अमृता शेरगिल: वो चित्रकार जो अपने समय से काफ़ी आगे थीं
रेहान फ़ज़ल
बीबीसी संवाददाता
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कहा जाता है कि अमृता जिस कमरे में घुसती थीं वहाँ हो रही हर बातचीत बंद हो जाया करती थी. लोगों की सांसें तेज़ हो जाती थीं और हर कोई उनकी तरफ़ ही देखने लगता था.
अमृता बला की ख़ूबसूरत थीं, दुबली-पतली और नाज़ुक. अक्सर वो चटकीले हरे रंग की साड़ी पर चमकते हुए लाल रंग का ब्लाउज़ पहनती थीं. आभूषण के तौर पर उनके कान से सिर्फ़ एक तिब्बती झुमका लटकता रहता था.
उनके काले बालों के ठीक बीच से एक माँग निकलती थी. उनके बाल उनके कानों को हमेशा ढके रहते थे. उनके माथे पर एक बिंदी होती थी और उनकी आँखें हमेशा चमकती रहती थीं. वो अंतर्मुखी थीं और अकेले रहना पसंद करती थीं.
यशोधरा डालमिया अमृता शेरगिल की जीवनी में लिखती हैं, "वो जन्म से ही असाधारण थीं. लंबे रेशम जैसे बाल, बड़ी बड़ी आँखें, चौड़ा माथा जो ऊपर की तरफ़ और चौड़ा होता गया था. बचपन में रोना तो उसे आता ही नहीं था."
वो आगे लिखती हैं, "अमृता सबसे ज़्यादा ख़ुश तब होती थी जब अपनी छोटी बहन इंदिरा को नहाते हुए देखती थी. करीब 5 साल की उम्र में उसने रंगीन पेंसिलों से चित्रकारी शुरू की थी. भाषाएं जल्दी जल्दी सीखने में उसका कोई सानी नहीं था. उनको फ़्रेंच, इटालियन, अंग्रेज़ी, हंगेरियन के अलावा हिंदी और पंजाबी में भी महारत थी."
चित्रकारी के बाद उनका दूसरा प्रेम था संगीत. वो पियानो बजाया करती थीं. उनके पति विक्टर इगान ने एक इंटरव्यू में कहा था, "जब भी वो ख़राब मूड में या अवसादग्रस्त होती थीं, वो अकेले घंटों तक पियानो बजाया करती थीं. उसके बाद उनके मूड में जान आ जाती थी और वो कहीं बेहतर महसूस करती थीं."
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अमृता की पेंटिंग ‘यंग गर्ल्स’ को स्वर्ण पदक
अमृता एक अमीर सिख उमराव सिंह और हंगेरियन माँ एनटॉयनेट शेरगिल की बेटी थीं. उनका जन्म 30 जनवरी 1913 को हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट में हुआ था.
कला के प्रति उनके रुझान को देखते हुए उनके माता पिता उन्हें पेरिस ले गए थे ताकि वहाँ वो पेंटिंग की औपचारिक शिक्षा ले सकें. जब अमृता पेरिस पहुंची थीं तो वो सिर्फ़ 16 साल की थीं.
अगले पाँच साल उन्होंने पेरिस में ही बिताए थे. उस ज़माने में विंसेट वॉन गॉग और पॉल गोगाँ उनके प्रिय चित्रकार होते थे. पेरिस में ही रखी मोनालीसा की पेंटिंग ने उन्हें बहुत प्रभावित किया था.
17 साल की उम्र में उन्होंने अपना ख़ुद का एक चित्र बनाया था.
उन्हें आत्मचित्र बनाने का बहुत शौक था. वो अक्सर अपने सौंदर्य की स्वयंद्रष्टा बनी रहती थीं.
सन 1932 में उनकी पेंटिंग ‘यंग गर्ल्स’ को ग्रैंड सेलोन का स्वर्ण पदक मिला था. इस पेंटिंग के लिए उनकी बहन इंदिरा और उनकी दोस्त डेनिस प्रूतो ने मॉडलिंग की थी.
