You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
पैसा, ताक़त, रसूख़ और यौन हिंसा के मर्दाना तंत्र का नाम है एपस्टीन फ़ाइल्स: ब्लॉग
- Author, नासिरुद्दीन
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
बहुत मुश्किल है, ख़ुद के साथ हुई यौन हिंसा के बारे में बोलना. यह तब और मुश्किल हो जाता है, जब मुलज़िम हर तरह से ताक़तवर कोई मर्द हो.
मगर मुश्किलों और ख़तरों के बाद भी ताक़तवारों के ख़िलाफ़ बोलना कितना ज़रूरी है, यह बार-बार सामने आता है. कई बार आवाज़ उठाने में काफ़ी वक़्त भी लगता है.
ऐसी कई मिसालें अपने देश में भी मिल जाएँगी. आवाज़ उठाने में देरी का यह मतलब क़तई नहीं होता कि कोई जुर्म हुआ ही नहीं है.
हाँ, इन सबके दौरान बोलने वाली बहादुर स्त्रियों को जो झेलना पड़ता है, वह बेहद तकलीफ़देह होता है. उनकी नीयत, चरित्र और चुप्पी पर सवाल उठाए जाते हैं.
बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
ताक़त किसी चीज़ की हो सकती है. पैसा, रसूख़, सत्ता, पद… और जब मर्द के पास ये सब ताक़त होती है तो कई इनका बेख़ौफ़ इस्तेमाल यौन उत्पीड़न और हिंसा के लिए करते हैं.
यौन अपराधी जेफ़री एपस्टीन और उसके दोस्तों की मंडली की भी कहानी कुछ ऐसी ही है.
इसी वजह से कुछ वक़्त से जेफ़री एपस्टीन और उसके दोस्त- मददगार लगातार सुर्ख़ियों में बने हैं. यह यौन अपराधी कौन था या उसके दोस्त कौन हैं, इनके बारे में काफ़ी कुछ जानकारी सामने आ चुकी है.
उसके दोस्तों में पढ़ाने वाले, लेखक, कलाकार, बिजनेसपर्सन, कम्प्यूटर दिग्गज, राजनेता, नौकरशाह, अफ़सर... सब शामिल हैं. इसकी आँच भारत तक भी पहुँची है.
इस हंगामे के बीच, यह भी बार-बार कहा जा रहा है कि एपस्टीन फ़ाइल में नाम आना, इस बात का सुबूत नहीं है कि वह शख्स यौन शोषक या उत्पीड़क है. सही बात है. वैसे तो 'यौन शोषक' और 'उत्पीड़क' भी तब तक मुजरिम नहीं है, जब तक क़ानून उन्हें दोषी न ठहराए.
इसलिए ज़रूरी है कि एपस्टीन केस के बारे में थोड़ी जानकारी यहाँ साझा की जाए.
20 साल पहले लगा था आरोप
बात आज से लगभग 20 साल पहले साल 2005 में शुरू होती है. चौदह साल की एक लड़की के माँ-बाप ने इल्ज़ाम लगाया कि जेफ़री एपस्टीन ने अपने घर में उनकी बेटी पर यौन हिंसा की.
यही नहीं, एपस्टीन के घर की तलाशी के दौरान कई और लड़कियों की तस्वीरें भी मिलीं.
इसके बाद साल 2008 में एपस्टीन को यौन अपराध के लिए दोषी ठहराया गया. उसे 18 महीने की सज़ा हुई.
लेकिन उसे 12 घंटे के लिए बाहर जाने और काम करने की इजाज़त भी मिल गई. लगभग 13 महीने तक ऐसी सज़ा काटने के बाद उसे रिहा कर दिया गया.
सज़ा के साथ ही एपस्टीन का नाम साल 2008 में ही न्यूयॉर्क के यौन उत्पीड़कों के रजिस्टर में ज़िंदगी भर के लिए दर्ज कर लिया गया. यौन अपराध के मामले में यह एक अहम रजिस्टर है.
इसमें जिनका नाम दर्ज होता है, उन पर कई तरह की पाबंदी और निगरानी होती है.
लेकिन इन सबके पहले उसके वकीलों ने कम सज़ा और ज़्यादा बचाव का तरीक़ा निकाला. सरकारी वकीलों के साथ समझौता हुआ. इस समझौते की शर्तों ने जाँच का दायरा सीमित कर दिया.
यानी आगे इसकी जाँच नहीं होगी कि इस मामले में यौन हिंसा की पीड़ित और भी लड़कियाँ हैं या नहीं. या एपस्टीन के साथ-साथ और कौन-कौन लोग इस अपराध में शामिल थे.
