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'जैसे ही ओबीसी आता है, सिंहासन हिलने लगता है': यूजीसी विवाद पर योगेंद्र यादव का इंटरव्यू
- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
भारत के उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव का सवाल कोई नया नहीं है. लेकिन जनवरी 2026 में यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) के जारी किए गए संशोधित रेगुलेशंस ने इस बहस को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है.
इन नियमों के विरोध में देश के कई हिस्सों में प्रदर्शन हुए, सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं आईं और आख़िरकार सुप्रीम कोर्ट ने इन पर रोक लगाते हुए इस मामले पर सुनवाई पूरी होने तक 2012 के पुराने नियमों को ही लागू रखने का आदेश दिया.
इसी पूरे विवाद को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव कई सवाल उठाते हैं.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा कि ये हैरान करता है कि यूजीसी ने अपने ही बनाए नियमों का अदालत में ज़ोरदार तरीक़े से बचाव नहीं किया.
योगेंद्र यादव उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव और इस मुद्दे को लेकर हो रही राजनीति पर सवाल भी उठाते हैं.
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'नया क़ानून नहीं, पुराने नियमों में संशोधन'
योगेंद्र यादव इस धारणा को सिरे से ख़ारिज करते हैं कि 2026 में कोई बिल्कुल नया और 'अपर कास्ट विरोधी' क़ानून लाया गया है.
उनके मुताबिक़, "यह धारणा पूरी तरह बेबुनियाद है. 2026 के रेगुलेशन कोई नए नियम नहीं हैं, बल्कि 2012 से चले आ रहे नियमों में संशोधन हैं."
वो याद दिलाते हैं कि 2012 में जब यूजीसी ने 'प्रमोशन ऑफ़ इक्विटी इन हायर एजुकेशन' नाम से नियम बनाए थे, तब भी उनमें जाति, धर्म, लिंग, भाषा और विकलांगता के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित किया गया था.
"फर्क़ सिर्फ़ इतना है कि जहां 2012 में एससी-एसटी का स्पष्ट उल्लेख था, वहीं 2026 के संशोधन में ओबीसी को भी शामिल किया गया."
क्या दबाव में बदले गए नियम?
इस विवाद का एक अहम पहलू सुप्रीम कोर्ट की भूमिका है. योगेंद्र यादव के मुताबिक़, "यह सरकार या यूजीसी की अपनी मर्ज़ी से किया गया बदलाव नहीं था. सुप्रीम कोर्ट का दबाव था."
वो बताते हैं कि 2019 में रोहित वेमुला और पायल तड़वी की माताओं ने सुप्रीम कोर्ट का रुख़ किया था. दोनों छात्रों की मौत को जातिगत भेदभाव से जोड़ा गया था. याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए अदालत ने उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव रोकने के लिए ठोस व्यवस्था बनाने को कहा.
योगेंद्र यादव के मुताबिक़, 2025 में जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने स्पष्ट निर्देश दिए कि यूजीसी को अपने रेगुलेशंस में बदलाव करना होगा, लेकिन जब यूजीसी ने ऐसा किया तो वही सुप्रीम कोर्ट इन नियमों पर सवाल उठाता नज़र आया.
योगेंद्र यादव सवाल करते हैं, "जब कोर्ट ने कहा था कि नियम बदलिए, तो फिर बदलने के बाद यह हैरानी क्यों?"
सुप्रीम कोर्ट ने नए नियमों को स्थगित करते हुए दिए अपने आदेश में कहा है कि ये स्पष्ट नहीं हैं और इनसे जातिगत भेदभाव बढ़ सकता है.
इस पूरे मामले में एक और चौंकाने वाली बात यह रही कि यूजीसी ने अपने ही बनाए नियमों का अदालत में ज़ोरदार बचाव नहीं किया.
योगेंद्र यादव कहते हैं, "ऐसा लगा जैसे यूजीसी पहले से ही मन बनाकर आई थी कि अपने आप ही कांटा निकाल दीजिए, हम आंख बंद कर लेंगे."
