खाना खाने के फौरन बाद क्या आपको शौच जाना पड़ता है, कहीं यह बीमारी का संकेत तो नहीं?

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इमेज कैप्शन, कई बार लोगों को खाना खाते ही शौच जाने की इच्छा होने लगती है
    • Author, सिराज
    • पदनाम, बीबीसी तमिल
  • पढ़ने का समय: 6 मिनट

खाना खाने के कुछ मिनटों बाद ही शौच जाने की इच्छा होना एक ऐसी समस्या है, जिसका सामना रोज़ाना बहुत से लोगों को करना पड़ता है.

इससे मन में ये सवाल भी उठता है जो खाना हमने खाया क्या वह सही से पचा भी है?

मेडिकल एक्सपर्ट्स के अनुसार, इस सोच के पीछे की एक वजह ऑफ़िस के दौरान कम या सीमित मात्रा में खाना और छुट्टियों के दौरान अपनी मनपसंद चीज़ें खूब खाना है.

लेकिन सवाल यह है कि क्या खाने के तुरंत बाद शौच करना सामान्य है या फिर यह किसी बीमारी का संकेत है? या दिन में कई बार शौच जाना एक समस्या है भी या नहीं?

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इस स्टोरी में आपको मेडिकल एक्सपर्ट्स और स्टडीज़ की मदद से इन सवालों का जवाब मिलेगा.

चेन्नई के गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट डॉक्टर महादेवन कहते हैं, "खाना खाने के तुरंत बाद शौच जाने की इच्छा होने को 'गैस्ट्रोकोलिक रिफ्लेक्स' कहते हैं. लेकिन बहुत से लोगों को गलतफहमी होती है कि खाया हुआ खाना तुरंत ही मल बन जाता हैं? जबकि ऐसा नहीं हैं."

क्या हम जो खाना खाते हैं, वो तुरंत मल में बदल जाता है?

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इमेज कैप्शन, इरिटेबल बाउल सिंड्रोम के साथ कई समस्याएं जुड़ी हो सकती हैं

एक स्टडी के अनुसार, आमतौर पर खाने को मल बनकर शरीर से बाहर निकलने में 10 से 73 घंटे लगते हैं. इसे 'गट ट्रांजिट टाइम' कहते हैं.

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हालांकि ये समय कई चीजों पर निर्भर करता है, जैसे व्यक्ति की उम्र, लिंग, वजन और डाइट.

जब खाना पेट तक पहुंचता है, तो नर्व्स बड़ी आंत को सिग्नल भेजती हैं. ये सिग्नल बड़ी आंत को सिकुड़ने के लिए कहते हैं, जिससे पहले से मौजूद मल रेक्टम की तरफ धकेला जाता है. इससे शौच जाने की इच्छा तेज़ हो जाती है.

जब मल बड़ी आंत के जरिए रेक्टम से पास होता है, तो बड़ी आंत में जगह खाली हो जाती है, जिस कारण पाचन की क्षमता और भी बढ़ती है. इस प्रक्रिया को 'गैस्ट्रोकोलिक रिफ्लेक्स' कहते हैं.

डॉक्टर महादेवन कहते हैं, "यह शरीर की एक सामान्य प्रतिक्रिया है, जो छोटे बच्चों में ज्यादा देखी जाती है. इसी वजह से कई बार छोटे बच्चे दूध पीते ही मल कर देते हैं."

यह खाने के कुछ मिनटों से लेकर एक घंटे के अंदर महसूस हो सकता है. एक स्टडी के अनुसार, छोटे बच्चों में ये प्रोसेस तेज़ होता है, जबकि वयस्कों में इसकी गति धीमी होती है.

डॉक्टर महादेवन बताते हैं कि ऐसा महसूस होना सामान्य है, लेकिन अगर यह इच्छा कंट्रोल न हो पाए या बहुत तेज़ हो, तो यह पेट से जुड़ी कोई समस्या या आंत की बीमारी का संकेत हो सकता है.

डॉक्टर महादेवन आगे जोड़ते हैं कि 'इरिटेबल बाउल सिंड्रोम' एक बड़ी गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल समस्या है, लेकिन इसे रोका जा सकता है.

क्या हैं मुख्य लक्षण?

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इमेज कैप्शन, सांकेतिक तस्वीर

ब्रिटेन की नेशनल हेल्थ सर्विस के अनुसार, इरिटेबल बाउल सिंड्रोम एक ऐसी स्थिति है जो पाचन तंत्र को प्रभावित करती है. इसके मुख्य लक्षण यह हैं:

• पेट में दर्द या क्रेंप्स, जो आमतौर पर शौच जाने की इच्छा के साथ जुड़े होते हैं

• ज्यादा गैस और पेट फूलना (ब्लोटिंग)

• दस्त (डायरिया), कब्ज़, या दोनों का बारी-बारी से होना

• शौच जाने के बाद भी लगना कि पेट पूरी तरह साफ़ नहीं हुआ

नेशनल हेल्थ सर्विस की सलाह के मुताबिक़ अगर ये लक्षण 4 हफ्तों से ज्यादा समय तक रहे तो डॉक्टर से जरूर सलाह लें.

