1971 की जंग के आख़िरी दिनों में याह्या ख़ाँ क्या कर रहे थे? - विवेचना

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इमेज कैप्शन, 1971 युद्ध के दौरान पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल याह्या ख़ाँ
    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
  • पढ़ने का समय: 15 मिनट

1971 की विधिवत लड़ाई शुरू होने के एक दिन पहले 2 दिसंबर की शाम ढाका के मार्शल लॉ प्रशासक की तरफ़ से तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति याह्या ख़ाँ के पास एक अर्जेंट सिग्नल संदेश आया कि जैसोर पर आख़िरकार भारतीय सेना का क़ब्ज़ा हो गया है.

संदेश देखते ही याह्या ख़ाँ ने अपने एडीसी अरशद समी ख़ाँ को आदेश दिया कि वो तुरंत लेफ़्टिनेंट जनरल हमीद, चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ गुल हसन को राष्ट्रपति भवन तलब करें.

जैसे ही ये तीनों याह्या ख़ाँ से मिलने के बाद गए याह्या ने अपने एडीसी अरशद समी ख़ाँ से अगले दिन के अपने सारे अपॉइंटमेंट्स रद्द करने के लिए कहा.

उस दिन सुबह 9 बजे जीएचक्यू की बैठक बुलाई गई जिसमें याह्या के अलावा पाकिस्तानी सेना के सभी आला अफ़सरों ने भाग लिया.

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जनरल याह्या के एडीसी रहे अरशद समी ख़ाँ अपनी किताब 'थ्री प्रेसिडेंट्स एंड एन एड' में लिखते हैं, "जनरल गुल हसन ने सबको ताज़ा घटनाक्रम की जानकारी देने के बाद ज़ोर देकर प्रस्ताव रखा कि पाकिस्तान इसका तुरंत जवाब दे वर्ना भारत पूरे पूर्वी पाकिस्तान पर हमला कर देगा और बाद में अपनी सेनाओं को पश्चिमी सीमा पर भी ले आएगा जहाँ उसके सैनिकों की अधिक संख्या हम पर भारी पड़ेगी."

"गुल हसन ने वहाँ मौजूद लोगों को याद दिलाया कि राष्ट्रपति याह्या ख़ाँ सार्वजनिक रूप से ऐलान कर चुके हैं कि अगर पाकिस्तान की एक इंच ज़मीन पर भी हमला किया गया तो इसका मतलब पूर्ण युद्ध होगा. वहाँ मौजूद हर व्यक्ति ये जानते हुए भी इस प्रस्ताव से सहमत था कि हम युद्ध की घोषणा करने की स्थिति में नहीं हैं ख़ासकर तब जब जिस भूमि के लिए हम लड़ रहे हैं वहाँ के लोग ही हमारी सेना के ख़िलाफ़ लड़ाई कर रहे हैं."

"याह्या ख़ाँ ने एक अच्छे कमांडर की तरह अपने जनरलों के प्रस्ताव को अपनी सहमति दे दी. लेकिन मुझे ये लग रहा था कि जनरल याह्या ख़ाँ को कहीं न कहीं ये अंदाज़ा था कि वो लड़ाई जीतने की स्थिति में नहीं हैं."

गिद्ध ने याह्या का रास्ता रोका

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इसके बाद पाकिस्तानी वायुसेनाध्यक्ष एयर मार्शल रहीम ख़ाँ ने जनरल गुल हसन से बेंत लेकर बताना शुरू किया कि किस तरह ये ज़रूरी है कि पाकिस्तानी वायुसेना तुरंत एक्शन में आए और भारतीय हवाई ठिकानों पर हवाई हमले शुरू करे ताकि भारतीय युद्धक विमानों को उड़ने का मौका ही नहीं मिल सके.

मीटिंग समाप्त होने के बाद तय हुआ कि 4 बजे जनरल हमीद ख़ुद याह्या ख़ाँ को लेने आएंगे और उन्हें एक दूसरी मीटिंग में ले जाएंगे.