वो कहते हैं, "यही चुप्पी कई सवाल खड़े करती है. क्या यूजीसी ख़ुद इन नियमों को लेकर असमंजस में थी? या फिर राजनीतिक दबाव इतना था कि खुलकर पक्ष रखने की हिम्मत नहीं हुई?"
सत्ता के भीतर से विरोध?
यूजीसी ने 13 जनवरी को इन नियमों का गजट नोटिफ़िकेशन जारी किया था. उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव ख़त्म करने के उद्देश्य से लाए गए इन नए नियमों के तहत हर उच्च शिक्षा संस्थान में इक्विटी सेंटर (समता केंद्र) स्थापित करने का प्रस्ताव था. इसके अलावा एससी-एसटी, महिला, शारीरिक रूप से कमज़ोर, आर्थिक पिछड़ा वर्ग के अलावा अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्र भी इनके तहत भेदभाव की शिकायत कर सकते थे.
ये नियम सामने आने के बाद देश भर में सामान्य वर्ग से जुड़े लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया. दिल्ली यूनिवर्सिटी में एक प्रदर्शन के दौरान बीबीसी से बात करते हुए कई प्रदर्शनकारियों ने सवाल उठाया था कि सिर्फ़ सामान्य वर्ग को बाहर रखना, ये मान लेने के बराबर है कि सामान्य वर्ग ही शोषण करता है.
हालांकि, योगेंद्र यादव इस विरोध को लेकर भी सवाल उठाते हैं और दावा करते हैं कि सरकार ने ही इन विरोध प्रदर्शनों को प्रायोजित किया था.
योगेंद्र यादव 'मैन्युफ़ैक्चर डिसेंट' का सिद्धांत देते हुए कहते हैं, "पहले 'मैन्युफैक्चर कंसेंट' की बात होती थी, सत्ता अपने पक्ष में सहमति बनाती है. अब नया दौर है, मैन्युफै़क्चर डिसेंट का, जहां सत्ता ख़ुद अपने ख़िलाफ़ विरोध खड़ा करवाती है."
उनके मुताबिक़, यूजीसी नियमों के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतरे ज़्यादातर लोग बीजेपी के कोर समर्थक थे.
वो कहते हैं, "जब मोदी समर्थक ही मोदी सरकार का विरोध करें, तो समझ लीजिए कि मामला सीधा नहीं है."
योगेंद्र यादव मानते हैं कि यूजीसी नियमों को लेकर सरकार एक दुविधा में फंस गई थी. वो कहते हैं, "एक तरफ़ उसका पारंपरिक सवर्ण वोट बैंक और दूसरी तरफ़ ओबीसी में पैठ बनाने की रणनीति. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के स्टे ने सरकार को बिना राजनीतिक नुक़सान उठाए पीछे हटने का रास्ता दे दिया."
प्रदर्शनकारियों का एक बड़ा तर्क यह था कि नए नियम 'नेचुरल जस्टिस' के ख़िलाफ़ हैं और जनरल कैटेगरी को बाहर कर देते हैं.
योगेंद्र यादव इस तर्क को ख़ारिज करते हुए कहते हैं, "अगर आप कहते हैं कि एससी-एसटी-ओबीसी के ख़िलाफ़ भेदभाव हो रहा है, तो इसका मतलब यह नहीं कि बाकी के ख़िलाफ़ नहीं हो सकता."
वो इसकी तुलना दहेज क़ानून से करते हुए कहते हैं, "दहेज क़ानून में औरतों का ज़िक्र है, तो क्या वह मर्दों के ख़िलाफ़ क़ानून हो गया?"
उनका कहना है कि 2012 के नियमों में भी एससी-एसटी का ज़िक्र था, तब कोई बड़ा विरोध नहीं हुआ.
वो कहते हैं, "दिक़्क़त ओबीसी से है. जैसे ही ओबीसी आता है, सिंहासन हिलने लगता है."
