नेपाल की नई बालेन शाह सरकार के सामने ये हैं तीन मुख्य चुनौतियां

राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने चुनाव में बालेन शाह को प्रमुख चेहरा बनाया था

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    • Author, फणींद्र दाहाल
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़ नेपाली
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

नेपाल के राष्ट्रपति कार्यालय ने बताया है कि देश के संविधान के अनुच्छेद 76, खंड 1 के अनुसार राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के वरिष्ठ नेता और संसदीय दल के नेता बालेंद्र शाह 'बालेन' को प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया है.

विशेषज्ञों का कहना है कि अभूतपूर्व जनादेश मिलने के बाद उनके नेतृत्व में बनी सरकार को जनता की उम्मीदों को पूरा करने में चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है.

देश के एक पूर्व मुख्य सचिव ने कहा कि सुधार के लिए पर्याप्त अवसर हैं, क्योंकि "काफी चीज़ें ग़लत हो गई हैं."

उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि सरकार को शुरुआत में उन मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए जो सीधे जनता से जुड़े हैं.

राजनीति के एक जानकार ने कहा कि भारी बहुमत से बनी नई सरकार से लोगों की उम्मीदें बहुत ज़्यादा हैं और नागरिकों का भरोसा बनाए रखना सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी.

विशेषज्ञों का कहना है कि इसराइल और अमेरिका के ईरान पर हमलों के बाद मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच सरकार को इमिग्रेशन, रेमिटेंस (विदेशों में काम कर रहे लोग जो पैसा अपने घर भेजते हैं), ईंधन आपूर्ति और महंगाई जैसे मुद्दों पर तुरंत क़दम उठाने की ज़रूरत है.

नेपाल के लोगों की उम्मीदें

नेपाल में बालेन शाह का पोस्टर

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इमेज कैप्शन, जानकारों का कहना है कि नेपाल में नई सरकार के लिए काम करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है

पिछले अगस्त में हुए चुनावों में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी सत्ता में आई, जिसने दशकों से सत्ता में रहे दलों को हटाया. यह बदलाव सुशासन और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ चले 'जेन ज़ी' आंदोलन के बाद आया.

अपने चुनावी घोषणापत्र में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) ने कहा था कि वह नैतिकता और सुशासन को प्राथमिकता देगा और ऑनलाइन माध्यम से सेवाएं देने का वादा किया था.

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इसके अलावा पार्टी ने कहा है कि वह देश की संरचना में पक्षपात ख़त्म करेगी और 2046 बीएस (अप्रैल 1989 से अप्रैल 1990) के बाद से सार्वजनिक पद पर रहे लोगों की संपत्ति की जांच के लिए एक उच्च आयोग बनाएगी.

विशेषज्ञों का कहना है कि चूंकि इन पार्टियों के पास प्रतिनिधि सभा (निचला सदन) में लगभग दो-तिहाई बहुमत है, इसलिए सरकार के पास नई शुरुआत करने का मौक़ा है.

पूर्व मुख्य सचिव बिमल कोइराला ने कहा, "अवसरों की कोई कमी नहीं है. बहुत कुछ ग़लत हुआ है, इसलिए जितना भी सुधार हो सकता है, वह किया जाना चाहिए. मुख्य बात यह है कि जनता बेहतर सेवा चाहती है. अगर सरकार जनता की हर दिन की समस्याओं को हल करने के लिए प्रतिबद्ध है, तो वह इस अवसर का भी सही इस्तेमाल कर सकती है."

उन्होंने आगे कहा, "हमारी संरचना, प्रक्रिया पर आधारित है. इसे परिणाम आधारित बनाने के लिए नौकरशाही में सुधार ज़रूरी है. नए तरीक़े अपनाने पर कुछ विरोध भी हो सकता है, जिसे एक चुनौती के रूप में देखना चाहिए."

उन्होंने कहा कि विकास परियोजनाओं में देरी और लागत बढ़ना बड़ी समस्या है और नई सरकार को इन पर ध्यान देना होगा.

नेपाल की राजनीति के जानकार लोकराज बराल ने कहा कि आरएसपी को बड़ा जनादेश मिला है, लेकिन उसके लिए काम करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है.

उन्होंने कहा, "लोगों की उम्मीदें बहुत ज़्यादा हैं. उन्हें उनकी समस्याएं हल होने और जो लोग काम के लिए विदेश जाते हैं उन्हें यहां नौकरी मिलने की उम्मीदें हैं, लेकिन उन्हें पूरा करना आसान नहीं है."

