भुला दी गई इन तस्वीरों में दिखी वे महिलाएं जिन्होंने आज़ादी की लड़ाई में दिखाया दमखम

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इमेज कैप्शन, अस्थायी राष्ट्रीय ध्वज पकड़े हुए जुलूस का नेतृत्व करती महिलाएं
    • Author, दिनयार पटेल
    • पदनाम, इतिहासकार
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

भारत में हाल ही में कुछ पुरानी तस्वीरें मिली हैं, जो लोगों का ध्यान खींच रही हैं.

ये तस्वीरें साल 1930-31 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में हुए सविनय अवज्ञा आंदोलन में महिलाओं की भूमिका के बारे में बताती हैं. यह आंदोलन भारत में अंग्रेज़ी राज के ख़िलाफ़ हुए सबसे बड़े आंदोलनों में से एक था.

ये तस्वीरें न केवल महिलाओं की भागीदारी के बारे में बताती हैं बल्कि यह इस बात का भी स्पष्ट सबूत हैं कि कैसे राजनीतिक मामलों में भी उनका दखल था और उन्होंने इस क्षेत्र में भी अपना दबदबा बनाया.

कई बार तो महिलाएं ऐसे मामलों में पुरुषों से काफ़ी आगे रहीं.

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अप्रैल 1930 में गांधी ने ऐतिहासिक नमक यात्रा पूरी की थी.

उन्होंने नमक क़ानून तोड़कर ब्रिटिश शासन की नीतियों को चुनौती दी थी. समुद्र से एक मुट्ठी नमक उठाते हुए गांधी ने कहा था कि वह "ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला रहे हैं".

जब महिलाओं ने गांधी को मनाया

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इमेज कैप्शन, बंबई के चौपाटी बीच पर अवैध नमक बनाने के लिए तैयार एकत्र महिलाएं

इसके बाद गांधी ने नागरिक अवज्ञा आंदोलनों की कई धाराओं का नेतृत्व किया. उन्होंने कांग्रेस समर्थकों को अवैध रूप से नमक बनाने, विदेशी सामान का बहिष्कार करने और लोगों से लाठी चलाने वाली पुलिस का सामना करने को कहा.

इससे कुछ महीने पहले ही कांग्रेस ने 'पूर्ण स्वराज' को अपना राजनीतिक लक्ष्य घोषित किया था.

इतिहासकार नागरिक अवज्ञा आंदोलन को भारतीय राजनीति का अहम मोड़ मानते हैं. इसकी दो वजहें हैं. पहला कि इस आंदोलन के पहले चरण में बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल हुई थीं.

नमक यात्रा शुरू करते समय गांधी ने महिलाओं को शामिल होने से मना किया था, लेकिन कई महिला नेताओं ने महात्मा गांधी को इस बात के लिए मना लिया कि महिलाओं को बड़ी भूमिका दी जाए.

दूसरा, कांग्रेस नेताओं ने रेडियो, फ़िल्म और फोटोग्राफ़ी जैसे आधुनिक तरीकों का इस्तेमाल किया, जिससे यह संघर्ष अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोगों तक पहुंच सके.

नीलामी में सामने आया एल्बम

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इमेज कैप्शन, मुंबई में महिलाओं के नेतृत्व में हाथ से कताई को बढ़ावा देने के लिए एक जुलूस निकाला गया, जिसमें प्रतिभागी तकली लेकर चल रही थीं, जो घर में बुनी खादी के प्रति गांधीजी की प्रतिबद्धता का सम्मान करती हैं
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करीब 20 साल पहले, आज़ादी के आंदोलन की तस्वीरों का एक एल्बम लंदन की एक नीलामी में सामने आया था.

मुंबई (पूर्व में बॉम्बे) के एक प्राचीन वस्तुओं के व्यापारी (एन्टक्वेरियन) से सूचना मिलने पर, दिल्ली स्थित कला संग्रह 'अल्काज़ी फाउंडेशन' ने उस एल्बम को ले लिया.

कोयले की तरह धूसर रंग के कवर वाले इस एल्बम को देखकर इसके बारे में ज़्यादा पता नहीं लग पा रहा था. इसके किनारे पर लिखा था: "कलेक्शन्स ऑफ़ फ़ोटोग्राफ़्स ऑफ़ ओल्ड कांग्रेस पार्टी - केएल नर्सी."