निर्धारित समय पर जनरल हमीद अपनी टोयोटा मिलिट्री जीप पर याह्या ख़ाँ के पास पहुंचे.

अरशद समी ख़ाँ लिखते हैं, "हम जीप पर चढ़े जिसे जनरल हमीद ड्राइव कर रहे थे, जनरल याह्या उनकी बगल में बैठे हुए थे. मैं जीप के पीछे बैठा हुआ था, तभी मुझे एक अजीब सा दृश्य दिखाई दिया. न जाने कहाँ से एक बहुत बड़ा गिद्ध आकर जीप के रास्ते में बैठ गया. जनरल हमीद ने हॉर्न बजाया लेकिन वो टस से मस नहीं हुआ."

"जनरल याह्या ने नीचे उतरकर उसे अपने बेंत से भगाने की कोशिश की लेकिन गिद्ध एक दो कदम चलकर फिर बीच सड़क में रुक गया. आख़िरकार एक माली ने दौड़ कर अपने फावड़े से गिद्ध को दूर भगाया. जैसे ही हम मुख्य गेट पर पहुंचे याह्या ने अपना चेहरा नीचे कर लिया ताकि सुरक्षाकर्मी उन्हें देख न पाएं और उनके पीछे वाहनों का काफ़िला न चल पड़े. ये सब लोग एक बड़े गेट वाले गोदामनुमा भवन पर पहुंचे जहाँ एयर मार्शल रहीम ख़ाँ ने उनका स्वागत किया."

फ़ोन पर नूर जहाँ को गाना सुनाने को कहा

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इमेज कैप्शन, जनरल हमीद और राष्ट्रपति याह्या ख़ाँ

पूरी बैठक के दौरान आसमान में युद्धक विमानों के उड़ने की आवाज़ सुनाई देती रही.

कुल मिलाकर पाकिस्तान के 278 युद्धक विमानों में से 32 ने 3 दिसंबर के हमले में भाग लिया. ये हमले शाम 5 बजकर 9 मिनट से 5 बजकर 23 मिनट के बीच हुए.

अगले दिन जब ब्रिगेडियर गुल मवाज़ अपने मित्र याह्या से मिलने गए तो उन्होंने देखा कि याह्या और जनरल हमीद नशे में धुत्त थे.

हस्सन अब्बास अपनी किताब 'पाकिस्तान्स ड्रिफ़्ट इनटू एक्सट्रीमिज़्म' में लिखते हैं, "याह्या ने गुल मवाज़ से कहा, कमांडर के रूप में मैंने लड़ाई शुरू कर दी है. अब सब जनरलों के ऊपर है. जब वो बात कर रहे थे याह्या के पास जापान से मशहूर गायिका नूर जहाँ का फ़ोन आया. याह्या ने उनसे फ़ोन पर ही एक गाना सुनाने के लिए कहा."

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इमेज कैप्शन, मशहूर गायिका नूर जहां

गवर्नर मलिक ने संयुक्त राष्ट्र को भेजे जाने वाले संदेश का मसौदा भेजा

जैसे जैसे पूर्वी पाकिस्तान से पाकिस्तानी सेना के हारने की ख़बर आती चली गई वहाँ के गवर्नर अब्दुल मलिक ने याह्या को सिग्नल और सैकड़ों बार फ़ोन की मदद से ये संदेश भेजने शुरू कर दिए कि लड़ाई रोक कर समस्या का राजनीतिक समाधान ढूंढने की कोशिश करिए.

9-10 दिसंबर को गवर्नर मलिक और पूर्वी कमान के प्रमुख जनरल एएके नियाज़ी के संदेशों की झड़ी लग गई. अधिकांश संदेशों का लब्बोलुआब ये था कि हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं और तुरंत कुछ नहीं किया गया तो दो दिनों के अंदर पूर्वी पाकिस्तान भारत के हाथ में चला जाएगा.