इस समस्या का कोई स्पष्ट कारण नहीं है, लेकिन इरिटेबल बाउल सिंड्रोम को ट्रिगर करने वाली ये चीज़ें हो सकती हैं :

• शराब

• कैफ़ीन (चाय-कॉफी में)

• मसालेदार या फैटी खाना

• तनाव और चिंता

• एंटीबायोटिक्स का बार-बार इस्तेमाल

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इमेज कैप्शन, गैस्ट्रोकोलिक रिफ्लेक्स की प्रक्रिया बच्चों में काफ़ी तेज़ होती है

इरिटेबल बाउल सिंड्रोम सिर्फ़ खाना खाने के बाद टॉयलेट जाने की ज़रूरत के साथ-साथ दूसरी समस्याएं भी पैदा कर सकता है:

• गैस की समस्या

• थकान और एनर्जी की कमी

• जी मिचलाना

• पीठ दर्द

• बार-बार पेशाब आने की इच्छा होना

• पेशाब पूरा न होने जैसा महसूस करना

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इमेज कैप्शन, एक स्टडी के अनुसार, दुनिया की 5 से 10 प्रतिशत आबादी को इरिटेबल बाउल सिंड्रोम होता है.

एक स्टडी के अनुसार, दुनिया की 5 से 10 प्रतिशत आबादी को इरिटेबल बाउल सिंड्रोम होता है. आईबीएस वाले हर तीन में से एक व्यक्ति को चिंता या डिप्रेशन भी होता है.

इरोड में डॉक्टर और डायटिशियन अरुण कुमार कहते हैं, "इरिटेबल बाउल सिंड्रोम बहुत से लोगों को होता है. शारीरिक रूप से स्वस्थ होने के बावजूद उन्हें पेट में तकलीफ़ रहती है. इसके दो मुख्य प्रकार हैं - IBS-C, जिसमें पेट दर्द के साथ कब्ज़ होती है, और IBS-D, जिसमें तकलीफ़ के साथ दस्त होते हैं."

डॉक्टर महादेवन कहते हैं, "इरिटेबल बाउल सिंड्रोम के लक्षणों को डाइट और लाइफस्टाइल में बदलाव करके, और तनाव प्रबंधन के तरीके अपनाकर नियंत्रित किया जा सकता है. अगर लक्षण बहुत ज़्यादा गंभीर हों, तो डॉक्टर से सलाह या इलाज लेना सबसे अच्छा है."

क्या ये आंतों की बीमारियों का लक्षण हो सकता है?

इमेज कैप्शन, डॉक्टर महादेवन के मुताबिक़ आपको सामान्य शौच की आदत में लगातार बदलाव नज़र आए, तो इसे नज़रअंदाज़ न करें

गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट सर्जन डॉक्टर रविंद्रन कुमारन कहते हैं, "कुछ लोगों को कई सालों से खाना खाने के तुरंत बाद टॉयलेट जाने की आदत होती है. अगर इससे उन्हें कोई शारीरिक या मानसिक तकलीफ़ नहीं होती, तो ये समस्या नहीं हैं. लेकिन अगर अचानक ऐसी तेज़ इच्छा होने लगे और लगातार बनी रहे, तो इस पर ध्यान देना ज़रूरी है."

डॉक्टर रविंद्रन कुमारन कहते हैं, "जो लोग रोज़ ऑफिस या स्कूल-कॉलेज जाते हैं, उन्हें बार-बार शौच के लिए जाना असुविधाजनक लग सकता है. अगर वे हमसे संपर्क करें, तो हम कुछ लाइफस्टाइल बदलाव सुझाते हैं. वरना, एक दिन में कितनी बार शौच जाना चाहिए, इसका कोई फिक्स नियम नहीं है. अगर लगातार कब्ज़ या दस्त रहें, तो डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए."

इस बात पर जोर देते हुए डॉक्टर महादेवन कहते हैं, "जब आपको अपनी सामान्य शौच की आदत में लगातार बदलाव नज़र आए, तो इसे नज़रअंदाज़ न करें. उदाहरण के लिए, रात में बार-बार शौच के लिए उठना एक खतरनाक बदलाव हो सकता है. यह किसी दूसरी बीमारी का भी लक्षण हो सकता है."

डॉक्टर महादेवन बताते हैं कि "स्टूल में चिपचिपा पदार्थ (बलगम - जो सफेद दिख सकता है) या खून आना, वज़न कम होना, लगातार कब्ज़ या दस्त, ये आंतों की बीमारियों के लक्षण हो सकते हैं. इसके लिए डॉक्टर से सलाह लेना सबसे अच्छा है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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