राजस्थान के एक गांव में मतदान कर लोगों ने बंद करवाई शराब की दुकान- ग्राउंड रिपोर्ट
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- Author, मोहर सिंह मीणा
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, कांसली गांव से लौट कर
राजस्थान के कोटपुतली-बहरोड़ ज़िले के एक गांव में खुले शराब के ठेके को बंद करवाने के लिए मतदान कराया गया.
इसमें लोगों ने ठेके को बंद कराने के पक्ष में मतदान किया. इस पर कदम उठाते हुए प्रशासन ने कहा है कि अगले वित्त वर्ष में गांव में ठेका आवंटित नहीं किया जाएगा.
प्रशासन के इस फैसले से गांव में खुशी की लहर दौड़ गई. लोगों ने अबीर-गुलाल उड़ाकर, नाच-गा कर खुशी मनाई.
यह मामला कोटपुतली-बहरोड़ ज़िले के क़रीब कांसली ग्राम पंचायत का है. इस ग्राम पंचायत में फतेहपुरा कलां और कांसली नाम के गांव आते हैं.
कांसली गांव में सौ साल से ज़्यादा पुरानी कई जर्जर हवेलियां हैं. ये हवेलियां इस गांव की संपन्नता की निशानी हैं. यहां से निकले नामचीन बिजनेसमैन और नौकरीपेशा लोगों ने गांव को पहचान दिलाई है.
शराब के जिस ठेके को बंद कराने के लिए मतदान कराया गया, वह कांसली गांव में है. इसी गांव के सरकारी स्कूल में 26 फ़रवरी को प्रशासन ने शराब की दुकान बंद करवाने के लिए मतदान करवाया.
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शराब की दुकान बंद कराने की पहल
कोटपुतली-बहरोड़ के अतिरिक्त ज़िला कलेक्टर योगेश कुमार डागुर ने बताया, "पंचायत के 3,872 मतदाताओं में से 2,932 मतदाताओं ने मतदान किया. इनमें 2,919 मतदाताओं ने शराब ठेका बंद करवाने के पक्ष और चार ने शराब दुकान बंद नहीं करने के पक्ष में मतदान किया. नौ मत रिजेक्ट कर दिए गए."
अतिरिक्त ज़िला कलेक्टर के मुताबिक, "कांसली ग्राम पंचायत ने जून 2022 में गांव में शराब दुकान बंद कराने के लिए एसडीएम को एक प्रार्थना पत्र दिया."
इस पर आबकारी दुकानों के लिए बने 1975 के एक्ट के तहत तत्कालीन उपखंड अधिकारी ने तहसीलदार, नायब तहसीलदार और बीएलओ की टीम को गांव का सर्वे करने को कहा.
पहले सर्वे में शराब दुकान बंदी के लिए 24 प्रतिशत लोगों ने सहमति जताई.
आबकारी एक्ट 1975 के मुताबिक शराब दुकान बंदी के लिए रजिस्टर्ड वोटर में से पचास फीसदी से ज्यादा वोट दुकान बंदी के पक्ष में होने पर ही दुकान बंद हो सकती है.
इसके बाद एसडीएम ने अपनी सर्वे रिपोर्ट आबकारी आयुक्त को भेजी. आबकारी आयुक्त ने एक्ट के नियम पांच के तहत एसडीएम को निर्देशित किया कि आप फिर सर्वे करवाकर वोटिंग की प्रक्रिया शुरू करें, लेकिन राजस्थान विधानसभा चुनाव की आचार संहिता लगने के कारण मतदान नहीं हो सका.
अतिरिक्त ज़िला कलेक्टर ने बताया कि 26 फरवरी को मतदान के लिए तीन मतदान दल बनाए गए.
इसके लिए बानसूर, बहरोड़ और कोटपूतली के तहसीलदारों की ड्यूटी लगाई. कांसली में 75 फीसदी मतदान शराब दुकान बंद कराने के पक्ष में हुआ. इसमें महिलाओं का विशेष योगदान रहा.
मतदान के बाद प्रशासन ने अपनी रिपोर्ट आबकारी आयुक्त को भेज दी. आबकारी आयुक्त ने 29 फ़रवरी को आदेश जारी कर दिए.