लेकिन केएल नर्सी के बारे में किसी को कुछ जानकारी नहीं थी. इसके कैप्शन टाइप किए हुए थे और उनमें कई गलतियां थीं. यह एल्बम 2019 तक अल्काज़ी फ़ाउंडेशन के संग्रह में यूं ही रखा रहा. उसी दौरान क्यूरेटर और ड्यूक यूनिवर्सिटी के दो इतिहासकारों ने इसे दोबारा खंगालना शुरू किया.

उन्होंने इसमें जो कुछ पाया, इससे वो हैरान रह गए.

अज्ञात पृष्ठभूमि के बावजूद, इस एल्बम की तस्वीरें एक जीवंत और विस्तृत कहानी बताती हैं. इन तस्वीरों में बंबई की सड़कों पर तनाव दिखता है, जहां हजारों वॉलंटियर्स कांग्रेस के साथ खड़े दिखते हैं.

पहले की तस्वीरों के विपरीत ये पोज़ देकर खिंचवाई गई तस्वीरें नहीं हैं. इनमें पुलिस से टकराव, घायलों को एंबुलेंस में ले जाना, बारिश के बीच जुलूस और लगातार चली आ रही भीड़ दिखाई देती है. इन ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरों में लोगों का जोश सपष्ट दिखाई देता है.

महिला नेतृत्व की एक अनोखी तस्वीर

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इमेज कैप्शन, तस्वीर में कांग्रेस लीडर लीलावती मुंशी मुंबई में एक बहिष्कृत ब्रिटिश स्टोर के बाहर खड़ी हैं

सबसे ख़ास बात यह है कि इस एल्बम में दिखता है कि महिलाओं ने नागरिक अवज्ञा आंदोलन को अपने सशक्तिकरण के मंच की तरह इस्तेमाल किया.

ड्यूक यूनिवर्सिटी की सुमति रामास्वामी कहती हैं कि तस्वीरों ने उन्हें महिलाओं की सक्रियता की तरफ़ ध्यान दिलाया. उन्होंने अपनी सहयोगी अव्रती भटनागर के साथ मिलकर इस एल्बम का विस्तार से अध्ययन किया.

एक फ़ोटो में गुजरात की कांग्रेस नेता लीलावती मुंशी पुरुषों को नमक की सरकारी खदान पर छापा मारने का निर्देश देती दिखती हैं. एक अन्य तस्वीर में वह एक ब्रिटिश स्टोर के बाहर डटी हुई हैं और ब्रिटिश पुलिस के सामने निडर खड़ी हैं. लीलावती स्लिवलेस ब्लाउज़ और साड़ी जैसे स्टाइलिश कपड़े पहनी हुई हैं.

यह महिला नेतृत्व की एक अनोखी तस्वीर है. गांधी के समर्थन और वामपंथी झुकाव के बाद भी भारत के राष्ट्रीय आंदोलन में पुरुषों का वर्चस्व था.

सन 1920-22 के असहयोग आंदोलन तक महिलाओं की भूमिका काफ़ी सीमित थी. लेकिन बाद में उनका योगदान बहुत बढ़ गया था.

नर्सी के एल्बम में मुंशी जैसी जानी-मानी महिलाओं के अलावा उन महिलाओं की भी तस्वीरें हैं जिनका इतिहास में कहीं जिक्र नहीं है.

नई पीढ़ी भी शामिल

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इमेज कैप्शन, अपने घरों में अवैध रूप से नमक बनाने के लिए मुंबई के समुद्र तट से पानी लेकर जाते महिलाएं और बच्चे

एल्बम की कुछ तस्वीरों में मुंबई (उस वक़्त बॉम्बे) के चौपाटी बीच पर महिलाएं नमक बनाने की तैयारी में इकट्ठा हैं. केवल महिलाओं की भागीदारी से बनी 'देश सेविका' जैसी टुकड़ियां पुलिस से अपने हाथ में मौजूद झंडे को बचाने की कोशिश कर रही हैं.

तस्वीरों में दिखता है कि कई महिलाएं अपनी छोटी बेटियों को भी लेकर आई थीं, जिससे नई पीढ़ी को भी राजनीति में शामिल किया जा सके.

