ड्रोन-मिसाइल हमलों के बावजूद खाड़ी के देशों ने ईरान पर नहीं किया पलटवार, जानिए वजह

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इमेज कैप्शन, जब से जंग शुरु हुई है, ईरान ने दुबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट समेत खाड़ी देशों के नागरिक ढांचों को निशाना बनाया है
    • Author, लुईस बारुचो
    • पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

अमेरिका और इसराइल के साथ अपनी जंग के हिस्से के तौर पर ईरान पूरे खाड़ी क्षेत्र में मिसाइल हमले करना जारी रखे हुए है.

जब इसराइल ने ईरान के साउथ पार्स पर हमला किया तो जवाबी कार्रवाई में ईरान ने गुरुवार को क़तर के रास लाफ़ान ऊर्जा परिसर पर हमला किया. दोनों ही केंद्र दुनिया के सबसे बड़े प्राकृतिक गैस क्षेत्रों का हिस्सा हैं.

अब तक क़तर और अन्य खाड़ी देशों ने बार-बार निशाना बनाए जाने के बाद भी ईरान के ख़िलाफ़ जवाबी कार्रवाई नहीं की है.

वे हमलों से क्यों बच रहे हैं और कौन सी बात उन्हें कार्रवाई के लिए मजबूर कर सकती है?

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ख़तरा ज़्यादा, फ़ायदा कम

इमेज कैप्शन, इस नक्शे में लाल डॉट दिखा रहे हैं कि यूएई, बहरीन और क़तर पर ईरान ने सर्वाधिक हमले किए

जब अमेरिका और इसराइल ने 28 फ़रवरी को ईरान के ख़िलाफ़ संयुक्त सैन्य अभियान शुरू किया, तो तेहरान ने बिना देरी के जवाबी कार्रवाई सिर्फ़ इसराइल पर ही नहीं बल्कि अमेरिका के सहयोगी खाड़ी देशों पर भी हमले किए.

बहरीन, कुवैत, सऊदी अरब, क़तर, ओमान और ख़ासकर संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) को निशाना बनाया गया.

खाड़ी अधिकारियों का कहना है कि क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमलों के साथ-साथ, ईरान ने नागरिक ढांचे पर भी हमला किया है, जिनमें हवाई अड्डे, होटल, रिहायशी इलाक़े और ख़ास तौर पर ऊर्जा ठिकाने शामिल हैं.

इसके बावजूद अभी तक खाड़ी देशों ने ईरान के ख़िलाफ़ खुद कोई हमला नहीं किया है और वो सीधे तौर पर युद्ध में शामिल होने से बच रहे हैं.

अमेरिका के थिंक टैंक सेंटर फ़ॉर इंटरनेशनल पॉलिसी में सीनियर नॉन रेजिडेंट फ़ेलो सिना तूसी के अनुसार, "उनके नज़रिए से यह उनका युद्ध नहीं है और जवाबी कार्रवाई उन्हें कमज़ोर दर्शक से बड़े निशाने में बदल सकती है, क्योंकि उनके लिए पाने से कहीं ज़्यादा खोने के लिए बहुत कुछ दांव पर है."

उनके मुताबिक़, "पीछे हटने का यह फ़ैसला जोखिम, रणनीतिक सोच और सीमित फ़ायदे की मिलीजुली भावना से आता है."

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खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्थाएं ऊर्जा ढांचे, शिपिंग और निवेशकों के भरोसे पर निर्भर हैं और "ईरान ने दिखाया है कि इन सभी को बाधित किया जा सकता है."

ख़ास तौर पर ईरान फ़ारस की खाड़ी और होर्मुज़ स्ट्रेट का इस्तेमाल कर रहा है जोकि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम जलमार्ग है.

हालांकि ट्रेंड्स रिसर्च एंड एडवाइजरी के सीनियर मैनेजिंग डायरेक्टर और ट्रंप प्रशासन में पूर्व पेंटागन अधिकारी बिलाल साब का कहना है कि अगर खाड़ी देश ईरान पर हमला नहीं करते, तो "वे तेहरान को यही संकेत दे रहे हैं कि वह बिना किसी नतीजे के उन्हें भारी नुकसान पहुंचा सकता है."

उनके अनुसार, "जवाबी हमले का मक़सद सीमित अवधि में ईरान को हमले रोकने के लिए मजबूर करना और लंबी अवधि में भविष्य के ईरानी हमलों के ख़िलाफ़ कुछ हद तक डिटरेंस पैदा करना होगा."

