You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
'तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई घोड़ी पर सवार होने की': पाटन में दलित की बारात पर हमला, गांव के लोगों ने क्या बताया?
- Author, रॉक्सी गागडेकर छारा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पाटन से
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
पाटन ज़िले के चंद्रमाणा गांव में दाख़िल होते ही जोगणी माता मंदिर के पास एक पुलिस कार और चार पुलिस अधिकारी बैठे नज़र आते हैं. ये ठाकोर वास मोहल्ला है.
थोड़ी दूरी पर दलित समुदाय का 'रोहित वास' (मोहल्ला) है, जहां ग्राम रक्षक दल के जवानों का बंदोबस्त दिखाई देता है.
गांव में फ़िलहाल शांति दिख रही है, लेकिन कुछ दिनों पहले स्थिति बिल्कुल अलग थी. तब दलित समाज की बारात पर ठाकोर समुदाय के लोगों ने हमला कर दिया था.
इस घटना के बाद दलित समुदाय के गणपत चावड़ा ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है. शिकायत में कहा गया है कि उनके बेटे की शादी के दौरान ठाकोर समाज के लोगों ने हमला किया.
चावड़ा का दावा है कि गांव में दलित समुदाय के किसी व्यक्ति ने पहली बार घोड़ी पर बैठकर गांव से बारात निकाली थी, इसीलिए उन पर हमला हुआ.
बीबीसी हिन्दी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
'घोड़ी पर बैठने की हिम्मत कैसे की?'
गणपत चावड़ा ने बताया कि एक फरवरी, 2026 की सुबह करीब 10 बजे, उनके बेटे विशाल चावड़ा की बारात डीजे बैंड के साथ रोहित वास से निकलकर जोगणी माता मंदिर के चौक की ओर रवाना हुई थी.
चावड़ा की शिकायत के अनुसार, उस समय 18 साल से कम उम्र के दो लोगों सहित कुल आठ लोगों ने तलवार जैसे धारदार हथियारों से बारात पर हमला कर दिया.
बीबीसी गुजराती से बात करते हुए उन्होंने कहा, "हमारे गांव में पहली बार दलित समुदाय के किसी व्यक्ति की बारात इस तरह घोड़ी पर बैठकर निकली थी. हमने ऐसा किया, इसीलिए हमारी बारात पर हमला किया गया. दूसरा कोई कारण नहीं है."
बीबीसी गुजराती ने इस मामले में ठाकोर समाज के लोगों से बात करने की कोशिश की लेकिन कोई भी बात करने को तैयार नहीं हुआ.
शिकायत में जीवणभाई ठाकोर और दो महिलाओं सहित कुल आठ लोगों के नाम शामिल हैं. बीबीसी गुजराती की टीम जीवणभाई के घर भी गई लेकिन उनके परिवार के सदस्य कुछ भी कहने को तैयार नहीं थे.
गणपत चावड़ा का आरोप है , "उन्होंने जातिसूचक अपशब्द बोले थे और कहा था कि 'तुमने घोड़ी पर बैठकर बारात निकालने की हिम्मत कैसे की'. हम बारात आधे रास्ते से घर वापस ले आए और बाकी की शादी की रस्में बिना घोड़ी के ही पूरा कीं."
बारात में मौजूद रजनीकांत चावड़ा ने बीबीसी गुजराती को बताया, "बारात को दोपहर 12 बजे तक मेहसाणा जिले के वीरता गांव पहुंचना था, लेकिन जिस तरह एक के बाद एक लोगों ने हम पर हमला किया, हम सब बारात छोड़कर अपने घरों की ओर भाग आए. बाद में पुलिस आई और शाम चार बजे शादी संपन्न हुई."
बारात में मौजूद भलाभाई चावड़ा ने कहा, "अगर हम सब दौड़कर अपने घर जल्दी न आए होते, तो हमें अपनी जान गंवानी पड़ती, क्योंकि सामने वाले लोग धारदार हथियारों से हम पर हमला कर रहे थे."
