पश्चिम बंगालः तृणमूल कांग्रेस में अंतर्कलह में मौका तलाशती बीजेपी
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- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए
पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस में नई और पुरानी पीढ़ी के नेताओं के बीच जारी टकराव पर भारतीय जनता पार्टी की भी नज़र है.
दरअसल 2024 लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा, 2021 के विधानसभा चुनाव में आजमाए हुए फार्मूले यानी तृणमूल कांग्रेस के बड़े नेताओं को अपने पाले में करने की राह पर चलने का प्रयास कर रही है.
उत्तर बंगाल में तो पार्टी मजबूत है और वर्ष 2019 में उसने एक के अलावा इलाक़े की बक़ी सीटें जीत ली थीं. लेकिन इस बार उसकी निगाहें दक्षिण बंगाल के उन इलाक़ों पर हैं जहां उसका प्रदर्शन कमजोर रहा था.
इनमें कोलकाता से सटे उत्तर और दक्षिण 24 परगना ज़िलों के अलावा बीरभूम और जंगलमहल के इलाके शामिल हैं.
प्रदेश भाजपा के एक नेता नाम नहीं बताने की शर्त पर कहते हैं, "तृणमूल कांग्रेस में जारी टकराव पर केंद्रीय नेतृत्व की भी निगाहें हैं. आधा दर्जन ऐसे नेता हैं जिनके कारण दक्षिण बंगाल में हमारी स्थिति मजबूत हो सकती है."
हालांकि वो ऐसे नेताओं के नामों का खुलासा करने से इंकार करते हुए कहते हैं कि 'समय आने पर सब कुछ पता चल जाएगा.'
तृणमूल कांग्रेस भी इस ख़तरे से अनजान नहीं है.
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तृणमूल कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं, "भाजपा के लिए हमारे नेताओं को तोड़ने की कोशिश कोई नई नहीं है. भगवा पार्टी का यहां कोई अपना जनाधार तो है नहीं. वह तृणमूल कांग्रेस के नेताओं को डरा-धमका कर अपनी पार्टी में शामिल करने की जोड़-तोड़ में जुटी है."
वो मानते हैं कि पार्टी में नई और पुरानी पीढ़ी के नेताओं के बीच जारी उठापटक का फ़ायदा उठाने की कोशिश कर सकती है. लेकिन साथ ही उनका दावा है कि भाजपा को इसमें कोई क़ामयाबी नहीं मिलेगी.
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सुकांत मजूमदार का कहना है कि पार्टी दूसरे राजनीतिक दलों के ज़मीनी स्तर के कार्यकर्ताओं को अपने साथ लेने को तरजीह देगी.
वो कहते हैं, "सत्तारूढ़ पार्टी के ज्यादातर शीर्ष नेता भ्रष्टाचार में डूबे हैं. इसलिए अगर उस पार्टी के बूथ स्तर के कार्यकर्ता अगर हमारी पार्टी में शामिल होना चाहते हैं तो हम उनको ज़रूर साथ लेंगे."
लेकिन राजनीतिक पर्यवेक्षक ऐसे बयान की तुलना 'हाथी के दांत' से करते हैं.
प्रोफेसर समीरन पाल कहते हैं, "राजनीति में ऐसे बयानों का कोई ख़ास मतलब नहीं है. यह बहुत कुछ हाथी के दांत की तरह है, खाने के और दिखाने के और. इससे पहले भाजपा मुकुल राय और शुभेंदु अधिकारी समेत जिन नेताओं को साथ ले चुकी है उनके ख़िलाफ़ भी भ्रष्टाचार के आरोप थे."
ग़ौरतलब है कि बीते सप्ताह पार्टी की दो-दिवसीय राज्य समिति की बैठक में भी इस मुद्दे पर गहन आलोचना की गई.
साल 2021 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी की ओर से तमाम ज़िलों में आयोजित योगदान मेला सुर्ख़ियों में रहा था. इसके ज़रिए दूसरे दलों के नेताओं को पार्टी में शामिल किया गया था.
चुनाव में इसका नतीजा भी सामने आया और पार्टी की सीटें बढ़ कर 77 तक पहुंच गई.
भाजपा के एक वरिष्ठ नेता नाम नहीं छापने की शर्त पर बताते हैं, "राज्य समिति की बैठक में इस मुद्दे पर गंभीर बातचीत हुई है. लेकिन अबकी बड़े नेताओं की जगह ज़मीनी स्तर के कार्यकर्ताओं को तरजीह दी जाएगी. इस योगदान मेले के लिए तीन स्तर पर समितियों का गठन किया जाएगा."
वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव से पहले राज्य में दूसरे दलों के नेताओं-कार्यकर्ताओं को पार्टी में शामिल करने की पहल तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष ने की थी.
बाद में इसकी बागडोर तत्कालीन पर्यवेक्षक कैलाश विजयवर्गीय और पार्टी के नेता मुकुल राय के हाथों में चली गई.
लेकिन अब विजयवर्गीय मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री हैं और मुकुल राय तृणमूल कांग्रेस में लौट चुके हैं. इसलिए अबकी यह ज़िम्मेदारी प्रदेश अध्यक्ष सुकांत मजूमदार और विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी के कंधों पर है.
2021 के विधानसभा चुनावों में अपनी हार के बाद पश्चिम बंगाल में भाजपा आंतरिक संघर्ष, दलबदल और चुनावी असफलताओं से जूझ रही है.
केंद्रीय नेतृत्व ने पार्टी को अंतर्कलह पर क़ाबू पाने का निर्देश दिया है.
शाह और नड्डा के दौरे के दौरान एक असंतुष्ट नेता अनुपम हाजरा को पार्टी के सचिव पद से हटा कर असंतुष्ट नेताओं को कड़ा संदेश दिया है.
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भाजपा इस बार पिछली ग़लती को दोहराना नहीं चाहती. विधानसभा चुनाव से पहले उसने तृणमूल कांग्रेस के राजीव बनर्जी और सुनील मंडल समेत जिन मंत्रियों और पूर्व सांसदों को पार्टी में शामिल किया था उनमें से ज़्यादातर अब घर वापसी कर चुके हैं.
उधर, तृणमूल कांग्रेस का कहना है कि भाजपा को पहले अपना घर संभालना चाहिए.
पार्टी के सांसद शांतनु सेन ने कोलकाता में पत्रकारों से कहा, "भाजपा को पहले अपने कार्यकर्ताओं का पलायन रोकना चाहिए. उसके ज़मीनी स्तर से सैकड़ों कार्यकर्ता रोजाना तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो रहे हैं."
तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता कुणाल घोष कहते हैं, "भाजपा का पतन साल 2021 के विधानसभा चुनावों से ही शुरू हुआ था और अगले लोकसभा चुनावों में भी उसको भारी झटका लगेगा."
राजनीतिक पर्यवेक्षक प्रोफेसर समीरन पाल कहते हैं, "लोकसभा में अपनी सीटों की तादाद बढ़ाने या कम से कम अपनी पहले की 18 सीटें बचाने के लिए भाजपा तृणमूल कांग्रेस के नेताओं को अपने पाले में खींचने के लिए हर हथियार का इस्तेमाल करेगी."
उनके अनुसार, "पिछले चुनाव में हम यह देख चुके हैं. अमित शाह और जेपी नड्डा ने अपने दौरे में प्रदेश नेतृत्व को इस बारे में ठोस दिशा-निर्देश दिया है. 2021 के विधानसभा चुनाव में जीते कुछ विधायक भले तृणमूल कांग्रेस में लौट गए हों, अब भी भाजपा के पास कम से कम 69 विधायक तो हैं ही."
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