ट्रंप की ग्रीनलैंड को लेकर तनातनी कैसे भारत को पहुंचा सकती है फ़ायदा
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की यूरोपीय देशों पर नए टैरिफ़ लगाने की धमकी का असर भारत पर भी हो सकता है.
विशेषज्ञों ने चेताया है कि ट्रंप जिस तरह से टैरिफ़ को 'हथियार' के तौर पर पेश कर रहे हैं उसके असर से भारत भी अछूता नहीं है.
कुछ एक्सपर्ट्स का ये भी कहना है कि जब अमेरिका अपने सहयोगियों पर टैरिफ़ लगा सकता है तो ट्रेड डील को लेकर भारत भी उस पर 'भरोसा' नहीं कर सकता.
डोनाल्ड ट्रंप ने 17 जनवरी को कहा था कि ग्रीनलैंड को लेकर अगर डेनमार्क, फ़िनलैंड, फ़्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड्स, नॉर्वे, स्वीडन और ब्रिटेन उनके प्रस्तावित क़दम का विरोध करते हैं, तो वह फ़रवरी में इन आठ अमेरिकी सहयोगी देशों पर नए टैरिफ़ लगाएंगे.
ट्रंप ने एलान किया है कि इन देशों पर एक फ़रवरी से 10 प्रतिशत टैरिफ़ लागू होगा, जो बाद में बढ़कर 25 प्रतिशत हो सकता है और तब तक जारी रहेगा जबतक किसी समझौते पर नहीं पहुंचा जाता.
दरअसल ट्रंप ग्रीनलैंड पर अमेरिका का कब्ज़ा चाहते हैं. उनका कहना है कि डेनमार्क का यह अर्द्ध स्वायत्त क्षेत्र (सेमी ऑटोनॉमस एरिया) अमेरिका की सुरक्षा के लिए बेहद अहम है और इसे लेने के लिए उन्होंने बल प्रयोग की संभावना से भी इनकार नहीं किया है.
ग्रीनलैंड डेनमार्क का क्षेत्र है और ये आठ यूरोपीय देश ट्रंप की इसी योजना का विरोध कर रहे हैं.
ट्रंप ने कहा कि ये टैरिफ़ तब तक लागू रहेंगे, "जब तक ग्रीनलैंड की पूरी और अंतिम ख़रीद का समझौता नहीं हो जाता."
ट्रंप ने तर्क दिया कि अमेरिका अगर ग्रीनलैंड पर कब्ज़ा नहीं करता है तो चीन और रूस के इस पर नियंत्रण करने का ख़तरा बढ़ जाएगा.
भारत के लिए मौक़ा
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ट्रंप के इस एलान के बाद से दुनिया भर के बाज़ारों में अनिश्चितता का माहौल है. कहा जा रहा है कि इससे निवेशक सोना और चांदी जैसे सुरक्षित विकल्पों की ओर बढ़ सकते हैं, वहीं भारत समेत शेयर बाज़ारों में अल्पकालिक उतार-चढ़ाव का जोखिम भी बढ़ सकता है. हालांकि लंबे समय में ये भारत के लिए मौक़ा भी साबित हो सकता है.
इकॉनॉमिक टाइम्स ने एलकेपी सिक्योरिटीज़ में कमोडिटी और करेंसी के वीपी रिसर्च एनालिस्ट जतिन त्रिवेदी के हवाले से कहा, ""सोना फ्लैट से पॉज़िटिव दायरे में ट्रेड कर रहा है. एमसीएक्स पर यह करीब 1,43,150 रुपये और कॉमेक्स पर लगभग 4,605 डॉलर पर बना हुआ है, क्योंकि कीमतें आराम से 4,600 डॉलर के स्तर से ऊपर बनी हुई हैं."
भारतीय शेयर बाज़ार के लिए असर मिला-जुला हो सकता है. बाज़ार विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ट्रंप की टैरिफ़ धमकियों के कारण भविष्य में अमेरिका और यूरोप के बीच ट्रेड वॉर जैसी स्थिति बनती है तो वो भारत के लिए फ़ायदेमंद साबित हो सकती है.
भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफ़टीए) को लेकर लंबे समय से बातचीत रुकी हुई है. विश्लेषकों के मुताबिक ट्रंप और यूरोप के बीच इस टकराव के कारण व्यापार को लेकर भारत और यूरोप क़रीब आ सकते हैं और एफ़टीए को लेकर बातचीत में तेज़ी आ सकती है.
और इससे भारत के फार्मा, टेक्सटाइल, रत्न और आभूषण, स्टील, ऑटोमोबाइल, सोलर उपकरण और लेदर जैसे क्षेत्रों में तेजी आ सकती है.
