेस मंत्री के रूप में उथल-पुथल भरा समय
1996 के विधानसभा चुनाव से पहले सरमा कांग्रेस में शामिल हो गए. उन्हें जलुकबाड़ी से चुनाव लड़ने को कहा गया, जहां से वो हार गए. लेकिन उन्होंने 2001 में वापसी की और तब से वहाँ से लगातार जीत रहे हैं.
2001 में कांग्रेस की जीत के बाद वो मंत्री बने और बाद में उन्होंने स्वास्थ्य, शिक्षा और वित्त जैसे महत्वपूर्ण विभाग संभाले.
उनके राजनीतिक उभार के साथ विपक्ष ने उन पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाए. कांग्रेस में उनके कार्यकाल के समय बीजेपी ने उन पर कई सवाल उठाए. हालांकि, सरमा ने ख़ुद को निर्दोष बताया और उनके चुनावी हलफ़नामे में किसी लंबित आपराधिक मामले का ज़िक्र नहीं है.
इस दौरान वो बीजेपी नेतृत्व की आलोचना के लिए भी जाने गए.
बीजेपी में शामिल होना
2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की जीत के साथ ही सरमा और तत्कालीन मुख्यमंत्री तरुण गोगोई तथा कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के बीच संबंध बिगड़ने लगे.
लगातार 15 वर्षों तक मुख्यमंत्री रहे तरुण गोगोई का प्रभाव राज्य और पार्टी दोनों में मज़बूत था.
सरमा ने 2015 में कांग्रेस छोड़ दी और बीजेपी में शामिल हो गए.
क्या यह अवसरवाद नहीं था? मैंने उनके मित्र महंता से पूछा. उन्होंने कहा, "मुझे नहीं लगता कि वह कांग्रेस छोड़ना चाहते थे. उन्होंने अपने क्षेत्र और राज्य में पार्टी को मज़बूत करने के लिए कड़ी मेहनत की थी. लेकिन राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के कारण उनसे यह सब छीना जा रहा था."
2016 के चुनाव में जब बीजेपी ने असम में कांग्रेस को सत्ता से हटाया, तो सरमा को कैबिनेट में जगह मिली. 2021 में बीजेपी की दोबारा जीत के बाद वो असम के 15वें मुख्यमंत्री बने.
राइजोर दल, कांग्रेस-नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन का हिस्सा है. मैं राइजोर दल के प्रमुख अखिल गोगोई से मिला, जिन्होंने सरमा की तरह ही छात्र नेता के रूप में शुरुआत की थी.
अखिल गोगोई ने कहा, "यह चुनाव बीजेपी के ख़िलाफ़ नहीं है. विपक्ष का मुख्य मुद्दा हिमंत बिस्वा सरमा हैं. मुझे लगता है कि वे असम के सबसे बदनाम मुख्यमंत्री हैं. उनके ख़िलाफ़ कई मामले हैं."
लेकिन सरमा का चुनावी हलफ़नामा स्पष्ट है कि उनके ख़िलाफ़ कोई मामला नहीं है. इस पर गोगोई ने कहा, "हम जीतने के बाद अदालत जाएंगे, पुलिस स्टेशन जाएंगे और सरमा के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज कराएंगे."
असम के चाय बागानों की राजनीति
देश के लगभग आधे चाय उत्पादन का केंद्र होने के कारण, असम के चाय बागान मज़दूर राज्य की राजनीति का एक बड़ा हिस्सा हैं इसलिए राज्य में राजनीतिक प्रभुत्व का रास्ता चाय बागानों से होकर गुज़रता है.
हज़ारों बागानों में काम करने वाले मंगल टांटी जैसे मज़दूरों को सभी राजनीतिक दल अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं.
हिमंत बिस्वा सरमा की बीजेपी सरकार ने उन्हें उस ज़मीन का मालिकाना हक़ देना शुरू किया है, जिस पर चाय बागान में उनके घर बने हैं और जो ज़मीन बागान मालिकों को राज्य सरकार ने लीज़ (पट्टे) पर दी थी.
टांटी को कुछ दिन पहले ही ज़मीन की मिलकीयत के काग़ज़ात मिले हैं.
उन्होंने कहा, "मेरा परिवार 200 साल से यहां रह रहा है, लेकिन ज़मीन हमारी नहीं थी. मैनेजर हमें कभी भी निकाल सकता था और हम तुरंत बेघर हो जाते. लेकिन अब यह ज़मीन हमारी है. यह हमारे लिए बहुत ख़ास बात है."
हालांकि, अभी भी ज़्यादातर मज़दूरों को स्वामित्व के काग़ज़ नहीं मिले हैं, लेकिन कई लोग इस बारे में आशान्वित हैं. कई मज़दूर कम मेहनताना मिलने की शिकायत भी करते हैं.
पहचान की राजनीति और अल्पसंख्यकों की शिकायत
हिमंत बिस्वा सरमा अक्सर अपनी राजनीति को असमिया पहचान के अस्तित्व की 'लड़ाई' के रूप में पेश करते हैं.
जुलाई 2024 में उन्होंने कहा, "असम में मुस्लिम आबादी आज 40 प्रतिशत है. 1951 में यह 12 प्रतिशत थी. हम एक-एक करके ज़िले खो रहे हैं. मेरे लिए यह राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु का सवाल है."