इसलिए उस वक़्त पता भी नहीं चल पाया कि इस जुर्म में उसके साथ और कौन-कौन शामिल थे. यही नहीं, इस समझौते की जानकारी एपस्टीन के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वालों को नहीं दी गई.
रसूख़दारों को बचाने के आरोप
आपराधिक न्याय प्रक्रिया को ताक़तवर मर्द अपने हक़ में कैसे इस्तेमाल करते हैं, एपस्टीन केस इसका नमूना है. कई बार पूरा तंत्र ही उन्हें बचाने में लग जाता है.
भारत में भी यौन उत्पीड़न या अपराध के किसी ताक़तवर मुलज़िम के मामले में ऐसे एक नहीं बल्कि अनेक उदाहरण आसानी से मिल जाते हैं. आज भी आरोप लग रहे हैं कि एपस्टीन के साथ शामिल ताक़तवर मर्दों को बचाया जा रहा है.
बहरहाल, एपस्टीन के यौन उत्पीड़न से जुड़ी चर्चाओं ने तब गति पकड़ ली जब 'मियामी हेराल्ड' की खोजी पत्रकार जूली के. ब्राउन और उनके साथियों ने इसकी तफ़्तीश करनी शुरू की.
उनकी रिपोर्ट ने एपस्टीन के 'यौन हिंसा के जाल' की तरफ़ लोगों का ध्यान खींचा. रिपोर्ट के मुताबिक़, जूली ब्राउन लगभग 80 सर्वाइवरों की पहचान करने में क़ामयाब रहीं.
इनमें लगभग 60 महिलाओं को तलाश भी लिया. आठ बात करने के लिए तैयार हुईं और सिर्फ़ चार अपनी पहचान के साथ बात करने के लिए राज़ी हुईं.
ताक़तवर लोगों के ज़ुल्म और ज़्यादती के ख़िलाफ़ स्त्री का बोलना कितना मुश्किल होता है, यह इससे भी पता चलता है.
रिपोर्ट के मुताबिक़, वे अपने साथ हुई हिंसा पर शर्मिंदा थीं. उन्हें कहीं न कहीं इस बात का भी अहसास था कि ऐसे ताक़तवर लोगों के साथ कुछ नहीं हो सकता. इन बहादुर आवाज़ों के सामने आने के बाद, साल 2019 में एपस्टीन की फिर गिरफ़्तारी हुई.
महीने भर बाद ही वह अपनी जेल की कोठरी में मृत मिले. अब नए सिरे से उनकी मौत की जांच को लेकर मांग उठ रही है.
यौन हिंसा से जुड़े जेफ़री एपस्टीन के केस में तीन अहम पड़ाव हैं- साल 2005, साल 2008 और साल 2019.
इन सालों में उस पर कई इल्ज़ाम लगे. जुर्म साबित हुआ. फिर इल्ज़ाम की लंबी फ़ेहरिस्त सामने आई. दोबारा गिरफ़्तारी हुई.
दिलचस्प है कि यह सब उस अमेरिका में हो रहा था, जिसकी ताक़तवर सत्ता ख़ुद को आधुनिक और इंसाफ़पसंद मानती रही है.
लेकिन आधुनिक और इंसाफ़पसंद होने का सबसे बड़ा पैमाना है, वंचित तबकों ख़ासकर स्त्रियों के बारे में नज़रिया और उनके साथ इंसाफ़ का सुलूक.
यौन हिंसा की जड़ में श्रेष्ठता और ग़ैरबराबरी
एपस्टीन और उसकी मर्दाना मंडली उस पूरी व्यवस्था को बेनक़ाब करते हैं, जहाँ स्त्रियाँ, मर्दों के लिए महज़ एक यौन वस्तु हैं. ऐसा नहीं है कि यह सब दुनिया के बाक़ी हिस्सों में नहीं होता.
मर्द सत्ता, पद, पैसा, रसूख़ जैसी ताक़तों के बूते स्त्री को सेवक और यौन दासी बनाना चाहते हैं...क्योंकि उनके लिए स्त्री महज़ एक देह है. उनका यक़ीन है कि ये देह उनके ही इस्तेमाल के लिए है. इसलिए इसे वे हर तरह से अपने क़ाबू में करना चाहते हैं.
इस यौन शोषण और यौन हिंसा की जड़ में है- श्रेष्ठता और ग़ैरबराबरी का ख़याल. यानी मर्द ही श्रेष्ठ है. स्त्री उसके बराबर नहीं है और ना ही हो सकती है. स्त्री, मर्द की सेवा के लिए है.