याह्या ख़ाँ ने उनको जवाब दिया, "आप वहाँ पर हैं जहाँ ये सब कुछ हो रहा है. हताहतों की संख्या कम करने के लिए जो कुछ भी संभव हो आप करिए."

याह्या का संदेश पाकर गवर्नर मलिक ने संयुक्त राष्ट्र के महासचिव को भेजे जाने वाले संदेश का मसौदा उनके अनुमोदन के लिए भेजा जिसमें कहा गया था कि तुरंत युद्ध विराम किया जाए और पूर्वी पाकिस्तान के राजनीतिक प्रतिनिधियों को सत्ता का हस्तांतरण किया जाए.

याह्या की अनुमति के बिना संदेश संयुक्त राष्ट्र गया

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इमेज कैप्शन, पूर्वी पाकिस्तान के पूर्व गवर्नर अब्दुल मलिक

याह्या ये मसौदा पाकर परेशान हो गए. उन्होंने तुरंत जनरल हमीद को बुलवा भेजा.

अरशद समी ख़ाँ लिखते हैं, "याह्या ने हमीद से कहा, हैम, नियाज़ी को फ़ोन कर कहो कि उचित कदम उठाने की अनुमति देने का ये मतलब नहीं है कि वो हमारे कूटनीतिक कदमों में अपनी टाँग अड़ाएं."

"संयुक्त राष्ट्र के महासचिव को मलिक के भेजे प्रस्ताव का सीधा मतलब हुआ अवामी लीग को सत्ता सौंप देना. तुम ही उससे बात करो, क्योंकि अगर मैंने बात की तो मैं अपने गुस्से पर काबू नहीं रख पाऊंगा. इस समय किसी को अपना धैर्य नहीं खोना चाहिए."

कुछ देर बाद जनरल हमीद ने याह्या को और बुरी ख़बर सुनाई कि राष्ट्रपति का अनुमोदन पाए बिना ही जनरल फ़रमान अली ने गवर्नर का वो संदेश संयुक्त राष्ट्र के ढाका स्थित शरणार्थी और पुनर्वास प्रतिनिधि को भेज दिया है.

याह्या ने तुरंत विदेश सचिव सुल्तान ख़ाँ को आदेश दिया कि किसी तरह इस संदेश को वापस ले लिया जाए.

चीन ने पल्ला झाड़ा

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इमेज कैप्शन, जनरल याह्या को उम्मीद थी कि इस लड़ाई में चीन उनके साथ खुल कर खड़ा होगा

शुरू में पाकिस्तानी सेना को मिली सफलता ने याह्या को रोमांचित कर दिया था. राजस्थान में पाकिस्तानी सेना की शुरुआती सफलता और भारतीय युद्धपोत खुखरी के डुबोए जाने की ख़बर से उन्हें लगने लगा था कि भाग्य भी उनके साथ है.

अरशद समी ख़ाँ लिखते हैं, "आईएसआई के तत्कालीन प्रमुख ने उनसे कहा कि दुनिया की मशहूर ज्योतिषी जीन डिक्सन ने भविष्यवाणी की है कि एक शासनाध्यक्ष के रूप में अभी वो कम से कम दस सालों तक रहेंगे. याह्या ये सुनकर बहुत ख़ुश हुए. क्या पता था कि दस साल तो दूर कुछ दिनों के अंदर वो राष्ट्रपति नहीं रहेंगे."

जनरल याह्या को उम्मीद थी कि इस लड़ाई में चीन उनके साथ खुल कर खड़ा होगा. लेकिन चीन ने ऐसा करने से मना कर दिया.