लेकिन असम सरकार की एक रिपोर्ट के अनुसार, 1951 में राज्य की मुस्लिम आबादी 24.68 प्रतिशत थी, जो 2011 की जनगणना में बढ़कर 34.2 प्रतिशत हो गई. इसके बाद कोई जनगणना नहीं हुई है.
रहीमा बेगम का मामला
पिछले साल मई में रहीमा बेगम ने ख़ुद को इस 'लड़ाई' के बीच में पाया जब पुलिस उनके घर आई और उन्हें "वेरिफ़िकेशन" के लिए साथ चलने को कहा.
उन्होंने बताया, "पुलिस ने कहा कि हमें बांग्लादेश जाना होगा. हम डर गए और चिल्लाने लगे- 'वह मेरा देश नहीं है… मेरा जन्म यहां हुआ है…' लेकिन वे हमें सीमा की ओर ले गए. उन्होंने कहा पीछे मत देखो और चलते रहो. जब हम सीमा पार पहुंचे, तो बांग्लादेश के स्थानीय लोगों ने हमसे सवाल किए, हमें बुरी तरह पीटा और वापस जाने को कहा."
रहीमा कुछ दिन बांग्लादेश में रहीं और बाद में दोनों देशों के अधिकारियों की सहमति से उन्हें वापस आने की अनुमति मिली.
उन्होंने कहा, "मुझे नई ज़िंदगी मिली, क्योंकि मेरे बच्चों ने मेरे लिए लड़ाई लड़ी. पुलिस ने मेरे दस्तावेज़ों की ठीक से जांच नहीं की, इसलिए यह हुआ."
जोरहाट के "विदेशी के लिए बने ट्राईब्यूनल" ने 2025 में उन्हें "विदेशी" घोषित किया था, यानी ऐसा व्यक्ति जो 1966 से 1971 के बीच अवैध रूप से असम में आया.
असम समझौते के अनुसार, ऐसे लोग भारत में रह सकते हैं, लेकिन उनके नाम 10 वर्षों के लिए मतदाता सूची से हटा दिए जाते हैं.
हमने गोलाघाट के पुलिस अधीक्षक, असम के गृह सचिव और बीएसएफ़ प्रवक्ता से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन इस मामले में कोई जवाब नहीं मिला.
'कोई मेरा विरोध नहीं करता'
पूर्वी असम के डुलियाजन में एक रैली में मैंने मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा से पूछा कि क्या उन्होंने असम समाज के सभी वर्गों के साथ न्याय किया है.
उन्होंने कहा, "सभी वर्ग बहुत ख़ुश हैं — चाहे वे हिंदू हों, मुस्लिम हों या ईसाई. वे डांस कर रहे हैं. हमने असम के पूरे समाज को एक कर दिया है."
जब उनसे विपक्ष के उन आरोपों के बारे में पूछा गया, जिनमें उन्हें सांप्रदायिक और अलोकतांत्रिक कहा जाता है, तो उन्होंने जवाब दिया, "कोई मेरा विरोध नहीं करता. बीबीसी को निष्पक्ष होना चाहिए." और यह कहकर उन्होंने आगे बात नहीं की और चले गए.
सरमा अपनी व्यक्तिगत लोकप्रियता, विकास कार्यों, रोज़गार और राज्य की तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के दम पर चुनाव लड़ रहे हैं. उनकी पार्टी ने अवैध प्रवासियों और सरकारी ज़मीन पर अवैध क़ब्ज़ा करने वालों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई का भी वादा किया है.
वहीं विपक्ष ने उनके ख़िलाफ़ कड़ा रुख़ अपनाया है.
अखिल गोगोई ने कहा, "वो स्वास्थ्य मंत्री और शिक्षा मंत्री रहे हैं, लेकिन हमारे सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की हालत देखिए. मीडिया ने उन्हें बड़ा बनाया है, वरना वो सिर्फ़ एक अवसरवादी हैं."
आरोप और जवाब
चुनाव से कुछ दिन पहले कांग्रेस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आरोप लगाया कि हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी रिनिकी भुइयां शर्मा के पास तीन अलग-अलग पासपोर्ट हैं और वो एक अमेरिकी कंपनी की बोर्ड में शामिल हैं. कांग्रेस ने पूछा कि क्या केंद्रीय गृह मंत्री इस मामले की जांच कराएंगे.
सरमा की पत्नी प्राइड ईस्ट एंटरटेनमेंट्स प्राइवेट लिमिटेड की सीएमडी हैं, जो खुद को एक प्रमुख क्षेत्रीय मीडिया समूह बताती है. कंपनी की वेबसाइट के अनुसार, इसकी स्थापना 14 साल पहले हुई थी, जब सरमा मंत्री थे. बीबीसी ने उनसे संपर्क किया, लेकिन उन्होंने इंटरव्यू देने से इनकार कर दिया.
सरमा ने इन आरोपों को निराधार बताया और कहा कि वो और उनकी पत्नी कांग्रेस नेताओं के ख़िलाफ़ मानहानि का मुक़दमा दायर करेंगे. उन्होंने यह भी दावा किया कि अमेरिका के उक्त प्रांत में किसी के नाम पर कंपनी रजिस्टर करना आसान काम है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.