मोजतबा ख़ामेनेई कौन हैं जो बने ईरान के नए सुप्रीम लीडर

मोजतबा ख़ामेनेई (बाएं) को असेंबली ऑफ़ एक्सपर्ट ने नए नेता के तौर पर चुन लिया

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    • Author, बीबीसी न्यूज़ फ़ारसी
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आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई के बेटे मोजतबा ख़ामेनेई ईरान के नए सर्वोच्च नेता चुने गए हैं.

असेंबली ऑफ़ एक्सपर्ट्स ने देश के नए नेता के रूप में उन्हें चुन लिया है. यह जानकारी ईरान के सरकारी मीडिया ने दी है.

असेंबली ऑफ़ एक्सपर्ट्स 88 सदस्यीय धार्मिक संस्था है जिसकी ज़िम्मेदारी सुप्रीम लीडर को चुनने की थी.

संस्था के एक बयान को सरकारी टीवी पर एंकर ने पढ़कर सुनाया. बयान में कहा गया:

"युद्ध के बेहद गंभीर हालात और हमारी संस्था के ख़िलाफ़ दुश्मनों की सीधी धमकियों के बावजूद, और असेंबली ऑफ़ एक्सपर्ट्स के सचिवालय के दफ़्तरों पर बमबारी से उसके कई कर्मचारियों और सुरक्षा टीम के सदस्यों के शहीद हो जाने के बावजूद, इस्लामी व्यवस्था के नेतृत्व के चयन और उसकी घोषणा की प्रक्रिया एक पल के लिए भी नहीं रुकी."

इसके बाद एंकर ने नारा लगाया- "अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर, ख़ामेनेई ही रहबर."

अमेरिका इसराइल के हवाई हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई की मौत के बाद, कई लोगों को आशंका थी कि उनके बेटे मोजतबा ख़ामेनेई भी मारे गए हैं.

कई दिनों तक मोजतबा के बारे में कोई ख़बर नहीं आई. लेकिन तीन मार्च को ईरान के सरकारी मीडिया ने बताया कि मोजतबा ज़िंदा हैं और देश के 'महत्वपूर्ण मामलों पर सलाह मशविरा और समीक्षा' में लगे हुए हैं.

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अपने पिता के उलट, मोजतबा ने हमेशा लो प्रोफ़ाइल बनाए रखा है. उन्होंने कभी कोई सरकारी पद नहीं संभाला. न वह सार्वजनिक भाषण देते हैं, न साक्षात्कार, और उनकी बहुत कम तस्वीरें और वीडियो प्रकाशित हुए हैं.

समाचार एजेंसी एपी के अनुसार, 2000 के दशक के अंत में विकीलीक्स के जारी किए अमेरिकी राजनयिक दस्तावेज़ों में उन्हें 'परदे के पीछे की असली ताकत' बताया गया था, जिनको शासन के भीतर एक 'सक्षम और दृढ़ नेता' माना जाता है.

कौन हैं मोजतबा ख़ामेनेई

पिछले दो दशकों से मोजतबा ख़ामेनेई को संभावित अगला नेता माना जाता रहा है
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लेकिन मोजतबा ख़ामेनेई का चयन विवाद पैदा कर सकता है. इस्लामी गणराज्य की स्थापना 1979 में तब हुई थी जब राजशाही को हटाया गया था.

इसकी विचारधारा इस सिद्धांत पर आधारित है कि सर्वोच्च नेता का चुनाव उसकी धार्मिक प्रतिष्ठा और साबित हो चुकी नेतृत्व क्षमता के आधार पर होना चाहिए, न कि वंशानुगत उत्तराधिकार से.

अली ख़ामेनेई ने इस्लामी गणराज्य के भविष्य के नेतृत्व पर केवल सामान्य बातें की थीं.

दो साल पहले, असेंबली ऑफ़ एक्सपर्ट्स के एक सदस्य ने कहा था कि अली ख़ामेनेई, मोजतबा के भविष्य में लीडर बनने के विचार के ख़िलाफ़ थे. लेकिन उन्होंने कभी सार्वजनिक रूप से इस तरह की अटकलों पर टिप्पणी नहीं की.

तो, मोजतबा ख़ामेनेई कौन हैं?

8 सितंबर 1969 को ईरान के उत्तर पूर्वी शहर मशहद में जन्मे मोजतबा, ख़ामेनेई के छह बच्चों में दूसरे स्थान पर हैं. उन्होंने तेहरान के धार्मिक 'अलावी स्कूल' से माध्यमिक शिक्षा ली है.

ईरानी मीडिया के मुताबिक, 17 साल की उम्र में मोजतबा ने ईरान-इराक़ युद्ध के दौरान कुछ छोटे-छोटे अंतरालों में सेना में सेवा दी. इस युद्ध में पश्चिमी देशों ने खुलकर इराक़ का समर्थन किया था. इससे ईरान का अमेरिका और पश्चिमी देशों के प्रति अविश्वास और गहराया था.

1999 में, मोजतबा अपनी धार्मिक पढ़ाई जारी रखने के लिए क़ुम गए. यह एक पवित्र शहर है और शिया धर्मशास्त्र के अध्ययन का प्रमुख केंद्र माना जाता है.

इस समय तक उन्होंने कभी धार्मिक वस्त्र नहीं पहने थे, और यह भी साफ़ नहीं है कि वह 30 साल की उम्र में पढ़ने के लिए मदरसे क्यों गए, क्योंकि आमतौर पर यह पढ़ाई कम उम्र में शुरू की जाती है.