एप्सटीन की फ़ाइल में कुछ स्त्रियाँ भी हैं. वे एपस्टीन को बचाती हैं. यही नहीं, सामने आए दस्तावेज़ों के मुताबिक़, उससे उनकी बातचीत महज़ पेशेवर मामलों तक नहीं सिमटी होती है.
वे भी लड़कियों को महज़ शरीर के दायरे में देखती हैं. इनमें से भी कुछ तो मर्दों की टोली के यौन उत्पीड़न के लिए मासूम, कम उम्र लड़कियों को बहलाती-फ़ुसलाती और तैयार करती हैं.
अपने साथ हुई यौन हिंसा और उत्पीड़न के ख़िलाफ़ बोलने वाली एक लड़की ने बताया कि उन्हें सिखाया जाता था कि कैसे सबकुछ चुपचाप करना है. सहना है. जो-जो जेफ़री कहे, वह करके उसे ख़ुश करना है. वह कहती हैं कि स्त्री के नाते उन्हें यह ज़्यादा चुभता था कि एक स्त्री ही यह सब होने दे रही है बल्कि ऐसा होने में मदद कर रही है.
यह पितृसत्ता का उदाहरण है. स्त्रियों को भी लगता है कि मर्दों की दुनिया ऐसे ही चलती है. अगर उन्हें भी इसमें चलते रहना है तो मर्दों के मुताबिक़ काम करना होगा.
मर्दाना ताक़त का कुचक्र
एपस्टीन की ऐसी ही एक महत्वपूर्ण सहयोगी गिलेन मैक्सवेल को साल 2021 में नाबालिग लड़कियों को फुसलाने और उनका यौन शोषण कराने में सहयोग के इल्ज़ाम में मुजरिम ठहराया गया.
लड़कियों के लिए मर्दाना ताक़त का कुचक्र अँधेरे कुएँ की तरह है. उन्हें फँसाया जाता है. वे फिर मानो किसी दलदल में फँसती चली जाती हैं. इनके लिए बोलना, आसान नहीं होता.
उनके साथ जुर्म हुआ है और उन्हें ही शर्मिंदगी का अहसास कराया जाता है. जुर्म उनके साथ होता है और यह समाज सज़ा भी उन्हें ही देता है. तभी तो एपस्टीन के मामले में भी शुरुआत में चंद बहादुर लड़कियाँ ही बोलने की हिम्मत जुटा पाईं.
यही नहीं, एपस्टीन फ़ाइल और भी कुछ बताती है. जहाँ तक स्त्रियों के साथ सुलूक का सवाल है, प्रगतिशील माने जाने वाले मर्दों पर भी यक़ीन करना मुश्किल है.
एपस्टीन दुनिया के बेहतरीन दिमाग़ से मदद माँग रहा था और वे उसे इस बात की सलाह दे रहे थे कि मीडिया में उसके यौन अपराधों के बारे में छप रही ख़बरों से कैसे निपटा जाए. ऐसे लोगों के शामिल होने ने अनेक लोगों का भरोसा तोड़ा है. कई ग़ुस्से और सदमे में हैं.
यानी, दुनिया की सत्ता-संरचना अब भी बड़े पैमाने पर मर्दाना है. दबंग मर्दानगी का दबदबा है. ज़हरीली मर्दानगी का बोझ समाज पर बहुत ज़्यादा है. आज भी स्त्री की गरिमा वाला समाज बनना बाक़ी है.
लेकिन ढेरों स्त्रियाँ ख़ामोश रहने को राज़ी नहीं हैं. वे यह सब बदलना चाहती हैं. इनमें जेफ़री एप्सटीन और उसके दोस्ताना समूह के यौन उत्पीड़न, शोषण और हिंसा सहने वाली अनेक लड़कियाँ शामिल हैं.
इन स्त्रियों में एक लिज़ा फ़िलिप्स कहती हैं, "हम चाहते हैं कि पूरी फ़ाइल और (एप्सटीन के सभी कथित सहयोगियों के) नाम उजागर किए जाएँ. मेरे लिए, इंसाफ़ का मतलब है यौन तस्करी के जाल का पर्दाफ़ाश करना ताकि आगे वे किसी को नुक़सान न पहुँचा सकें.''
ये सब बहादुर स्त्रियाँ अब अपनी आवाज़, नाम, चेहरा भी छिपाने को तैयार नहीं हैं. वे बरसों की यौन हिंसा की यातना के ख़िलाफ़ ख़ामोशी तोड़ रही हैं. आवाज़ बुलंद कर रही हैं. अमेरिकी संसद के चौखट पर दस्तक दे रही हैं.
वे माँग कर रही हैं कि जवाबदेही तय की जाए. ताक़तवर लोगों को बचाया न जाए.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.