अमृता एक किस्सा सुनाया करती थीं, "सेलोन की ज्यूरी की एक सदस्य ने मुझे देखते ही कहा था तुम तो महज़ बच्ची हो. ये कैसे संभव हो सकता है कि तुमने ये पेंटिंग बनाई है? हमने सोचा था कि इसको कम से कम 30 साल के पेंटिंग वाले शख़्स ने बनाया है. लगता है तुमने पालने में ही चित्रकारी करनी सीख ली थी."
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यूसुफ़ अली ख़ाँ से मंगनी टूटी
अमृता की माँ चाहती थीं कि वो एक रईसज़ादे से शादी करें. उन दिनों उत्तर प्रदेश के एक रईस यूसुफ़ अली ख़ाँ पेरिस में रह रहे थे. देखने में अच्छे थे. उनके पिता राजा नवाब अली सीतापुर के एक ताल्लुकदार थे.
उन्होंने लखनऊ में हिंदुस्तानी संगीत के मैरिस कॉलेज की स्थापना की थी जो बाद में भातखंडे कालेज कहलाया. माँ के बढ़ावा देने पर अमृता यूसुफ़ के संपर्क में आईं और दोनों की मंगनी भी हो गई. लेकिन दोनों के स्वभाव में ज़मीन आसमान का अंतर था.
अपनी माँ को लिखे पत्र में अमृता ने लिखा था, "यूसुफ़ मेरे प्रति वफ़ादार नहीं है. उनका न सिर्फ़ विक्टर की बहन वॉयला से इश्क चल रहा है बल्कि सड़क पर चलने वाली हर सुँदर लड़की पर उनकी निगाह रहती है."
अमृता ने यूसुफ़ से अपनी मंगनी तोड़ दी. अमृता का डर सही साबित हुआ. यूसुफ़ ने बाद में तीन शादियाँ कीं. पहली एक अंग्रेज़ युवती रूथ से जिन्हें उन्होंने तलाक़ दे दिया.
उसके बाद उन्होंने बंबई हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश नवाब मिर्ज़ा की बेटी फ़खरुन्निसा रानी से शादी की. उनको भी तलाक़ देने के बाद उन्होंने एक एंग्लो इंडियन लड़की एलसा विलियम्स से ब्याह रचाया.
अमृता के जीवनीकार एन इक़बाल सिंह उनकी जीवनी में लिखते हैं, "यूसुफ़ प्रकरण का असर ये हुआ कि उन्होंने पुरुषों के साथ अपने संबंधों को गंभीरता से लेना छोड़ दिया. वो असावधान हो गईं और कई पुरुषों से संबंध बनाने लगीं."
"किसी एक व्यक्ति से उनका लगाव जाता रहा. सिर्फ़ एक महिला मेरी लुई चैसनी से उनके गहरे अंतरंग संबंध बने. उन्होंने आख़िर तक उनका नाम बहुत स्नेह से लिया और शिमला के अपने स्टूडियो और लाहौर के अपने घर में उनकी तस्वीर दीवार पर टाँगी."
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कई महिलाओं और पुरुषों से प्रेम संबंध
बाद में अमृता ने कई लोगों से इश्क़ किया जिसमें पुरुष और महिला दोनों शामिल थे. उनमें से एक थीं एडिथ लैंग जो पेरिस में पियानो की कक्षाएं लिया करती थीं.
वो अमृता से उम्र में काफ़ी बड़ी थीं. उस समय वो 27-28 साल की रही होंगी. उनको अमृता पर क्रश था.
इक़बाल सिंह लिखते हैं, "बाद में अमृता को इस लेस्बियन संबंध के कारण काफ़ी शर्मिंदगी उठानी पड़ी थी. एक बार जब वो एडिथ के साथ बिस्तर पर थीं मेरी लुई अचानक बिना दरवाज़ा खटखटाए उनके कमरे में दाख़िल हो गई थीं और उन्हें रंगे हाथ प्यार करते हुए पकड़ लिया था."