मोजतबा अब भी एक मध्य स्तर के धर्मगुरु हैं, जो उनके सर्वोच्च नेता बनने की राह में एक बाधा बन सकता है.

2024 में तेहरान में हिज़बुल्लाह के ऑफ़िस में एक दौरे के दौरान मोजतबा ख़ामेनेई की यह तस्वीर ली गई थी.

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इमेज कैप्शन, मोजतबा ख़ामेनेई की यह तस्वीर 2024 में तेहरान में हिज़बुल्लाह के ऑफ़िस में ली गई थी

पिछले दिनों ईरान में सत्ता केंद्रों से जुड़े कुछ मीडिया संस्थानों और अधिकारियों ने मोजतबा ख़ामेनेई को 'आयतुल्लाह' कहकर संबोधित करना शुरू किया है. कुछ पर्यवेक्षकों को यह बदलाव उनके धार्मिक कद को ऊँचा दिखाने और उन्हें देश के सर्वोच्च नेतृत्व की दौड़ में एक भरोसेमंद उम्मीदवार के तौर पर पेश करने की कोशिश जैसा लगता है.

मदरसों की व्यवस्था में 'आयतुल्लाह' की पदवी होना और बड़ी धार्मिक कक्षाओं को पढ़ाना किसी व्यक्ति की विद्वत क्षमता और ज्ञान का प्रमाण माना जाता है. ये भविष्य में नेता चुने जाने की आवश्यक शर्तों में से एक है.

लेकिन यह पहली बार नहीं होगा.

1989 में जब अली ख़ामेनेई दूसरे सर्वोच्च नेता बने थे, तब उन्हें भी बहुत जल्दी 'आयतुल्लाह' का दर्जा दे दिया गया था.

राजनीतिक दखलअंदाज़ी के आरोप

ईरान में 2009 के राष्ट्रपति चुनाव के बाद विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए थे. इन्हें 'ग्रीन मूवमेंट' कहा गया था

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मोजतबा का नाम पहली बार 2005 के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान सार्वजनिक रूप से चर्चा में आया, जिसमें कट्टरपंथी नेता महमूद अहमदीनेजाद की जीत हुई थी.

सुधारवादी उम्मीदवार मेहदी कर्रूबी ने ख़ामेनेई को लिखे एक खुले पत्र में आरोप लगाया कि मोजतबा ने चुनाव में दखल देकर आईआरजीसी और बसीज मिलिशिया के कुछ समूहों के ज़रिए हस्तक्षेप किया.

आरोप था कि इन समूहों ने धार्मिक संगठनों में पैसा बांटा ताकि अहमदीनेजाद की जीत सुनिश्चित की जा सके.

चार साल बाद भी मोजतबा पर यही आरोप लगाए गए.

अहमदीनेजाद के फिर से चुने जाने के बाद पूरे देश में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए, जिन्हें 'ग्रीन मूवमेंट' कहा गया. कुछ प्रदर्शनकारियों ने ऐसे नारे भी लगाए जो मोजतबा के अपने पिता के बाद ईरान के सर्वोच्च नेता बनने के विचार के विरोध में थे.

तत्कालीन उप गृह मंत्री मोस्तफ़ा ताजज़ादेह ने चुनाव नतीजों को 'चुनावी तख़्तापलट' कहा था. उन्हें सात साल की जेल हुई, और उन्होंने कहा कि यह 'मोजतबा ख़ामेनेई की सीधी इच्छा' का परिणाम था.

साल 2009 के चुनाव के बाद दो सुधारवादी नेताओं, मीर हुसैन मूसावी और मेहदी कर्रूबी को नज़रबंद रखा गया था. ईरानी सूत्रों ने बीबीसी न्यूज़ फ़ारसी को बताया कि फरवरी 2012 में मोजतबा ने मूसावी से मुलाकात कर उनसे विरोध छोड़ने की अपील की थी.

कई लोगों का मानना है कि मोजतबा अपने पिता की कड़ी नीतियों को जारी रखेंगे.

कुछ लोगों का मानना है कि जिसने अमेरिका-इसराइल के हमलों में अपने माता-पिता और पत्नी को खो दिया हो, उसके पश्चिमी दबाव के आगे झुकने की संभावना कम ही है.

लेकिन उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी, इस्लामी गणराज्य के अस्तित्व को बनाए रखना और जनता को यह विश्वास दिलाना कि वह देश को राजनीतिक और आर्थिक तबाही से बाहर निकालने के लिए उपयुक्त व्यक्ति हैं.

उनका नेतृत्व अभी भी ठीक से परखा नहीं गया है, और यह धारणा कि इस्लामी रिपब्लिक वंशानुगत प्रणाली में बदल रहा है, जनता की असंतुष्टि को और बढ़ा सकती है.

मुजतबा भी अमेरिका और इसराइल के निशाने पर रहेंगे क्योंकि इसराइल के रक्षा मंत्री ने कहा है कि कोई भी उत्तराधिकारी 'स्पष्ट रूप से ख़त्म कर दिए जाने का लक्ष्य' होगा.

(बीबीसी पर्शियन, बीबीसी न्यूज की फ़ारसी भाषा सेवा है. इसका इस्तेमाल दुनिया भर में 2.4 करोड़ लोग करते हैं. इनमें से अधिकांश ईरान में रहते हैं, हालांकि ईरान ने बीबीसी फ़ारसी को ब्लॉक किया हुआ है.)

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