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'संविधान भेदभाव की इजाज़त नहीं देता तो मेरे साथ क्यों हुआ भेदभाव', आंगनवाड़ी में काम करने वाली दलित महिला के बहिष्कार का क्या है मामला
- Author, राखी घोष
- पदनाम, भुवनेश्वर से बीबीसी हिंदी के लिए
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
ओडिशा के केंद्रपाड़ा ज़िले में एक दलित आंगनवाड़ी सहायिका की नियुक्ति को लेकर चल रहा विवाद राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आने के बाद प्रशासन को हस्तक्षेप करना पड़ा है.
करीब तीन महीनों के बाद 16 फरवरी यानी सोमवार आंगनवाड़ी केंद्र में 12 बच्चे शामिल हुए और इन्होंने दलित आंगनवाड़ी सहायिका के हाथों से बना खाना खाया.
दरअसल पिछले तीन महीनों से दलित सहायिका की नियुक्ति के विरोध में बच्चों को अभिभावक आंगनवाड़ी केंद्र नहीं भेज रहे थे.
14 फ़रवरी को गांव में स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों और ओडिशा बाल संरक्षण अधिकार आयोग, ओडिशा महिला आयोग की सदस्यों के दख़ल के बाद अभिभावकों ने आंगनवाड़ी केंद्र भेजने को लेकर शपथ पत्र दिया था. हालांकि सोमवार को भी आठ परिवारों ने बच्चे नहीं भेजे.
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दरअसल ओडिशा के केंद्रपाड़ा ज़िले के राजनगर ब्लॉक घडियामाल ग्राम पंचायत के गांव नुआगांव में एक दलित सहायिका शर्मिष्ठा सेठी की नियुक्ति के विरोध में गांव के लोग अपने बच्चों को आंगनवाड़ी सेंटर नहीं भेज रहे थे.
इस गांव के अधिकांश लोगों का कहना था कि सहायिका एक दलित परिवार से है और उनके हाथों का पका खाना बच्चे नहीं खाएंगे.
हालांकि आंगनवाड़ी सहायिका के साथ जातिगत भेदभाव के मुद्दे पर हर तरफ़ चुप्पी दिखाई देती है, ग्राम प्रधान और वार्ड सदस्य ने इस मामले में कुछ भी प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया.
वहीं दलित परिवार के सदस्य भी इस मामले में कुछ बोलना नहीं चाहते. केंद्र की आंगनवाड़ी वर्कर भी इस मुद्दे पर कुछ भी बात करने से इनकार करती हैं.
क्या है मामला
इस गांव में लगभग 70 परिवार रहते हैं. इनमें केवल सात परिवार दलितों के हैं.
दरअसल नौगांव में पहले एक मिनी आंगनवाड़ी केंद्र था. जिसको आंगनवाड़ी वर्कर लिज़ारानी पांडब अपने घर से चला रही थीं.
2023 में इस आंगनवाड़ी केंद्र को अपग्रेड करके मेन सेंटर में तब्दील किया गया था और इसे स्थानीय स्कूल परिसर में स्थानांतरित किया गया. इसके बाद राज्य सरकार की ओर से आंगनवाड़ी में सहायिका की पोस्ट विज्ञापित की गई.
केंद्रपाड़ा की बाल विकास योजना अधिकारी (सीडीपीओ) दीपाली मिश्रा बताती हैं, "पहली बार जब विज्ञापन निकला तो एक भी आवेदन नहीं मिला था. 2025 में हमलोगों ने फिर से विज्ञापन दिया. इस बार एक ही उम्मीदवार का आवेदन आया और वो शर्मिष्ठा सेठी थीं. उनकी योग्यता और सर्टिफिकेट वेरिफ़िकेशन के बाद उन्हें नौकरी मिली."
20 नवंबर, 2025 में शर्मिष्ठा सेठी ने नौकरी की शुरुआत की. लेकिन उनकी ज्वाइनिंग से पहले ही उनकी जाति के आधार पर उनका विरोध शुरू हो गया था.
नियुक्ति से पहले ही सीडीपीओ दीपाली मिश्रा के दफ़्तर में पहुंचकर गांव के लोगों ने आंगनवाड़ी केंद्र में दलित सहायिका की नियुक्ति का विरोध किया था.
दीपाली मिश्रा ने कहा, "वेरिफ़िकेशन के लिए जब हमने गांव की पंचायत से संपर्क किया था, तब किसी ने विरोध नहीं किया था. लेकिन बाद में लोग दफ़्तर आकर कहने लगे कि दलित की नियुक्ति को रद्द कीजिए. लोगों को समझाने की कोशिश की गई कि क़ानूनी तौर पर ये संभव नहीं है."
इस्तीफ़ा देने का दबाव
गांव वालों ने शर्मिष्ठा और उसके परिवार पर भी दबाव बनाया कि वे इस्तीफ़ा दे दें. लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति को देखते हुए उनके लिए इस्तीफ़ा देना संभव नहीं था.
उनके पिता एक मामूली किसान हैं और मुश्किल से उनका घर ख़र्च चलता है. परिवार में शर्मिष्ठा की दादी, माता-पिता के अलावा दो छोटे भाई बहन भी हैं.
परिवार की आर्थिक मुश्किलों के बीच 20 साल की शर्मिष्ठा सेठी ने इसी साल ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की है. गांव से ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई पूरी करने वाली अपने समुदाय की वह पहली लड़की हैं.
इस नौकरी से उन्हें प्रति माह पांच हज़ार रुपये का वेतन मिलता है और यह रकम उनके परिवार के लिए बड़ा सहारा बन चुका है.
यही वजह है कि बच्चों के नहीं आने के बाद भी शर्मिष्ठा बीते तीन महीनों में प्रतिदिन आंगनवाड़ी केंद्र जाती रही और बच्चों के आने का इंतज़ार करती रहीं.
जब ये मामला सुर्खियों में आया तब जाकर ज़िला प्रशासन ने इस पर सख्ती दिखाई. केंद्रपाड़ा जिले के सब कलेक्टर, बाल विकास योजना पदाधिकारी ने गांव के लोगों को समझाने की कोशिश की.
इसी पहल के तहत 14 फ़रवरी को आंगनवाड़ी केंद्र में शर्मिष्ठा ने खिचड़ी पकाई और ज़िले के सब कलेक्टर अरुण कुमार नायक और सीडीपीओ दीपाली मिश्रा ने गांव के दो बुजुर्गों के साथ खिचड़ी खाई.
इसके बाद गांव वालों ने अपने बच्चों को नियमित तौर पर आंगनवाड़ी केंद्र भेजने की शपथ ली.
मौजूदा समय में केंद्र में 20 बच्चे हैं. इसके बाद सोमवार को 12 बच्चे आंगनवाड़ी केंद्र पहुंचे.
वैसे केंद्र में 42 बच्चों का नाम है, जिसमें 22 नवजात बच्चे शामिल हैं, जिनके माता पिता को केंद्र से राशन मिलता था, लेकिन बीते तीन महीनों से इन लोगों ने भी केंद्र से राशन नहीं लिया.
प्रशासन के दख़ल के बाद माने लोग
ज़िले के सब कलेक्टर अरुण कुमार नायक कहते हैं, "पिछले तीन महीनों से चल रही समस्या अब ख़त्म हुई."
हालांकि वे बताते हैं कि गांव वालों को मनाने के लिए उन्हें सख़्ती दिखाते हुए क़ानूनी कार्रवाई करने की हिदायत भी देनी पड़ी थी."
गांव में व्याप्त जातिभेद को लेकर शर्मिष्ठा कहती हैं, "स्कूल और मंदिर में ऐसे भेदभाव कभी नहीं देखे हैं. पर गांव में कोई पर्व या त्योहार का आयोजन होता है तो जाति के चलते मेरे परिवार वालों को अलग बैठने को बोला जाता है."
शर्मिष्ठा सेठी के लिए ये अनुभव काफ़ी परेशान करने वाला रहा है लेकिन वह कहती हैं, "हमारा संविधान जाति के आधार पर किसी के साथ भेदभाव की इजाज़त नहीं देता है, इसलिए यह किसी के साथ नहीं होना चाहिए."
शर्मिष्ठा यह भी दोहराती हैं कि उनका इरादा आगे पढ़ाई करने का है, क्योंकि उनका मानना है कि शिक्षा से ही समाज में उनकी स्थिति बदल सकती है.
राज्य की प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता बिशाखा भांजा इस पूरे मामले को जातीय संस्कृति से जोड़कर देखती हैं. वो कहती हैं, "यह पूरा मामला विचलित करने वाला है. 21वीं सदी में भी जाति हमारे समाज की सच्चाई है. केंद्रपाड़ा में साक्षरता की दर बेहतर है, लोग संपन्न हैं. लेकिन जाति उनका पीछा नहीं छोड़ पा रही है."
बिशाखा भांजा कहती हैं, "लोग कहते हैं कि जातिगत भेदभाव नहीं होता लेकिन जाति एक सांस्कृतिक मुद्दा बन चुका है और इसकी जड़ें लगातार गहराती जा रही हैं. आने वाले समय में समाज में यह भेदभाव बढ़ने की आशंका ज़्यादा है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.