पिछले साल जुलाई में भारत और ब्रिटेन के बीच छह अरब पाउंड की फ़्री ट्रेड डील हुई थी.
इस समझौते के तहत दोनों ही देशों को फ़ायदा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है.
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि भारत को व्यापार के मद्देनज़र अमेरिका पर निर्भरता कम करके नए पार्टनर तलाश करने होंगे और ऐसे में यूरोप से व्यापार बढ़ाना दोनों ही पक्षों के लिए फ़ायदे का सौदा साबित हो सकता है.
भारत के लिए सबक
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ट्रंप ने रूसी तेल की ख़रीद का हवाला देकर भारत पर भारी भरकम टैरिफ़ लगा दिए हैं.
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनीशिएटव (जीटीआरआई) के अजय श्रीवास्तव के मुताबिक़ भारत पहले ही अमेरिकी दबाव के कारण कई ऐसे क़दम उठा चुका है जो उसके लिए महंगे साबित हो रहे हैं.
भारत ने रूस से तेल आयात में काफ़ी कटौती कर दी. चीन, ईरान और दक्षिण अफ़्रीका के साथ ब्रिक्स नौसेनिक अभ्यास से पीछे हट गया और ईरान और वेनेज़ुएला से तेल ख़रीद रोक दी.
साथ ही अमेरिका के अतिरिक्त टैरिफ़ की घोषणा के बाद से भारत के चाबहार पोर्ट से बाहर होने की ख़बरें भी ज़ोर पकड़ने लगी हैं.
इन ख़बरों और अटकलों को देखते हुए भारत सरकार ने बीते शुक्रवार को जवाब दिया है.
भारत सरकार का कहना है कि चाबहार के संचालन को जारी रखने के लिए वह अमेरिका के अलावा ईरान के साथ भी संपर्क बनाए हुए है.
अजय श्रीवास्तव कहते हैं कि इसके बावजूद भारत पर अमेरिका का दबाव व्यापार वार्ताओं और सार्वजनिक मंचों पर लगातार बना हुआ है.
वो कहते हैं कि ग्रीनलैंड प्रकरण भारत को एक साफ़ सबक देता है कि अमेरिका के साथ ट्रेड डील होने के बावजूद भविष्य में वो कोई दबाव नहीं डालेगा इस बात की कोई गारंटी नहीं है.
वो कहते हैं कि इसी बात को ध्यान में रखते हुए भारत को व्यापार के मद्देनज़र अमेरिका को एक तरफ़ा छूट नहीं देनी चाहिए.
क्या अमेरिकी दबाव में फ़ैसले कर रहा है भारत?
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सामरिक मामलों के विशेषज्ञ डॉ ब्रह्मा चेलानी ने सोशल मीडिया प्लैटफ़ॉर्म एक्स पर लिखा है, '' 2019 में जब अमेरिका ने ईरान के तेल पर प्रतिबंध लगाए, तो भारत ने अचानक ईरान से तेल ख़रीदना बंद कर दिया. इससे भारत और ईरान के बीच चला आ रहा ऊर्जा संबंध लगभग ख़त्म हो गया और इसका सीधा फ़ायदा चीन को मिला.''
चेलानी कहते हैं, ''आज चीन लगभग अकेला देश है जो ईरान का कच्चा तेल ख़रीद रहा है और वह भी दुनिया के सबसे सस्ते दामों पर. हैरानी की बात यह है कि अमेरिका ने इन प्रतिबंधों का खुला उल्लंघन करने के बावजूद चीन पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की.''
चेलानी कहते हैं, ''अब जैसे ही चाबहार बंदरगाह से जुड़ी अमेरिकी प्रतिबंध-छूट अप्रैल में ख़त्म होने वाली है, भारत उस बंदरगाह से पीछे हट रहा है, जिसे वह ख़ुद संचालित करता था. यह बंदरगाह पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट, जिसे चीन चला रहा है, उसके मुक़ाबले भारत का एक रणनीतिक जवाब माना जाता है. ''
चेलानी भारत के इस कथित तौर पर पीछे हटने वाले क़दम को चौंकाने वाला बताते हैं.
वह लिखते हैं, '' यह इसलिए भी चौंकाने वाला है क्योंकि मई 2024 में भारत और ईरान ने चाबहार के शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल को लेकर 10 साल का समझौता किया था. इस समझौते के तहत भारत को वहां के कार्गो और कंटेनर टर्मिनल को विकसित करने, उपकरण लगाने और संचालन का अधिकार मिला था, जिसे आगे बढ़ाने का विकल्प भी था.''
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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