पाकिस्तान के पूर्व विदेश सचिव सुल्तान अहमद अपनी आत्मकथा 'मेमोरीज़ एंड रेफ़्लेक्शन ऑफ़ अ पाकिस्तानी डिप्लोमैट' में लिखते हैं, "चीन के राजदूत ने मुझसे कहा कि हम पाकिस्तान को आर्थिक और राजनीतिक रूप से समर्थन देना जारी रखेंगे लेकिन इस लड़ाई मे हस्तक्षेप करने की हमारी क्षमता सीमित है और अगर हम ऐसा करें भी तो इसका एक संकुचित परिणाम ही निकल सकता है. इसलिए इस पर बहुत अधिक उम्मीद मत रखिए. पूर्वी पाकिस्तान में भारत का दबाव कम करने की ज़रूरत तुरंत है जबकि सीमा के पहाड़ी रास्तों में बर्फ़ जमने के कारण ऐसा करने में हफ़्तों लग जाएंगे."

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इमेज कैप्शन, पाकिस्तान के पूर्व विदेश सचिव सुल्तान अहमद की आत्मकथा

ईरान ने भी अपना हाथ खींचा

4 दिसंबर को याह्या ने पाकिस्तान में अमेरिकी राजदूत जोज़ेफ़ फ़ारलैंड को बताया कि उनकी सेना को अमेरिकी सैनिक रसद की बहुत सख़्त ज़रूरत है. अगर अमेरिका खुद ये सहायता नहीं दे सकता तो कम से कम दूसरे देशों को ऐसा करने से न रोके.

अमेरिका ने जॉर्डन, ईरान और सऊदी अरब से संपर्क कर उन्हें पाकिस्तान हथियार भेजने के लिए प्रोत्साहित किया लेकिन ईरान ने तब भी पाकिस्तान को हथियार नहीं भेजे.

ईरान के शाह रज़ा शाह पहलवी ने अमेरिकी राजदूत से कहा कि वो ईरानी विमान और पायलट पाकिस्तान भेज कर सोवियत संघ से भिड़ंत का जोखिम नहीं उठा सकते. ये हो सकता है कि वो अपने विमान जॉर्डन भेजे और जॉर्डन इसके बदले में अपने विमान पाकिस्तान भेज दे. (तेहरान एंबेसी फ़ाइल्स, निक्सन प्रेसिडेंशियल मेटेरियल बॉक्स पृष्ठ 643)

मोहम्मद यूनुस ने अपनी किताब 'भुट्टो एंड द ब्रेकअप ऑफ़ पाकिस्तान' में लिखा, "दरअसल ईरान का पाकिस्तान के साथ एक गुप्त समझौता था कि अगर भारत और पाकिस्तान के बीच लड़ाई होती है तो कराची की हवाई सुरक्षा की ज़िम्मेदारी ईरान की होगी. याह्या ने जब ईरान के शाह को इस समझौते की याद दिलाई तो शाह ने इस पर ये कहते हुए अमल करने से इनकार कर दिया कि अब ये मामला भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय नहीं रह गया है."

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इमेज कैप्शन, ईरान के शाह रज़ा शाह पहलवी

पोलैंड का प्रस्ताव बेकार गया

6 दिसंबर को भारत ने औपचारिक रूप से एक स्वतंत्र देश के रूप में बांग्लादेश को मान्यता दे दी और पाकिस्तान ने भारत से अपने सभी राजनीतिक संबंध तोड़ लिए. इस बीच भारतीय वायुसेना ने पश्चिमी सेक्टर में अपने हमले तेज़ कर दिए.

सुल्तान ख़ाँ ने लिखा, "राष्ट्रपति भवन के बगीचे में जल्दबाज़ी में एक गड्ढा खोद कर एक भूमिगत कमरा बनाया गया. उसकी छत पर बमों से बचने के लिए बालू के बोरे रखे गए. कम से कम दो बार उसी भूमिगत कमरे में जब मैं याह्या ख़ाँ से मंत्रणा कर रहा था, भारतीय विमानों ने हमला किया और एयर रेड सायरन बज उठे."

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में युद्ध विराम के कई प्रस्ताव पेश किए गए लेकिन सोवियत संघ ने उन सब को वीटो कर दिया. तभी उम्मीद की एक किरण जगी जब पोलैंड ने एक प्रस्ताव पेश किया जिसमें तुरंत युद्धविराम, दोनों सेनाओं के अंतरराष्ट्रीय सीमा पर जाने और पूर्वी पाकिस्तान की लड़ाई को राजनीतिक माध्यमों से सुलझाने की बात कही गई थी.

समय बीतता जा रहा था और पूर्वी पाकिस्तान में हार साफ़ दिखाई दे रही थी इसलिए याह्या ने न्यूयॉर्क में पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो से संपर्क कर पोलैंड का प्रस्ताव तुरंत स्वीकार करने का फ़ैसला लिया.

लेकिन भुट्टो फ़ोन पर उपलब्ध ही नहीं थे.

रिचर्ड सिसून और लिओ रोज़ ने अपनी किताब 'वॉर एंड सेसेशन पाकिस्तान, इंडिया एंड बांग्लादेश' में लिखा, "बाद में जब किसी तरह याह्या का भुट्टो से फ़ोन पर संपर्क हुआ तो भुट्टो ने जवाब दिया 'मुझे आपकी आवाज़ सुनाई नहीं दे रही.' याह्या ने कई बार अपनी बात दोहराई लेकिन भुट्टो कहते रहे- क्या?"

"आप क्या कह रहे हैं? मैं कुछ भी नहीं सुन पा रहा हूँ. तभी टेलिफ़ोन ऑपरेटर ने बीच में बोलते हुए कहा, 'लाइन बिल्कुल साफ़ है आप बोलिए.' इस पर भुट्टो ने चिल्ला कर कहा, 'शट अप.' इससे पहले की पोलैंड के प्रस्ताव पर विचार होता, 16 दिसंबर को पाकिस्तानी सेना ने हथियार डाल दिए."

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इमेज कैप्शन, जनरल नियाज़ी का आत्मसमर्पण

देर रात निक्सन का फ़ोन

इससे तीन दिन पहले याह्या ने अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को संदेश भेजा कि वो उनसे बात करना चाहते हैं. रात 2 बजे निक्सन ने वो कॉल रिटर्न की.

अरशद समी ख़ाँ लिखते हैं, "मैंने राष्ट्रपति को जगाया. नींद से भरे याह्या लाइन पर आए. क्योंकि टेलिफ़ोन लाइन बार बार टूट रही थी, राष्ट्रपति ने मुझसे कहा कि मैं समानांतर लाइन पर रहूँ और सारी बात सुनूँ. निक्सन ने याह्या से कहा कि वो पाकिस्तान की सुरक्षा के बारे में बहुत चिंतित हैं."

"इसलिए वो पाकिस्तान की मदद के लिए सातवाँ बेड़ा 'एंटरप्राइज़' बंगाल की खाड़ी में भेज रहे हैं. जैसी ही बातचीत बंद हुई याह्या ने मुझसे कहा कि जनरल हमीद को फ़ोन लगाओ. जैसे ही फ़ोन लगा याह्या ने लगभग चिल्लाते हुए कहा, 'हैम, वी हैव डन इट. अमेरिकी रास्ते में हैं.'"

"हम सभी लोग अगले दो दिनों तक अमेरिकी बेड़े का इंतज़ार करते रहे. लगता है वो कछुए की चाल से चल रहा था. बंगाल की खाड़ी में उसका दूर दूर तक कोई निशान नहीं था, यहाँ तक कि ढाका के गिरने के बाद भी.'

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पाकिस्तानी सेना में तालमेल का अभाव

पूरी लड़ाई के दौरान पाकिस्तानी सेना के तीनों अंगों के बीच कोई सामंजस्य नहीं था.

हालात यहाँ तक थे कि नौसेना अध्यक्ष तक को पाकिस्तानी हमले के बारे में कोई सूचना नहीं दी गई थी. उन्हें ये ख़बर रेडियो से मिली. भारतीय जल सीमा में तैनात की गई पनडुब्बियों को भी युद्ध की ख़बर रेडियो से मिली.