हालांकि वह जोड़ते हैं कि जोखिम 'काफी बड़ा' होगा, क्योंकि यह साफ़ नहीं है कि खाड़ी देशों के हमले जंग को कितना प्रभावित करेंगे या रणनीतिक रूप से सही होंगे.

किंग्स कॉलेज लंदन के डिफ़ेंस स्टडीज़ डिपार्टमेंट में इंटरनेशनल सिक्युरिटी के लेक्चरर रॉब गीस्ट पिनफ़ोल्ड के अनुसार, खाड़ी देशों में इसराइल के साथ खुद को जोड़ने को लेकर भी झिझक है.

वो कहते हैं, "सोच यह है कि इसराइल ने अमेरिका को इस जंग में खींच लिया है."

'2003 की यादें'

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इमेज कैप्शन, क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने के साथ ईरान ने नागरिक ढांचों पर भी हमले किए हैं. दुबई में ईरानी ड्रोन हमले में दुबई क्रीक हॉर्बर टॉवर को काफ़ी नुक़सान पहुंचा.

पिनफ़ोल्ड के अनुसार, कई खाड़ी नेताओं के लिए इराक़ के साथ अमेरिका के नेतृत्व वाले जंग की विरासत आज भी इलाक़ाई सोच पर असर डालती है.

साल 2003 में अमेरिका ने इराक़ पर हमला किया और जल्दी ही सद्दाम हुसैन की सरकार को हटा दिया. लेकिन इसके बाद सत्ता का एक ऐसा खालीपन पैदा हुआ, जिसने विद्रोह, सांप्रदायिक हिंसा और लंबे समय तक अस्थिरता को जन्म दिया.

पिनफोल्ड कहते हैं, "2003 की छाया अभी भी मौजूद है. उन्हें डर था कि इससे अराजकता और अस्थिरता का दरवाज़ा खुल जाएगा और ईरान को अपना प्रभाव बढ़ाने का मौका मिलेगा. उनकी यह आशंका काफ़ी हद तक सही भी साबित हुई."

पिनफ़ोल्ड कहते हैं कि अब खाड़ी देशों को डर है कि अमेरिका बिना साफ़ लक्ष्य के "खुला अभियान" चला रहा है और बाद में क्षेत्र को "समस्याओं के साथ छोड़ देगा."

हालांकि अमेरिका और इसराइल के इस युद्ध को लेकर खाड़ी देशों में नाराज़गी है, फिर भी वे अमेरिकी सैन्य सुरक्षा पर काफ़ी निर्भर हैं.

वे अमेरिकी सैन्य ठिकानों और सैनिकों की मेज़बानी करते हैं, ख़ुफ़िया जानकारी साझा करते हैं और अमेरिकी एयर डिफ़ेंस प्रणालियों पर बहुत अधिक निर्भर रहते हैं.

खाड़ी अधिकारियों के अनुसार, इन एयर डिफ़ेंस प्रणालियों ने ईरान के ज़्यादातर मिसाइल हमलों को रोक दिया है.

पिनफ़ोल्ड कहते हैं, "राजनीतिक स्तर पर सवाल उठाने के बावजूद, सैन्य स्तर पर यह संबंध मजबूत साबित हुआ है."

पिछले महीने हमले शुरू करने के बाद, अमेरिका ने अपने सैन्य अभियान के अलग-अलग लक्ष्य बताए हैं, जिनमें ईरान की परमाणु हथियार बनाने की क्षमता ख़त्म करने से लेकर सत्ता परिवर्तन तक शामिल है.

फिर भी खाड़ी नेताओं का मानना है कि हमलों को रोकने का एकमात्र रास्ता कूटनीति है.

"यह सुनिश्चित करने का एक ही तरीक़ा है कि उन पर हमला न हो, और वह है किसी समझौते तक पहुंचना."

बंटा हुआ क्षेत्रीय समीकरण

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इमेज कैप्शन, सऊदी अरामको के रास तानुरा ऑयल रिफ़ाइनरी पर भी ईरान ने हमला किया है

पिनफ़ोल्ड के अनुसार, ईरान ने सभी खाड़ी देशों को 'एक जैसी तीव्रता' से निशाना नहीं बनाया है, जो उनके आपसी संबंधों को दिखाता है.