इसमें कहा गया है कि आगामी वित्त वर्ष से कांसली में शराब की दुकान हमेशा के लिए बंद हो जाएगी.
आबकारी आयुक्त अंशदीप ने बीबीसी से कहा, "शराब ठेका बंद करने के पक्ष में हुए मतदान की रिपोर्ट मिली है. आगामी वित्त वर्ष (एक अप्रैल) से कांसली ग्राम पंचायत में शराब ठेका आवंटित नहीं किया जाएगा, हमने 29 फरवरी को आदेश जारी कर दिए हैं."
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छह साल से शराब की दुकान को हटाने का प्रयास
शराब की दुकान को बंद कराने के लिए कांसली में पिछले छह साल प्रयास किए जा रहे थे.
तत्कालीन सरपंच विकास नाइक कहते हैं, "साल 2016 में शराब ठेके के बाहर लोगों ने धरना दिया, भूख हड़ताल की और लिखित में शिकायतें की. यह जीत लंबी लड़ाई का परिणाम है."
फतेहपुरा कलां गांव निवासी एक सरकारी शिक्षक सुभाष चंद यादव कहते हैं कि हमारी पंचायत में बीते पांच साल से प्रयास चल रहा था, धरना-प्रदर्शन भी किया गया.
वो कहते हैं कि अब ग्रामीणों में अपार खुशी है. उन्होंने बताया कि ठेके पर पूरी रात शराब मिलती थी. गांव में ही शराब मिलने से लोग शराब के आदी हो गए थे.
वहीं थाना प्रभारी राजेश शर्मा ने बताया कि ठेका अलॉट होने के बाद से विरोध हो रहा था.
उन्होंने बताया कि किसी ने अपनी दुकान दे दी. उसके बाद से ही शराब की दुकान का विरोध जारी था.
शराब की दुकान के मालिक विक्रम गुर्जर कहते हैं, "कांसली में कई साल से शराब दुकान हटाने के लिए आवाज़ उठ रही थी. दो साल पहले इस दुकान को कोई नहीं उठा रहा था. तब आबकारी विभाग ने यह शराब दुकान मुझे आवंटित कर दी."
वो कहते हैं, "गांव वालों ने अच्छा फैसला किया है. मैं गांव वालों को धन्यवाद देता हूं. यदि आसपास भी इस तरह किसी गांव में आवाज़ उठती है तो कांसली गांव की मिसाल दी जाएगी."
उन्होंने कहा, "मैं शराब का कारोबार जरूर करता हूं लेकिन सभी को सलाह देता हूं कि किसी भी तरह का नशा न करें.''
इस गांव के एक युवक शैलेंद्र जोशी से जब पूछा कि सरकारी शराब ठेका बंद होने के बाद अगर अवैध शराब का चलन शुरू हुआ तो क्या करेंगे.
इस सवाल पर उन्होंने कहा, "सभी ग्रामीणों ने शराबबंदी के लिए स्वेच्छा से मतदान किया है तो शराब बिकेगी ही नहीं, लेकिन हम युवा मिलकर इस पर निगरानी रखेंगे. पुलिस-प्रशासन की मदद लेंगे."
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शराब की दुकान के ठीक सामने पंचर की दुकान चलाने वाले राकेश कहते हैं कि एक अप्रैल को गांव में हमेशा के लिए शराब की दुकान बंद हो जाएगी तो गांव में भौमिया जी का भंडारा किया जाएगा.
अनीता कहती हैं कि मतदान के कुछ देर बाद परिणाम बताया गया. परिणाम सुन कर हमारी खुशी का ठिकाना नहीं रहा. पटाखे चलाए गए, डीजे पर गाने बजाए गए और महिला-पुरुष नाचते हुए गांव में घूमे. एक दूसरे को बधाई देते हुए गुलाल उड़ाया गया, मिठाई बांटी गई.
वहीं कांसली निवासी सरोज यादव पेशे से नर्सिंग कर्मी हैं. वो कहती हैं, "अपने जीवन में पहली बार ऐसा माहौल देखा है कि सभी ने अपनी इच्छा से वोट डाले हैं, वोटिंग के दौरान खुशी मनाते हुए नाचते गाते हुए स्वेच्छा से मतदान केंद्र तक पहुंचे."