उन्होंने आगे कहा, "हमारे सामने एक बहुत बड़ी चुनौती है क्योंकि हमें बहुत बड़ा जनादेश मिला है. नेपाल में लोग जल्दी निराश हो जाते हैं. चुनौती यह है कि हम अपने कहे शब्दों और नीतियों को कैसे लागू करें और लोगों के भरोसे को टूटने से कैसे बचाएं."

बराल का मानना है कि 'जेन ज़ी' आंदोलन के दौरान किए गए बल प्रयोग और उससे हुए नुक़सान की जांच के लिए गौरी बहादुर कार्की के नेतृत्व में बने आयोग की रिपोर्ट को लागू करना भी सरकार के लिए चुनौती हो सकती है.

मध्य-पूर्व में संघर्ष और इसके बहुआयामी प्रभाव

तेल कंपनी

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इमेज कैप्शन, खाड़ी और मध्य-पूर्व के देशों में लगभग 20 लाख नेपाली लोग काम कर रहे हैं

नई सरकार ऐसे समय में बनी है जब खाड़ी और मध्य-पूर्व के देशों में तनाव है, जहां लाखों नेपाली लोग काम करते हैं. इन लोगों को इस जंग का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है.

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, हर दिन क़रीब 2,900 नेपाली काम के लिए विदेश जाते हैं और उनका भेजा पैसा देश की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा है. यह पैसा नेपाल के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 26 फ़ीसदी से अधिक है.

नेपाल के विदेश मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि खाड़ी और मध्य-पूर्व के युद्ध प्रभावित देशों में क़रीब 20 लाख नेपाली काम कर रहे हैं.

इमिग्रेशन एक्सपर्ट मीना पौडेल का कहना है कि संघर्षों और अन्य कारकों की वजह से वैश्विक राजनीति का रुख़ इमिग्रेशन विरोधी हो गया है. इसकी वजह से रोज़गार के अवसर कम हो सकते हैं.

उन्होंने कहा, "उन्हें वोट इसलिए मिला है क्योंकि लोगों को रोज़गार के अवसर खुलने की उम्मीद है. नेपाल में रोज़गार की समस्या का समाधान केवल देश के अंदर नहीं हो सकता. लगभग 20 लाख लोग ऐसे हैं जो काम कर रहे हैं और उन्हें देश से बाहर काम करने की ज़रूरत है. वहीं, घरेलू बाज़ार में भी रोजाना तीन से चार हज़ार लोग रोज़गार के लिए आ रहे हैं."

उन्होंने आगे कहा, "वैश्विक बाजार भी सिकुड़ रहा है, अवसर कम हो रहे हैं. अगर आप एक साल में पांच लाख रोज़गार के अवसर भी पैदा करते हैं, तो व्यवहारिक रूप से ऐसा करना बहुत मुश्किल है."

उन्होंने बताया कि वर्तमान में खाड़ी और मध्य-पूर्वी देश नेपालियों के लिए मुख्य रोज़गार के ठिकाने हैं.

पौडेल ने आगे कहा, "वहां के हालात ने अनिश्चितता को और बढ़ा दिया है. रोज़गार छोड़कर खाली हाथ लौटने की चुनौती है. यहां तक ​​कि जो लोग जाने के लिए तैयार हैं, वे भी नहीं जा पा रहे हैं. अगर ऐसी स्थिति आती है कि उन्हें वहां से लौटना पड़े, तो हमारे पास उन लोगों को संभालने (रोज़गार देने) की क्षमता नहीं है."

उन्होंने कहा कि इससे घरेलू श्रम बाज़ार पर दबाव पड़ सकता है और श्रमिकों को भारत में रोज़गार के अवसर तलाशने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है. उन्होंने यह भी कहा कि आकर्षक रोज़गार के अवसरों के लालच में युवा मानव तस्करों के झांसे में आ सकते हैं.

अपने घोषणापत्र में आरएसपी ने दावा किया है कि अगले पांच सालों के भीतर नेपाल 'रेमिटेंस पर निर्भरता' की स्थिति से मुक्त हो जाएगा और नए रोज़गार के अवसर पैदा करके 'उत्पादन और निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था' की ओर आगे बढ़ेगा.

मध्य-पूर्व में तनाव के कारण ईंधन आपूर्ति प्रभावित हो सकती है. ऐसी चिंताओं के बीच आवास से लेकर विकास और निर्माण परियोजनाओं तक हर चीज़ पर महंगाई का असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है.

आरएसपी के भीतर सत्ता की राजनीति और एकता

राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी

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इमेज कैप्शन, कुछ जानकारों का कहना है कि चुनाव में बालेन शाह को मुख्य चेहरा बनाने की वजह से आरएसपी को जनादेश मिला

2079 बीएस (अप्रैल 2022 से अप्रैल 2023) के आम चुनाव से पहले बनी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) पिछली प्रतिनिधि सभा में चौथी सबसे बड़ी पार्टी थी. इतने कम समय में इस पार्टी को मिली सफलता ने देश और विदेश में कई लोगों को 'हैरान' किया है.

कुछ विश्लेषकों का कहना है कि यह जनमत तब मिला जब पार्टी ने 'जेन ज़ी' आंदोलन के बाद काठमांडू महानगरपालिका के तत्कालीन महापौर बालेन शाह को प्रधानमंत्री चेहरे के रूप में आगे किया.

बराल का कहना है कि बालेन शाह की सरकार की सफलता पार्टी के भीतर एकता पर निर्भर करेगी.

उन्होंने कहा, "उनकी पार्टी में कितनी एकता बनी रहेगी? चुनाव से ठीक पहले, अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोग पार्टी में चुनाव लड़े हैं और उन्होंने चाहे जिसे भी उम्मीदवार बनाया हो, वे जीत गए हैं. अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोगों के बीच एकता कैसे बनी रहेगी, यह भी एक सवाल है. पार्टी अध्यक्ष और प्रधानमंत्री के बीच समन्वय कैसा रहेगा, यह अभी कहना मुश्किल है."

प्रतिनिधि सभा के पिछले कार्यकाल के दौरान, आरएसपी अध्यक्ष रवि लामिछाने सहित कई नेता सरकार में शामिल हुए थे. हालांकि, बराल जैसे कुछ विश्लेषकों का मानना ​​है कि भले ही पार्टी के पास पूर्ण बहुमत की सरकार हो, लेकिन उसके कई नेताओं के पास सरकार चलाने का अनुभव नहीं है, जिससे अतिरिक्त चुनौतियां पैदा हो सकती हैं.

उन्होंने कहा, "विपक्ष में रहते हुए खुलकर बोलना, वादे करना और लोकलुभावन नारे लगाना आसान होता है, लेकिन सरकार में रहते हुए कई मुश्किलें आती हैं. नौकरशाही को मैनेज करना पड़ता है, उसमें ऊर्जा और नए विचार लाने पड़ते हैं. अब प्रधानमंत्री से लेकर नीचे तक सभी नए हैं और हर तरह का समन्वय करना पड़ता है, जो कि नए लोगों के लिए एक चुनौती है."

बदलाव को संभव बनाने के लिए क्या किया जा सकता है?

बालेन शाह

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इमेज कैप्शन, बालेन शाह मई 2022 में पहली बार नेपाल की राजधानी काठमांडू के मेयर बने थे

पूर्व मुख्य सचिव बिमल कोइराला का कहना है कि संसदीय राजनीति में सिर्फ़ बहुमत से परिणाम नहीं मिलते.

उन्होंने कहा, "चाहे संख्या कितनी भी हो, केवल गणित से काम नहीं चलेगा. जो चीज़ काम आती है, वह है कार्यपालिका की निष्ठा, दृढ़ संकल्प और ईमानदारी. अगर वह निष्ठा, दृढ़ संकल्प और ईमानदारी मौजूद है, तो बदलाव ज़रूर आएगा."

कोइराला ने आगे कहा कि जब नेता ऊंचे हौसले के साथ सरकार में आते हैं, तो अधिकारी भी प्रेरित होते हैं.

उन्होंने कहा, "अगर सिविल सेवा को भी उसी तरह से संगठित किया जाए और सरकार का उद्देश्य स्पष्ट हो जाए, तो समाज के सभी वर्गों की भागीदारी बढ़ेगी और इससे नई सामाजिक ऊर्जा पैदा होगी, जो आर्थिक पूंजी में बदल जाएगी."

21 फ़रवरी को हुए चुनाव से पहले, कुछ विश्लेषकों का तर्क था कि नेपाल की मिश्रित चुनावी प्रणाली की वजह से किसी एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिलने की संभावना नहीं है.

नेपाल में दशकों से ऐसा होता आया है कि जब भी मजबूत बहुमत की कोई सरकार सत्ता में आती है, तो कई लोग उसकी ओर से लाई जाने वाली नीतियों में दिलचस्पी रखते हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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