संयुक्त अरब अमीरात इस युद्ध में सबसे ज़्यादा हमले झेलने वाले देशों में से एक रहा है.

साल 2020 में उसने और बहरीन ने इसराइल के साथ संबंध सामान्य किए थे.

इसके उलट ओमान, जो ईरान और पश्चिम के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाता रहा है, उसे कम निशाना बनाया गया है.

पिनफ़ोल्ड कहते हैं, "ओमान एकमात्र खाड़ी देश था जिसने ईरान के नए सर्वोच्च नेता (मोजतबा ख़ामेनेई) को बधाई दी. यह अन्य खाड़ी देशों को पसंद नहीं आया."

दुबई पब्लिक पॉलिसी रिसर्च सेंटर के महानिदेशक मोहम्मद बहारून का कहना है, "ईरान खाड़ी देशों को अपने ख़िलाफ़ एक बड़े गठबंधन की ओर धकेल रहा है. खाड़ी देशों पर हमला कर वह उन्हें दुश्मन बना रहा है और एक बड़े जंग का ख़तरा बढ़ा रहा है, जिसे कोई नहीं चाहता."

पिछले सप्ताह बुधवार को सऊदी अरब में खाड़ी देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक के बाद, अरब देशों ने संयुक्त राष्ट्र के अनुच्छेद 51 के तहत आत्मरक्षा के अपने अधिकार पर जोर दिया.

जवाबी कार्रवाई की वजह क्या बन सकती है?

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इमेज कैप्शन, बहरीन के मनामा में जुफ़ैर में ईरानी ड्रोन हमले में क्षतिग्रस्त एक ईमारत

यूके के थिंक टैंक आरयूएसआई के सीनियर एसोसिएट फ़ेलो डॉ एचए हेलियर कहते हैं, "ख़ासकर अगर ऊर्जा निर्यात पर हमले जारी रहते हैं या बढ़ते हैं तो राजनीतिक गणित तेज़ी से बदल सकता है. फ़िलहाल खाड़ी देश जवाबी कार्रवाई से बच रहे हैं."

उनके अनुसार, ऊर्जा ठिकानों पर बड़ा हमला इस सोच बदल सकता है.

पिछले हफ़्ते गुरुवार को क़तर के रास लाफ़ान ऊर्जा परिसर पर हमला करने के बाद, ईरान ने चेतावनी दी कि अगर उसके ठिकानों पर हमले जारी रहे तो वह अमेरिका के खाड़ी सहयोगियों को "पूरी तरह तबाह" कर देगा.

खाड़ी देशों के रुख़ में बदलाव तब भी आ सकता है, जब ईरान के क्षेत्रीय सहयोगी सीधे उन्हें निशाना बनाएं.

पिनफ़ोल्ड कहते हैं, "अगर हूती उन पर हमला करते हैं, तो यह एक नया मोर्चा खोल देगा."

ऐसी स्थिति में खाड़ी देश इस संघर्ष को सिर्फ़ अमेरिका और इसराइल का नहीं बल्कि अपना भी मान सकते हैं.

किसी भी स्थिति में, भले ही अभी तक खाड़ी देशों ने जवाबी कार्रवाई नहीं की है, पिनफ़ोल्ड के अनुसार ईरान की रणनीति "बेहद जोखिम भरी" है.

वो कहते हैं, "ईरान खाड़ी देशों के साथ अपने सभी रिश्ते ख़त्म कर रहा है, जो दिखाता है कि वह इस संघर्ष को कितना गंभीर मानता है."

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इमेज कैप्शन, बहरीन के सित्रा द्वीप पर बाप्को ऑयल रिफ़ाइनरी पर हमले के बाद उठता धुआं

हेलियर का कहना है कि खाड़ी देश अनंत समय तक हमले बर्दाश्त नहीं करेंगे, ख़ासकर जब निशाना नागरिक क्षेत्र हों.

अंत में उनका मानना है कि खाड़ी देशों पर दबाव बनाने की ईरान की रणनीति उलटी पड़ सकती है.

"वे यह फैसला कर सकते हैं कि भले ही उन्होंने शुरुआत में अमेरिका-इसराइल युद्ध का विरोध किया हो, लेकिन अब उनकी अपनी सुरक्षा ख़तरे में है और तत्काल ख़तरे को ख़त्म करने के लिए अमेरिका का साथ देना ज़्यादा उचित होगा."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित