ग़ालिबाफ़ ने बताया ईरान की अमेरिका के साथ बातचीत में कहां फंसा है पेच
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ईरान के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि ईरान ने अभी तक अमेरिका के साथ बातचीत में शामिल होने का कोई फ़ैसला नहीं किया है.
वहीं अमेरिका ने कहा है कि वह इस बातचीत में शामिल होगा. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बताया कि उनका प्रतिनिधिमंडल इस्लामबाद जाएगा.
उधर, पाकिस्तान में वार्ता को लेकर तैयारियां ज़ोरों पर हैं और आयोजन स्थल पर सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है.
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बक़ाई ने तेहरान में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, "अमेरिका ने युद्धविराम की शुरुआत से ही उसका उल्लंघन किया."
इस्माइल बक़ाई ने चेतावनी दी, "ईरान कोई समयसीमा या अल्टीमेटम स्वीकार नहीं करेगा और अगर अमेरिका या इसराइल कोई क़दम उठाते हैं तो ईरान ताक़तवर जवाब देगा."
वहीं ईरानी संसद के अध्यक्ष और ईरान की वार्ता टीम के प्रमुख मोहम्मद बग़र ग़ालिबाफ़ ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका नौसैनिक नाकाबंदी नहीं हटाता है, तो होर्मुज़ स्ट्रेट में यातायात सीमित रहेगा.
ग़ालिबाफ़ ने एक बार फिर लेबनान में युद्धविराम को ईरान-अमेरिका समझौते से जोड़ा और कहा कि 'प्रतिरोध मोर्चा' युद्ध में ईरान की सहायता के लिए आया था और इसलिए युद्धविराम में "उन्हें निश्चित रूप से शामिल किया जाना चाहिए था."
लेबनान में हिज़्बुल्लाह, यमन में हूती विद्रोही और ग़ज़ा में हमास को 'प्रतिरोध की धुरी' कहा जाता है जो ईरान के समर्थक रहे हैं.
यह घटना ऐसे समय में घटी है जब ईरान और अमेरिका के बीच तनाव फिर से बढ़ गया है और होर्मुज़ स्ट्रेट फिर से बंद हो गया है. इससे इसरायल-लेबनान युद्धविराम और भी नाज़ुक लगने लगा है. इस बीच, इसराइली सेना ने घोषणा की है कि युद्धविराम के बाद से उसका दूसरा सैनिक मारा गया है.
डोनाल्ड ट्रंप का हालिया बयान कि "ईरान अमेरिका की सभी मांगों पर सहमत होगा" पर ईरान में कई प्रतिक्रियाएं आईं और बातचीत को लेकर और अमेरिका की मांगों के आगे झुकने या न झुकने को लेकर ईरान के विभिन्न गुटों के बीच मतभेद उजागर हुए.
शनिवार रात, मोहम्मद बग़र ग़ालिबाफ़ ने पहली बार ईरानी टेलीविज़न पर इस्लामाबाद में हुई ईरान-अमेरिका वार्ता और ईरान के रुख़ के बारे में विस्तार से बताया.
ग़ालिबाफ़ के बयान ईरान में कट्टरपंथी ताक़तों द्वारा अमेरिका के साथ बातचीत को लेकर शासन की 'स्पष्टीकरण देने में विफलता' की कड़ी आलोचना के बाद आए हैं.
ग़ालिबाफ़ ने इस टेलीविज़न कार्यक्रम में कहा, "अगर मैं अपने प्रिय लोगों से पहले बात कर पाता तो बेहतर होता, लेकिन दुर्भाग्यवश, मेरी व्यस्त दिनचर्या और काम के दबाव ने मुझे यह अवसर नहीं दिया."
'हम यह जंग जीत रहे हैं'
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ग़ालिबाफ़ ने होर्मुज़ स्ट्रेट में बारूदी सुरंगों को हटाने के लिए अमेरिका के साथ सहयोग करने से इनकार कर दिया और कहा कि ईरान इस स्ट्रेट को नियंत्रित करता है.
उन्होंने कहा, "अमेरिकी कई दिनों से नाकाबंदी की घोषणा कर रहे हैं, यह एक मूर्खतापूर्ण और अज्ञानतापूर्ण निर्णय है. यह संभव नहीं है कि दूसरे होर्मुज़ स्ट्रेट से गुज़र सकें और हम नहीं."
उन्होंने कहा, "अगर अमेरिका नाकाबंदी नहीं हटाता है, तो होर्मुज़ स्ट्रेट में यातायात निश्चित रूप से प्रतिबंधित हो जाएगा."
पाकिस्तान में ईरान के शीर्ष वार्ताकार के मुताबिक़, "तकनीकी क्षेत्र में लगभग 180 ड्रोन को निशाना बनाया गया है." उन्होंने कहा, "पिछली लड़ाई में हमारे पास रक्षा क्षेत्र में ऐसी क्षमता नहीं थी."
उन्होंने यह भी कहा कि "एफ़-35 को निशाना बनाना कोई दुर्घटना नहीं है, यह कई तकनीकी और डिज़ाइन संबंधी पहलुओं से जुड़ा एक ऑपरेशन है. एफ़-35 के पास मिसाइल धमाके ने दुश्मन को समझाया कि हम क्या करने में सक्षम हैं और हम किस दिशा में जा रहे हैं."
आईआरजीसी द्वारा एक वीडियो जारी किया गया था जिसमें एक एफ़-35 विमान का पीछा करते हुए दिखाई दिया जा रहा है. क्षेत्र में अमेरिकी सेंट्रल कमांड के एक प्रवक्ता ने बीबीसी को बताया कि "ईरान के ऊपर एक लड़ाकू मिशन को अंजाम देने के बाद एक अमेरिकी एफ़-35 लड़ाकू विमान को मध्य पूर्व में एक अमेरिकी अड्डे पर आपातकालीन लैंडिंग करने के लिए मजबूर होना पड़ा."
ग़ालिबाफ़ ने अमेरिका और इसराइल की सैन्य श्रेष्ठता को स्वीकार किया, लेकिन कहा कि ईरान ने उनका मुक़ाबला अपने ही तरीके़ से किया. उन्होंने कहा, "हमने एक आड़ा-टेढ़ा युद्ध लड़ा और अपनी योजना और तैयारी के बल पर दुश्मन को खदेड़ दिया."
उन्होंने कहा, "हम यह जंग जीत रहे हैं."
ग़ालिबाफ़ ने आगे कहा, "जब दुश्मन अपने लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाता, तो इसका मतलब है कि वह असफल हो गया है."
ग़ालिबाफ़ के मुताबिक़, अमेरिका और इसराइल के लक्ष्यों में 'ईरान को आत्मसमर्पण कराना', 'सत्ता परिवर्तन करना', 'ईरान की मिसाइल क्षमताओं को नष्ट करना' और 'पश्चिमी और पूर्वी सीमाओं से बाग़ियों को आयात करना' शामिल था.
ईरानी संसद के अध्यक्ष ने कहा कि अमेरिका "ईरान के आत्मसमर्पण की मांग कर रहा था और दो-तीन दिनों की बात कर रहा था", लेकिन 40 दिन के बाद उसने युद्धविराम का आह्वान किया.
'हमारी मांगों को माना, इसलिए युद्धविराम स्वीकार किया'
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ग़ालिबाफ़ की राय में, इस्फ़हान में अमेरिकी सैन्य बलों के साथ जो हुआ वह तबस में हुई घटना से भी बदतर था.
अमेरिका ने घोषणा की कि एक विशाल सैन्य अभियान में उसने दो एफ़-15 लड़ाकू पायलटों को बचा लिया है और अपने कई विमानों को नष्ट कर दिया है जो पर्यावरणीय परिस्थितियों के कारण फिर से उड़ान भरने में असमर्थ थे. लेकिन ईरानी मीडिया ने अभियान के बारे में कुछ अलग विवरण प्रकाशित किए.
ग़ालिबाफ़ ने वार्ताओं को उचित ठहराया और वार्ताओं का विरोध करने वालों की राय के उलट कहा, "मैदान पर हमारा पलड़ा निश्चित रूप से भारी है, और यही कारण है कि ट्रंप युद्धविराम का आह्वान कर रहे हैं."
उन्होंने कहा, "आज हमारे पास क्षेत्र में, सड़क पर और कूटनीति में अधिकार है, और इन तीनों क्षेत्रों के बीच कोई अलगाव नहीं होना चाहिए. इन सभी को एक ही क्षेत्र माना जाता है और ये एक साथ जुड़े हुए हैं."
उन्होंने कहा, "दुश्मन युद्धविराम की मांग कर रहा था और अगर हमने युद्धविराम स्वीकार किया, तो इसका कारण यह था कि उन्होंने हमारी मांगों को स्वीकार कर लिया था."