इस एल्बम में जेंडर डायानामिक्स की बिल्कुल विपरीत तस्वीर भी दिखती है.

इसमें हजारों महिलाओं के जुलूस से सड़कें भरी हुई दिखती हैं और पुरुष किनारे खड़े हैं. दूसरी ओर मध्यम वर्गीय परिवार का पुरुष जो कभी कभार ही रसोईघर में दिखता है वह लोगों को नमक बनाने का तरीका समझाते हुए नज़र आ रहा है.

एल्बम में मौजूद बेनाम पुरुष और महिलाएं भारत के इतिहास के इस हिस्से को बेहतर तरीके से समझने में मदद करती हैं.

रामास्वामी कहती हैं कि हम नागरिक अवज्ञा आंदोलन को गांधी से जोड़ते हैं, लेकिन यह एल्बम बताता है कि बंबई के लोगों ने इस आंदोलन को वह स्वरूप दिया, जिसने गांधी को वैश्विक पहचान दिलाई.

हो गईं इतिहास में दर्ज

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इमेज कैप्शन, मुंबई में महिला स्वयंसेवी बल के सदस्यों की ब्रिटिश पुलिस अधिकारियों से झड़प की एक तस्वीर

तस्वीरें दिखाती हैं कि कैसे महिलाएं पुलिस को चुनौती दे रही थीं, बहिष्कार के लिए समर्थन जुटा रही थीं, भीड़ को संबोधित कर रही थीं और गिरफ्तारी दे रही थीं.

अव्रती भटनागर कहती हैं कि इस आंदोलन ने महिलाओं के लिए सार्वजनिक भूमिका निभाने के नए रास्ते खोले.

कई महिलाएं फोटो खिंचाते वक़्त कैमरे की ओर सीधे देखती हैं, यह जानते हुए कि वे इतिहास में दर्ज हो रही हैं. भटनागर कहती हैं कि वे न सिर्फ औपनिवेशिक शासन से बल्कि घरेलू और सार्वजनिक जगहों पर महिला-पुरुष के भेदभाव से भी आज़ादी का दावा कर रही थीं.

नर्सी का एल्बम बॉम्बे के बदलते शहरी रूप का भी प्रमाण है.

औपनिवेशिक इमारतों के बीच खादी पहने वॉलंटियर्स ब्रिटिश पुलिस और सैनिकों से अधिक संख्या में दिखाई देते हैं. वे विक्टोरिया टर्मिनस (अब छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस) और धोबी तालाब फिट्ज़गेराल्ड फाउंटेन पर कब्जा करते हुए नजर आते हैं.

वहीं औपनिवेशिक शासन वर्ली की चॉल, जो कॉटन मिल के कामगारों के रहने के लिए बने थे, उन्हें हिरासत में लिए गए आंदोलनकारियों के लिए अस्थायी जेल में बदल देता है.

सौ साल बाद भी स्पष्ट दिखते हैं संकल्प

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इमेज कैप्शन, महिलाओं के नेतृत्व में एक जुलूस बॉम्बे के एक बाज़ार से गुज़र रहा है

बंबई के इतिहासकार मुरली रंगनाथन कहते हैं, "भले ही बॉम्बे में उस वक़्त तक फ़ोटोग्राफ़ी का इतिहास सौ साल पुराना हो चुका था लेकिन राजनीतिक गतिविधियों को इस तरह कैमरे में पहली बार कैद किया गया था."

अब नर्सी एल्बम की ये तस्वीरें फिर से सार्वजनिक रूप से सामने हैं.

रामास्वामी और भटनागर ने हाल ही में "फ़ोटोग्राफ़िंग सिविल डिसओबेडियंस" नाम की किताब जारी की है.

अक्तूबर महीने में उन्होंने मुंबई और ड्यूक यूनिवर्सिटी में "डिसओबेडिएंट सब्जेक्ट्स" नाम से दो प्रदर्शनियां भी लगाईं.

नागरिक अवज्ञा आंदोलन की महिला वॉलंटियर्स को भले ही देर से सही लेकिन उनकी महत्वपूर्ण भूमिका के लिए अब मान्यता मिल रही है.

क़रीब सौ साल बाद भी उनका दृढ़ निश्चय और संकल्प उतने ही स्पष्ट दिखते हैं, जब वह पहली बार कैमरे में क़ैद हुए थे.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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