गांव के माहौल की चर्चा करते हुए वो कहती हैं, "गांव में बहुत माहौल ख़राब हो गया था. बच्चियां घरों से निकलने में डरने लगीं थीं. गांव से बाहर निकलना मुश्किल हो गया था.''
अनीता शर्मा आशा सहयोगिनी हैं. वो बताती हैं, "महिलाएं अपना दुख बताते हुए रोने लगती हैं. घर के मर्द पैसे कमाते हैं तो सारे शराब में उड़ा देते हैं. घर में महिलाएं और बच्चे परेशान हैं, बच्चों की पढ़ाई और घर खर्च के लिए महिलाएं मोहताज रहती हैं."
गांव में भौमियां जी के मंदिर के नज़दीक एक घर है. इस घर ने अपने एक तीस साल के सदस्य को खो दिया है.
परिवार के मुताबिक़ शराब की लत के कारण शख्स की दो साल पहले मौत हो गई. उनके दो बच्चे और पत्नी है.
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दो स्कूलों के बीच में है ठेका
कांसली में शराब की दुकान सरकारी स्कूल से आगे जाते ही बस स्टैंड के पास बाईं ओर है. दुकान से कुछ आगे जाकर मोहनपुरा ग्राम पंचायत का बारहवीं कक्षा तक का सरकारी स्कूल है.
सरकारी स्कूल के प्रिंसिपल अशोक कुमार बताते हैं, "हमने शराबबंदी के लिए ज्ञापन दिया था. गांव वाले भी आए थे तब भी हमने लिख कर दिया था."
वो बताते हैं, "स्कूल में अधिकतर बच्चे कांसली से ही आते हैं. हमारे स्कूल से सौ मीटर पर शराब का ठेका है. स्टूडेंट जब आते-जाते हैं तो एक शिक्षक बाहर खड़ा हो कर निगरानी करता है, ताकि बच्चों को कोई तंग न करे."
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राजस्थान में शराबबंदी की मांग
ड्राई स्टेट गुजरात से सटे राजस्थान में भी लगातार शराबबंदी की माँग उठती रही है. शराबबंदी को लेकर प्रदेश भर में आंदोलन और प्रदर्शन भी हुए हैं.
राज्य में मतदान के ज़रिए राजसमंद ज़िले के भीम तहसील की काछबली ग्राम पंचायत में प्रदेश का पहला शराब ठेका बंद करवाया गया था.
इसके बाद राजसमंद में ही दूसरा शराब ठेका भी मतदान के ज़रिए बंद हुआ. प्रदेश में अब तक करीब छह ग्राम पंचायतों में शराबबंदी है.
साल 2019 में तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने शराबबंदी का मन बनाया था. उनके निर्देश पर तत्कालीन अतिरिक्त आबकारी आयुक्त छोगा राम देवासी के नेतृत्व में पांच सदस्यीय समिति ने 11 से 16 दिसंबर तक बिहार का दौरा कर शराबबंदी के पक्ष में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी, लेकिन कोरोना महामारी के कारण यह बात आगे नहीं बढ़ पाई.
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शराबबंदी के बाद किस बात का है डर
राजसमंद ज़िले के तत्कालीन ज़िला आबकारी अधिकारी रियाज़ुद्दीन उस्मानी ने बीबीसी को बताया, "इस कानून की मूल भावना के अनुरूप परिणाम नहीं आए हैं.
"ऑन रिकॉर्ड यदि देखा जाए तो जिन ग्राम पंचायतों में मतदान से शराब दुकानें बंद की गई हैं, वहाँ अवैध रूप से अन्य राज्यों की शराब बिकते हुए पाई गई हैं."
वो कहते हैं, "शराब की दुकानें बंद होने से पहले जितनी अवैध शराब उन इलाकों में पकड़ी जाती थी, शराब दुकान बंद होने के बाद और ज़्यादा अवैध शराब उन क्षेत्रों में पकड़ी गई है."
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