2012 के नियम क्या नाकाम रहे?
रोहित वेमुला ने साल 2016 में जातिगत भेदभाव का आरोप लगाते हुए आत्महत्या की थी. पायल तड़वी ने भी साल 2019 में ऐसे ही आरोप लगाते हुए आत्महत्या की. लेकिन उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव करने के लिए दिशानिर्देश साल 2012 में ही लागू हो चुके थे.
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, 2018 से 2023 के बीच भारत के केंद्रीय उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़ने वाले कम से कम 98 छात्रों की आत्महत्या के मामले सामने आए. ये मामले आईआईटी, एनआईटी, केंद्रीय विश्वविद्यालयों, आईआईएम और आईआईएसईआर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से जुड़े हैं.
सरकार के मुताबिक़, आत्महत्या के कारणों में अकादमिक दबाव, सामाजिक अलगाव, मानसिक तनाव और पारिवारिक समस्याएं शामिल हैं.
हालांकि, यह आंकड़े उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक वातावरण और संभावित भेदभाव के सवालों को और गंभीर बनाते हैं.
(आत्महत्या एक गंभीर मनोवैज्ञानिक और सामाजिक समस्या है. अगर आप भी तनाव से गुज़र रहे हैं तो भारत सरकार की जीवनसाथी हेल्पलाइन 18002333330 से मदद ले सकते हैं. आपको अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से भी बात करनी चाहिए.)
तो क्या ये माना जा सकता है कि साल 2012 में भेदभाव ख़त्म करने के मक़सद से लाए गए नियम पूरी तरह कामयाब नहीं रहे?
योगेंद्र यादव कहते हैं, "मैं उस वक़्त यूजीसी का सदस्य था. गर्व से कह सकता हूं कि पहली बार 'डिस्क्रिमिनेशन' शब्द पर रेगुलेशन बने. लेकिन शर्म से कहना पड़ता है कि उन्हें लागू नहीं किया गया."
आंकड़ों का हवाला देते हुए वो बताते हैं कि क़रीब 3000 संस्थानों ने इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेल होने का दावा किया, लेकिन पांच साल में औसतन एक संस्था में एक भी मामला सामने नहीं आया.
योगेंद्र यादव कहते हैं, "याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा- यह मज़ाक है. इसका मतलब है कि आपने नियम लागू ही नहीं किए."
'रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन' का डर कितना जायज़?
नए नियमों के विरोध में एक बड़ा डर 'रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन' का था, यानी झूठी शिकायतों के ज़रिए जनरल कैटेगरी को निशाना बनाए जाने का.
बीबीसी से बात करते हुए कई प्रदर्शनकारियों ने ये आशंका ज़ाहिर की थी कि 2026 के नियम संस्थानों में लागू होने के बाद सामान्य वर्ग के छात्रों को फ़र्ज़ी शिकायतों में फंसाने की आशंका बढ़ सकती है. यही विरोध का मुख्य कारण भी था.
इस आशंका को ख़ारिज करते हुए योगेंद्र यादव कहते हैं, "मैं उनसे सिर्फ़ यही कहता हूं, इस रेगुलेशन को पढ़िए और बताइए, किस अनुच्छेद से यह डर पैदा होता है?"
वो मानते हैं कि हर क़ानून का दुरुपयोग हो सकता है- चाहे वह हत्या का क़ानून हो या धारा 144.
योगेंद्र यादव कहते हैं, "सवाल यह नहीं है कि दुरुपयोग हो सकता है या नहीं, सवाल यह है कि क्या क़ानून ऐसा है कि दुरुपयोग के ख़िलाफ़ आप आवाज़ ही न उठा सकें."
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 2012 के यूजीसी नियम ही लागू रहेंगे और 2026 के संशोधित रेगुलेशंस पर रोक है.
अदालत ने यूजीसी से जवाब मांगा है और यह साफ़ किया है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव रोकने की ज़िम्मेदारी से कोई पीछे नहीं हट सकता.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.