"उस समय अमृता की उम्र थी 21 साल. इसके बाद बोरिस तासलित्ज़की उनके संपर्क में आए. उन्होंने सार्वजनिक रूप से ऐलान किया कि उन्हें अमृता से इश्क है. लेकिन अमृता की माँ को ये संबंध पसंद नहीं आया."
बाद में बोरिस तासलित्ज़की ने यशोधरा डामिया को दिए एक इंटरव्यू में बताया, "मैं उनके इश्क में गिरफ़्तार था. कुछ दिनों तक तो उन्होंने उसका जवाब दिया. फिर एक दिन वो मुझसे बोलीं कि उन्हें हंगरी में अपने ममेरे भाई इगान विक्टर से प्यार हो गया है और वो उनसे शादी करेंगी."
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ममेरे भाई विक्टर इगान से शादी
शादी से पहले अमृता ने इगान को कई पत्र लिखे थे. ये पत्र अक्सर आसमानी रंग के काग़ज़ पर काली स्याही से छोटे छोटे अक्षरों में लिखे जाते थे. किसी के लिए भी उन्हें पढ़ना मुश्किल होता था.
विक्टर और अमृता ने अपनी शादी से पहले कुछ अजीब से समझौते किए थे. पहला समझौता ये था कि वो बच्चे नहीं पैदा करेंगे. इसलिए नहीं कि वो ममेरे भाई बहन थे बल्कि इसलिए कि वो बच्चे पैदा करना चाहते ही नहीं थे.
दूसरा समझौता ये था कि अमृता को दूसरे पुरुषों से संबंध बनाने की आज़ादी होगी.
विक्टर को ये कतई अजीब नहीं लगा क्योंकि वो तब तक समझ चुके थे कि यौन विविधता अमृता की शख़्सियत का हिस्सा बन चुकी थी.
16 जुलाई, 1938 को बुडापेस्ट में बिना किसी शोर-शराबे के उनकी शादी हुई थी.
विक्टर ने बाद में स्वीकार किया था कि शादी के पहले कुछ सालों में अमृता ने उन्हें छोड़ने या कहीं और जाने की इच्छा प्रकट नहीं की थी.
जब विक्टर ने गोरखपुर के पास सराया की चीनी फ़ैक्ट्री में अपनी प्रैक्टिस शुरू की थी तो उन्हें वेतन के तौर पर 160 रुपए मिला करते थे.
अमृता को इसके अतिरिक्त 100 रुपए अपने परिवार से मिलते थे. सस्ते के ज़माने में भी इतने पैसे उनके लिए कम पड़ जाते थे.
अमृता ने अपनी माँ को पत्र में लिखा था, "इतने कम रुपयों में गृहस्ती चलाना मुश्किल हो रहा है. हमारे पास बर्तन, प्लेटें, चाय के प्याले और पर्दे ख़रीदने के लिए पैसे नहीं हैं."
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यौन उन्मुक्तता की पैरोकार
अमृता के प्रेमियों की एक लंबी फेरहिस्त थी, कार्ल खंडालवाला, इकबाल सिंह, आईसीएस अधिकारी बदरुद्दीन तैयबजी, ऑल इंडिया रेडियो के निदेशक रशीद अहमद और स्टेट्समैन के संवाददाता मैलकम मगरिज.
रशीद अहमद बाद में पाकिस्तान चले गए जहाँ वो पाकिस्तान के महानिदेशक होकर रिटायर हुए.
रशीद अहमद ने उनके बारे में कहा था कि "अमृता बहुत बारीकी से हर चीज़ देखती थीं. उनमें हर चीज़ अनुभव कर लेने और जानने की ललक थी. सामाजिक बाधाओं और पाबंदियों से वो पूरी तरह आज़ाद थीं."
वो उस तरह पुरुषों की तरफ़ आकर्षित होती थीं जो मुख्यधारा से थोड़ा हट कर होते थे.
इकबाल सिंह लिखते हैं, "यौन नैतिकता की अमृता की परिभाषा आम लोगों से काफ़ी भिन्न थी. उन्होंने बताया था कि वो एक बार पेरिस के बदनाम इलाके में अकेली खड़ी हो गई थीं. वो देखना चाहती थीं कि लोग किस तरह उनके पास आते हैं."
"उन्होंने बताया था कि मेरा किसी के साथ जाने का इरादा कतई नहीं था. मैं ये देखना चाहती थी कि लोग मेरे साथ समय बिताने के लिए कितना ख़र्च करने के लिए तैयार थे. लेकिन थोड़ी देर बाद मेरी हिम्मत जवाब दे गई थी और मैं वहाँ से वापस चली आई थी."
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ख़ुशवंत सिंह की पत्नी का उपहास
खुशवंत सिंह से भी अमृता शेरगिल का वास्ता पड़ा था. खुशवंत सिंह अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, "सुंदर तो वो थी, लेकिन उससे ज़्यादा ध्यान देने वाली बात सुंदरता के प्रति उसकी सतर्कता थी. उसकी ये सतर्कता और यौवनाभिमान उसे परंपरा से हट कर जीवन जीने की ओर लालायित करते थे."
अपनी किताब ‘वीमेन एंड मेन इन माई लाइफ़’ में खुशवंत सिंह अमृता से जुड़ा एक किस्सा सुनाते हैं.
वो लिखते हैं, "एक दोपहर जब मैं खाना खाने के लिए घर आया तो मैंने देखा कि मेरी डायनिंग टेबिल पर बीयर का एक जग और कुर्सी पर एक ज़नाना बैग रखा हुआ था. कमरे में फ़्रेंच पर्फ़्यूम की ख़ुशबू फैली हुई थी. मेरे बावर्ची ने मुझे बताया कि एक मेम साहब आईं हैं."
"उन्होंने इस तरह फ़्लैट का मुआएना किया जैसे वो इसकी मालिक हों. अब वो बाथरूम में घुसी हुई हैं. वो अमृता शेरगिल थीं. वो मुझसे पास के धोबियों और ख़ानसामों के बारे में पूछने आईं थीं. उसे मेरे कमरे में लटकी हुई पेंटिंग्स को कुछ इस अंदाज़ में देखा जैसे कह रही हों, ये क्या लटका रखा है?"
"मैंने नम्रता दिखाते हुए कहा, ये मेरी पत्नी ने बनाई हैं. अभी वो सीख रही है. अमृता का जवाब था- ये तो साफ़ ज़ाहिर हो रहा है."
उनकी दूसरी मुलाकात शिमला में हुई थी. खुशवंत ने चमनलाल, उनकी पत्नी हेलेन और अमृता शेरगिल को दिन के खाने पर बुलाया.
खुशवंत लिखते हैं, "मेरा सात महीने का बेटा राहुल चलना सीख रहा था. वो बहुत प्यारा बच्चा था. उसके घुँघराले भूरे बाल थे. हर कोई उसकी तारीफ़ कर रहा था. तभी अमृता ने उसपर एक नज़र डाली और कहा, कितना गंदा बच्चा है."
"उसका ये कहना था कि सारे माहौल में सन्नाटा छा गया. उन सब के जाने के बाद मेरी पत्नी ने कहा मैं इस औरत को कभी अपने घर नहीं बुलाउंगी. बाद में अमृता तक ये ख़बर पहुंच गई कि मेरी पत्नी ने उसके बारे में क्या कहा था."
"उसने ऐलान किया कि मैं उस औरत को ऐसा सबक सिखाउंगी कि वो उसे कभी नहीं भूलेगी. मैं उसके पति पर डोरे डालूँगी. मैं उस दिन का बेसब्री से इंतेज़ार करने लगा लेकिन ये मौका कभी नहीं आया. कुछ ही दिनों मे उसका देहाँत हो गया."
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जवाहरलाल नेहरू से अमृता शेरगिल की नज़दीकी
जवाहरलाल नेहरू से भी अमृता शेरगिल की कई मुलाकातें हुई थीं. लेकिन इस बात के कोई साक्ष्य नहीं मिलते कि दोनों के बीच प्रेम संबंध थे.
सन 1937 में जब दिल्ली के इंपीरियल होटल में अमृता की पेंटिंग्स की नुमाइश लगी थी तो जवाहरलाल नेहरू उसमें पधारे थे.
उस समय अमृता ने कार्ल को लिखे पत्र में लिखा था, "मुझे लगता है नेहरू ने मुझे उतना ही पसंद किया था जितना मैंने उन्हें."
नेहरू और अमृता के बीच काफ़ी ख़तो-किदाबत हुआ करती थी. उन पत्रों के अध्ययन से उनके बीच संबंधों का अंदाज़ा लगाया जा सकता था लेकिन अमृता की माँ ने अमृता को मिले कई पत्र जला दिए थे जिसमें नेहरू के पत्र भी शामिल थे.
एक बार नेहरू अपनी गोरखपुर यात्रा के दौरान अमृता और उनके पति विक्टर से मिलने गए थे.
उस समय का एक चित्र है जिसमें नेहरू काले रंग की कमीज़ और ख़ाकी रंग की शॉर्ट्स पहने हुए हैं. उनके सिर पर गाँधी टोपी है और पैरों में पेशावरी चप्पल.
अमृता के देहावसान पर नेहरू ने अमृता की माँ को एक मार्मिक पत्र लिख कर कहा था, "पिछले पाँच सालों में मैं अमृता से पाँच छह बार ही मिला हूँगा लेकिन पहली बार मिलने पर ही उसकी प्रतिभा और उसके सौंदर्य का कायल हो गया था."
"मुझे ऐसा लगा था कि वो भारत के लिए बहुत ही बहुमूल्य प्रतिभा है. मैं उस प्रतिभा के परिपक्व होने की आशा लगाए रहा. अमृता के संपर्क में आने वाले बहुत से लोग आपके इस दुख में भागीदार हैं. उसकी यादें मेरी धरोहर हैं."
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करोड़ों में बिकती है पेंटिंग
अमृता ने अपने करियर में करीब 143 पेंटिंग्स बनाईं. उनमें वो पेंटिंग्स शामिल नहीं हैं जो उन्होंने अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को भेंट कर दी.
उनकी बहुत से पेंटिंग्स उनकी बहन के बच्चों विवान और नवीना सुंदरम के पास हैं. उनके पति विक्टर इगान के पास उनकी जितनी भी पेंटिग्स थीं उनमें से एक को छोड़ कर जिसमें उनका खुद का चित्र था, उन्होंने नैशनल गेलरी ऑफ़ मॉडर्न आर्ट्स को भेंट कर दी.
उन पेंटिंगों को ढंग से न रखे जाने के कारण उनकी बहुत सी पेंटिंग्स नष्ट हो गईं. सन 1998 में उनकी नष्ट हो गई पेंटिंग्स को रिस्टोर करने की कोशिश की गई थी.
यशोधरा डालमिया लिखती हैं, "अमृता दिन में प्राकृतिक रोशनी में पेंटिंग बनाना पसंद करती थीं. कृत्रिम रोशनी में उन्हें पेंटिंग बनाना पसंद नहीं था. पेंटिंग बनाते समय वो ढीला ओवरऑल पहनती थीं और अपने बालों को कस कर पीछे की तरफ़ बाँध लेती थीं."
"चित्र बनाते समय उनका हाथ जल्दी जल्दी चलता था. चित्र बनाने के बाद वो उसे उल्टा करके देखती थीं. अगर वो उन्हें नहीं भाता था तो वो उसे अपने पैलेट नाइफ़ से फाड़ कर फेंक देती थीं. ऐसा वो एक बार नहीं कई कई बार करती थीं."
"एक बार जब महात्मा गाँधी केप कमोरिन गए थे तो उन्होंने उनकी प्रार्थना सभा को संबोधित करते हुए एक पेंटिंग बनाई थी. उन्होंने उनसे मिलने की कोई कोशिश नहीं की थी क्योंकि उनसे मिलने बहुत से लोग पहुंच रहे थे."
उनकी प्रमुख पेंटिंग्स हैं ‘यंग गर्ल्स’, ‘जिप्सी गर्ल’, ‘यंग मैन विद फ़ोर एपिल्स’, तीन लड़कियों का समूह, ‘ब्राइड्स टॉयलेट’, ‘ब्रह्मचारीज़’ और ‘कैमिल’.
पचास के दशक में मशहूर लेखक और प्रसारक अशफ़ाक़ अहमद लाहौर के पुराने बाज़ार में घूम रहे थे.
इक़बाल सिंह लिखते हैं, "एक कबाड़ी की दुकान पर उन्हें अमृता शेरगिल की एक पेंटिंग दिखाई दी. उस फ़्रेम्ड पेंटिंग में एक महिला बैठी हुई थी. कबाड़ी ने अशफ़ाक से कहा कि वो पेंटिंग को फेंक दें और फ़्रेम को घर ले जाएं."
"अशफ़ाक ने फ़्रेम दुकानदार को दिया और अमृता शेरगिल की पेंटिंग घर ले गए. कुछ दिनों बाद उनकी मुलाकात रावलपिंडी में आर्ट गैलरी चलाने वाली ज़ुबैदा आग़ा से हुई."
"उन्होंने उनसे वो पेंटिंग अपनी गैलरी में लगाने के लिए माँगी. वहाँ से होते हुए वो पेंटिंग इस्लामाबाद की नैशनल आर्ट गैलरी पहुंच गई."
कला बाज़ार में उनके चित्र आमतौर से नहीं बिकते लेकिन जब भी वो बिकते हैं उनकी कीमत करोड़ों में होती है.
ये एक विडंबना है कि अपने जीवनकाल में अमृता को हमेशा रुपयों का मोहताज होना पड़ा लेकिन उनकी मृत्यु के बाद उनकी पेंटिंग करोड़ों रुपयों में बिकी.
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डिसेंट्री की शिकार
अपने अंतिम दिनों में अमृता शेरगिल लाहौर चली गईं. वहाँ उनके पति विक्टर इगान ने एक क्लीनिक खोला. अमृता के दोस्त इकबाल सिंह को संयोगवश उनकी बीमारी के बारे में पता चला.
इक़बाल सिंह अमृता की जीवनी में लिखते हैं, "जब मैं 3 दिसंबर को उनसे मिलने गया तो पूरे घर में एक अजीब सी शाँति छाई हुई थी. जब मैंने शयनकक्ष का दरवाज़ा खटखटाया तो एक बहुत कमज़ोर आवाज़ ने मुझे अंदर आने के लिए कहा."
"जब मैं अमृता के पास पहुंचा तो मैंने देखा कि उसका चेहरा पीला पड़ा हुआ था. मैंने उससे पूछा अमरी क्या बात है ? उसने कहा कि लेडी क़ादिर की पार्टी में पकौड़े खाए थे जिसकी वजह से मुझे ख़तरनाक किस्म की डिसेंट्री हो गई है."
"वो हर कुछ मिनटों पर टॉयलेट जा रही थीं जिसकी वजह ने उनके शरीर का सारा पानी खिंच गया था. उस दिन मुझे बिल्कुल नहीं लगा कि वो इतनी गंभीर रूप से बीमार हैं और कुछ ही दिनों की मेहमान हैं. मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं उन्हें आखिरी बार जीवित देख रहा हूँ."
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28 साल की उम्र में हमेशा के लिए आँखें मूँदीं
दो दिन बाद यानि 5 दिसंबर को इक़बाल अमृता से मिलने फिर गए. उस समय शाम के साढ़े पाँच छह बजे होंगे.
इक़बाल लिखते हैं, "जैसे ही मैं उनके घर घुसा मैंने विक्टर को तेज़ी से सीढ़ियाँ उतरते देखा. मैंने उससे पूछा अमरी कैसी है? उसने जवाब दिया मैं उसे बचाने की पूरी कोशिश कर रहा हूँ. मैंने कहा क्या मतलब है तुम्हारा? उसने कहा, वो गंभीर रूप से बीमार है. मैं नहीं समझता कि वो बच पाएगी."
"मैंने उससे पूछा क्या मैं उसे देख सकता हूँ ? उसने कहा नहीं क्योंकि वो कोमा में जा चुकी है."
अमृता के एक और दोस्त चमन लाल तुरंत लाहौर के सबसे अच्छे डॉक्टर सीकरी और एक जर्मन डाक्टर कैलिश्च को बुला लाए. दोनों ने उन्हें देखने के बाद कहा कि बहुत देर हो चुकी है.
उनको पेरिटोनाइटिस हो चुका है और उनकी आँतें ख़राब हो चुकी हैं.
ये सब लोग अमृता के घर पर रात 11 बजे तक रहे. उनके जाने के बाद अमृता के चचेरे भाई चरणजीत सिंह मान लाहौर के एक और मशहूर डॉक्टर रघुबीर सिंह को बुला लाए.
लेकिन जब तक वो अमृता को देखते अमृता ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया था.
अगले दिन अमृता के पिता उमराव सिंह शिमला से लाहौर पहुंच गए.
उनके पार्थिव शरीर को एक कश्मीरी शॉल में लपेट कर रावी नदी के किनारे श्मशान घाट ले जाया गया.
उनके पिता उमराव सिंह ने उनका अंतिम संस्कार किया. उस समय उनकी उम्र थी मात्र 28 साल.
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मौत का कारण गर्भपात
बाद में कई लोगों ने कहा कि अमृता की मौत का कारण सिर्फ़ डिसेंट्री नहीं था.
बाद में खुशवंत सिंह ने लिखा, "डाक्टर रघुबीर सिंह ने मुझे बताया था कि अमृता गर्भवती हो गई थीं और उनके पति उनका गर्भपात कराने की कोशिश कर रहे थे. ऑपरेशन सफल नहीं रहा और अमृता को रक्तस्राव शुरू हो गया."
"आखिर में विक्टर ने डॉक्टर रघुबीर सिंह से अमृता को उनका खून चढ़ाने के लिए कहा. डॉक्टर सिंह ने कहा कि बिना उनका ब्लड ग्रुप जाने वो ऐसा नहीं कर सकते. जब दोनों डॉक्टरों के बीच ये बातचीत चल रही थी अमृता ने दम तोड़ दिया था."
अमृता के अधिक्तर परिवार वालों का मानना था कि विक्टर ने ही अमृता का ऑपरेशन किया था.
इंदिरा गाँधी के चचेरे भाई बीके नेहरू की हंगारियन पत्नी फ़ौरी नेहरू जो कि अमृता की माँ के बहुत करीब थीं, मानती थीं कि विक्टर द्वारा किया गया ऑपरेशन इसलिए सफल नहीं रहा क्योंकि वो प्रशिक्षित सर्जन नहीं थे.
दूसरे डॉक्टरों को उन्होंने तुरंत इसलिए नहीं बुलाया क्योंकि उन्हें अपनी बदनामी का डर था. वैसे भी उस समय भारत में गर्भपात कराना ग़ैरकानूनी था.
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31 जुलाई, 1948 को अमृता की माँ मेरी एंटॉयनेट ने उमराव सिंह की बंदूक से अपने आप को गोली मार कर आत्महत्या कर ली थी.
अमृता के पिता उमराव सिंह का सन् 1954 में 84 साल की उम्र में देहावसान हुआ.
अमृता की छोटी बहन इंदिरा कसौली शिफ़्ट कर गईं जहाँ 1974 में उनका निधन हो गया.
अमृता की मौत के 13 साल बाद विक्टर ने नीना हैदरी से दूसरी शादी कर ली.
सन् 1997 में 88 वर्ष की आयु में विक्टर इगान का भी निधन हो गया.
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