बारात पर हमले के मामले में पुलिस ने क्या कहा?
इस बारे में बीबीसी गुजराती ने जांच अधिकारी और पाटन जिले की डिप्टी एसपी पीजे रेणुका से बात की.
उन्होंने कहा, "इस घटना में दो नाबालिग़ आरोपी हैं, जिनकी हम जांच कर रहे हैं. शिकायतकर्ता की बारात पर हमला होने की बात सच है."
पुलिस का कहना है कि इस हमले का मुख्य कारण पुरानी दुश्मनी भी हो सकती है.
इससे पहले भी शिकायतकर्ता ने इन्हीं लोगों के ख़िलाफ़ ज़मीन के मामले में अनुसूचित जाति, जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत शिकायत दर्ज कराई थी.
उन्होंने आगे कहा, "जांच में हमें यह भी पता चला है कि इससे पहले भी दलित समुदाय के लोगों की बारातें निकली हैं और इस तरह हमले की कोई घटना नहीं हुई है."
गांव की सरपंच रेणुकाबेन ने बीबीसी गुजराती से बात करते हुए कहा, "गांव में दलित समुदाय के लोगों की बारातें निकलती रहती हैं. गांव में सभी लोग एकता से रहते हैं और किसी भी तरह का भेदभाव नहीं किया जाता."
लेकिन गणपत चावड़ा और उनके परिवार का कहना है कि यह पहली बार नहीं है जब गाँव में दलित समुदाय के साथ भेदभाव हुआ हो.
गांव में दलितों के साथ कैसा व्यवहार होता है?
अगर दलित समाज के लोगों की बात मानी जाए, तो उनके साथ गांव के हर प्रसंग और सार्वजनिक कार्यक्रमों में 'भेदभाव' किया जाता है.
गांव की एक दलित छात्रा, काजल चावड़ा ने बीबीसी गुजराती से बात करते हुए कहा, "गांव के किसी भी सार्वजनिक भोज में दलितों के लिए अलग व्यवस्था की जाती है. हमारा भोजन अन्य समाज के लोगों के साथ नहीं होता. अगर हमारा बच्चा ग़लती से वहां जाकर बैठ जाए, तो उसे हाथ पकड़कर बाहर निकाल दिया जाता है."
इसी तरह दलित समुदाय के कमलेश चावड़ा कहते हैं, "हम दलित हैं तो हमारे साथ भेदभाव तो होना ही है. हम अपने गांव में नाई से बाल नहीं कटवा सकते, हम गांव के सार्वजनिक चौक में सबके साथ बैठ नहीं सकते और आज तक हम गांव के एक भी मंदिर में प्रवेश नहीं कर पाए हैं."
इस गाँव में एक 'गौरी मंदिर' है, जो आसपास के लोगों में बहुत प्रसिद्ध है.
कमलेश चावड़ा ने बताया, "आसपास के लोग गांव में इस मंदिर के दर्शन के लिए आते हैं, लेकिन चंद्रमाणा गांव के किसी दलित ने आज तक उस मंदिर में प्रवेश नहीं किया है."
इस घटना के बारे में सोशल मीडिया पर लोगों ने क्या कहा?
इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर लोगों में काफी आक्रोश देखा गया. बीबीसी गुजराती की ग्राउंड रिपोर्ट के वीडियो पर कई प्रतिक्रियाएं आईं.
मनोज ब्रह्मभट्ट ने कहा, "अत्यंत पीड़ादायक है. यह बहुत ही घृणित घटना है."
राजेश परमार कहते हैं, "गांवों में भेदभाव तो हमेशा होता ही है- कहीं ज्यादा, कहीं कम तो कहीं नगण्य. यह इस पर निर्भर करता है कि गांव में शिक्षा का स्तर कितना है और लोग बाहरी दुनिया से कितने जुड़े हुए हैं."
धर्मेंद्रसिंह सोलंकी ने लिखा, "मित्रों, सब एक-दूसरे के साथ शांति से रहें. उसी में भलाई है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.