पूर्वी कमान में जनरल नियाज़ी को लड़ाई शुरू होने की सूचना बीबीसी के प्रसारण से मिली. (क्रॉस्ड सॉर्ड्स पाकिस्तान इट्स आर्मी एंड द वॉर पृष्ठ 295)

पाकिस्तानी नौसेना के प्रमुख ने भी एक इंटरव्यू में आरोप लगाया कि जब भारत ने पाकिस्तानी पोतों पर हमला किया तो बार-बार अनुरोध किए जाने के बावजूद उन्हें एयर कवर नहीं प्रदान किया गया.

गौहर अयूब ख़ाँ ने अपनी किताब 'ग्लिम्सेज़ इनटू द कॉरिडोर्स ऑफ़ पावर' में बांग्लादेश की लड़ाई से पहले एक हवाई यात्रा के दौरान चीफ़ ऑफ़ जनरल स्टाफ़ जनरल गुल हसन के साथ अपनी मुलाकात का ज़िक्र करते हुए लिखा, "जनरल गुल ने मुझे बताया कि पूर्वी पाकिस्तान में सिर्फ़ एक चमत्कार ही हमें बचा सकता है. मैंने उनसे पूछा कि क्या आपने चीफ़ को ये बात बताई है?"

"गुल ने अपनी आँखें बंद कर कहा, 'गौहर मुझे उनसे तीन तीन महीने तक मिलने का मौका नहीं मिलता. मैंने कहा, 'आप मज़ाक कर रहे हैं.' गुल का जवाब था, 'मुझ पर यकीन करो मुझे उनसे मिलने तक के लिए एक तरह की जंग करनी पड़ती है.' मैंने कहा तब तो ईश्वर ही हमारी रक्षा कर सकता है. हम बर्बादी की तरफ़ बढ़ रहे हैं और वो भी अपनी आँखे खुली रख कर."

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याह्या का राष्ट्र के नाम संदेश

ढाका में पाकिस्तानी सेना के हथियार डालने की ख़बर सुनते ही याह्या ख़ाँ ने शाम 7 बजकर 15 मिनट पर रेडियो और टेलीविज़न पर देश को संबोधित किया. अपने संदेश में उन्होने कहा, "ये एक अस्थाई नाकामयाबी है. हम पश्चिमी सेक्टर में लड़ाई जारी रखेंगे."

अपना संदेश रिकॉर्ड करने से पहले उन्होंने उसे अपने विदेश सचिव सुल्तान ख़ाँ के पास टिप्पणी के लिए भेजा.

सुल्तान ख़ाँ ने लिखा, "पूर्वी पाकिस्तान में हमारी सैनिक क्षमता जानने के बावजूद मुझे देख कर आश्चर्य हुआ कि राष्ट्रपति अब भी चर्चिल की तर्ज़ पर छतों, समुद्र तटों और सड़कों पर दुश्मन से लड़ाई की बात कर रहे थे. मेरे कहने पर उन्होंने ये सब अंश अपने भाषण से निकाल दिए लेकिन उन्होंने मेरे इस सुझाव को नहीं माना कि उन्हें ये संदेश रद्द कर देना चाहिए."

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अरशद समी ख़ाँ लिखते हैं, "हम सब के लिए ये बहुत दुख का मौका था. हम अपने आँसू नहीं रोक पाए. मैं अंधविश्वासी नहीं हूँ लेकिन मुझे रह रह कर 3 दिसंबर का वो दृश्य याद आता रहा जब राष्ट्रपति भवन से निकलते समय एक गिद्ध ने हमारा रास्ता रोक लिया था मानो हमसे कह रहा हो कि इस लड़ाई पर जाना फ़िज़ूल है और इसका परिणाम हमारे पक्ष में नहीं जाएगा."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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