ग़ालिबाफ़ ने लेबनान में हुए युद्धविराम का भी ज़िक्र किया और कहा, "हिज़्बुल्लाह ने हालिया युद्ध इस्लामी गणराज्य की रक्षा के लिए लड़ा; प्रतिरोध मोर्चा इस्लामी गणराज्य की सहायता के लिए आया, इसलिए युद्धविराम में उन्हें भी शामिल किया जाना चाहिए था, और ईरान की शर्तों में से एक क्षेत्र में युद्धविराम था."
इस्लामाबाद में शुरू हुए युद्धविराम और ईरान-अमेरिका वार्ता की शुरुआत से ही इस बात को लेकर कई विरोधाभासी दावे किए गए कि क्या युद्धविराम में लेबनान शामिल होगा या नहीं. आख़िरकार, लेबनान में युद्धविराम के बिना ही इस्लामाबाद वार्ता शुरू हुई और इसराइल ने लेबनान में हिज़्बुल्लाह के ठिकानों पर अपने हमले जारी रखे.
डोनाल्ड ट्रंप ने छह सप्ताह के संघर्ष के बाद 17 अप्रैल को इसराइल और लेबनान के बीच युद्धविराम की घोषणा की.
14 अप्रैल को वॉशिंगटन में इसराइल और लेबनान के राजदूतों ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की उपस्थिति में एक 'ऐतिहासिक' बातचीत की, जिसके बाद युद्धविराम की घोषणा की गई.
'वो हर बात पर सहमत हो गए हैं'
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28 फ़रवरी को ईरान के साथ शुरू हुए अमेरिका-इसराइल युद्ध के 40 दिनों के बाद, अमेरिका ने 8 अप्रैल को दो सप्ताह के युद्धविराम की घोषणा की.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरानी बुनियादी ढांचे पर हमला करने की कड़ी धमकियों के बाद युद्धविराम हुआ.
ईरान-अमेरिका वार्ता, जो 11 और 12 अप्रैल को इस्लामाबाद में हुई थी, बिना किसी समझौते पर पहुंचे और अमेरिकी उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस के नेतृत्व वाली अमेरिकी टीम के पाकिस्तान से रवाना होने के साथ समाप्त हो गई.
दोनों पक्षों ने वार्ता की विफलता के लिए एक-दूसरे को ज़िम्मेदार ठहराया, लेकिन किसी ने भी वार्ता जारी रखने की संभावना को पूरी तरह से ख़ारिज नहीं किया था. हालांकि, वार्ता के एक और दौर की कोई बात नहीं हुई थी और न ही कोई तारीख़ तय की गई थी.
मोहम्मद बग़र ग़ालिबाफ़ के नेतृत्व में ईरान के एक बड़े दल ने इन वार्ताओं में भाग लिया था. ग़ालिबाफ़ ने कहा कि 'वार्ता के इस दौर में' अमेरिका ईरानी प्रतिनिधिमंडल का विश्वास जीतने में विफल रहा.
जेडी वेंस ने यह भी कहा कि उन्होंने अमेरिका की मांगों को स्पष्ट और संक्षिप्त रूप से सामने रखा है.
ऐसा लगता है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर मूलभूत मतभेदों के साथ-साथ असहमति के अन्य बिंदुओं के कारण वार्ता विफल हो गई.
वार्ता विफल होने के एक दिन बाद, 13 अप्रैल को, अमेरिका ने घोषणा की कि उसने होर्मुज़ स्ट्रेट पर नियंत्रण कर लिया है और ईरान पर नौसैनिक नाकाबंदी लगा दी है, जिससे ईरानी बंदरगाहों से आने-जाने वाले किसी भी जहाज़ को स्ट्रेट से गुज़रने से रोक दिया गया है.
15 अप्रैल को डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ वार्ता के दूसरे दौर की संभावना की घोषणा की.
उसी दिन, पाकिस्तानी सेना और सशस्त्र बलों के कमांडर-इन-चीफ़ फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर एक उच्च स्तरीय राजनीतिक और सुरक्षा प्रतिनिधिमंडल के साथ 'अमेरिकी संदेश देने और वार्ता के दूसरे दौर की योजना बनाने' के लिए तेहरान पहुंचे, और उनका स्वागत ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची ने किया.
डोनाल्ड ट्रंप ने 17 अप्रैल को कहा कि ईरान यूरेनियम संवर्द्धन बंद करने पर सहमत हो गया है. उन्होंने कहा कि ईरान ने अपने समृद्ध यूरेनियम के भंडार को सौंपने पर 'सहमति' जताई है, "वो हर बात पर सहमत हो गए हैं."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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