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शनिवार, 19 जुलाई, 2008 को 14:57 GMT तक के समाचार
 
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ट्वेन्टी-20 क्रिकेट का जिन्न
 

 
 
शाहरुख़ ख़ान
आईपीएल में टीम ख़रीदने वालों को फ़ायदा नहीं हुआ है
टेस्ट मैच के मौसम में भी हमें ट्वेंटी-20 क्रिकेट का खुमार छोड़ने को तैयार नहीं है. भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने अपने खिलाड़ियों को एक असाधारण फ़रमान जारी किया है कि वे किसी ऐसी इंग्लिश काउंटी टीम के साथ नहीं खेलें जिसमें इंडियन क्रिकेट लीग (आईसीएल) के खिलाड़ी शामिल हों.

हालाँकि बोर्ड के अधिकारी का कहना है कि ये कोई 'आदेश' नहीं है बल्कि सलाह भर है. लेकिन बोर्ड के कड़े रुख़ को देखते हुए किसी को भरोसा नहीं होगा कि कोई खिलाड़ी उसकी 'इच्छा' के ख़िलाफ़ जाने का साहस करेगा.

श्रीलंका में अनिल कुंबले ने मीडिया से कहा कि वे और ज़्यादातर खिलाड़ी टेस्ट क्रिकेट को असली लक्ष्य मानते हैं. कुंबले तो यहाँ तक कह गए कि इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) की सफलता में मीडिया की पैदा की गई सनक की ज़्यादा भूमिका थी.

क्या वो लोग इससे सहमत होंगे जो अब आईपीएल की शपथ लेते हैं और इससे उन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि क्रिकेट के दूसरे स्वरूप बचें या जाएँ?

दूसरी ओर आईपीएल से जुड़े 'प्यारे-दुलारे कमेंटेटर' और 'देश की आवाज़' इसकी तारीफ़ करते अघा नहीं रहे हैं कि कैसे इसने क्रांति ला दी है और इसने कितना आर्थिक लाभ हो रहा है और खिलाड़ियों को यह भविष्य में क्या लाभ देगा.

उपदेश

वे हमें ट्वेन्टी-20 के चमत्कार पर उपदेश दे रहे हैं. ऐसा भी होगा कि जो उनकी बातों से सहमत नहीं होंगे उन्हें कह दिया जाएगा कि वे इस क्षेत्र में हो रहे बदलावों के बारे में कुछ नहीं जानते और उन्हें चुप रहने को कह दिया जाएगा.

नफ़ा-नुक़सान की बात दूसरे तरीक़े से पेश की जा रही है

चाहे वह इंग्लैंड हो या पाकिस्तान, हर देश चाहता है कि उसका अपना एक लीग मैच हो. इंग्लैंड क्रिकेट के इस नए रूप को भारत की ही तरह जोश के साथ गले लगा रहा है.

अगर उन्हें पैसे वाले प्रायोजक और टीम ख़रीदने वाले मिल जाते हैं तो हम पैसे और अहम का और ज़्यादा झगड़ा आने वाले दिनों में देख सकते हैं. हमारे पास एलन स्टैनफ़ोर्ड नाम का एक अरबपति भी मैदान में है. हमें अचरज हो रहा है क्यों यह आदमी आईसीएल के साथ हाथ नहीं मिला रहा है ताकि विश्व क्रिकेट को थोड़ा और झकझोरा जा सके.

लेकिन फ़ुटबॉल की तरह क्या यहाँ अलग-अलग देशों के लिए इतनी जगह है कि वो ख़ुद की लीग शुरू कर सकें? फ़ुटबॉल से उलट क्रिकेट में अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों के समूह में सीमित लोग ही हैं और एक ही समय में दो से तीन टीमों के लिए खेल पाना विश्व के 'धोनियों' के लिए मानवीय रूप से संभव नहीं होगा.

इसलिए खिलाड़ियों के अच्छी ख़बर यह है कि उनकी ‘बोली क्षमता’ कई गुना बढ़ सकती है. जब अमीर और अमीर होंगे तो उसका असर नीचे तक आएगा और उसका फ़ायदा ग़रीबों को भी मिलेगा. जैसा कि आईपीएल में हुआ.

बड़े आश्चर्य की बात ये है कि भले आईपीएल खिलाड़ियों के लिए, बोर्ड के लिए, मीडिया के लिए और दर्शकों के लिए शानदार रहा लेकिन टीम के मालिकों के लिए यह बहुत सफल नहीं रहा. आईपीएल के बाद मैंने मीडिया में कोई ऐसी ख़बर नहीं देखी जिसमें इस टूर्नामेंट के वित्तीय पहलुओं का आकलन किया गया हो.

कोशिश

अगर आप फ़्रैंचाइजी या उनके प्रतिनिधि से बात करेंगे तो आपको बताया जाएगा कि औसतन हरके टीम ने 20-30 करोड़ रुपए का नुक़सान उठाया.

अनिल कुंबले मीडिया से समर्थन मांग रहे हैं

रोचक बात यह भी है कि जब टूर्नामेंट शुरू हुआ था तब माना गया था कि इसे उस हालत में पहुँचने में करीब तीन साल लगेगा जब किसी टीम को अगर नफ़ा न हो तो उसे नुक़सान भी न हो.

उस समय किसी ने सोचा भी नहीं था कि पहले साल ही यह इतना सफल साबित होगा. लेकिन सफलता के बावजूद वसूली कम हुई है इसलिए आकलन को संशोधित कर दिया गया है और अब कहा जा रहा कि इसे फ़ायदे या नुक़सान न होने की स्थिति तक पहुँचने में क़रीब पाँच साल लगेंगे.

अगर एक शीर्ष अंग्रेज़ी अख़बार में छपी रिपोर्ट की बात करें तो आईपीएल के फ़ाइनल मैच की टीआरपी 7.7 थी. इसके सेमी फ़ाइनल मैचों की टीआरपी 4 से 5 के बीच थी. मीडिया और दर्शकों की थकान के बावजूद आईपीएल के बाद हुए एशिया कप टूर्नामेंट की टीआरपी भी यही थी.

पाठकों को याद दिलाना चाहूँगा कि भारत-ऑस्ट्रेलिया सिरीज़ की टीआरपी 8 से ज़्यादा रही थी और किसी भी चमक-दमक भरे एकदिवसीय मैच की टीआरपी कई बार 9 से ऊपर चली गई थी.

इसलिए तब कुंबले सच से बहुत दूर नहीं थे जब वो यह कह रहे थे कि आईपीएल को लेकर मीडिया ने लोगों में दीवानगी पैदा कर दी थी और श्रीलंका टेस्ट सिरीज़ में भी मीडिया को उसी तरह से मदद करनी चाहिए.

यह समर्थन और सहयोग उन्हें और उनकी टीम को ज़रूर मिलेगा लेकिन उन्हें भी ये पक्का करना होगा कि उनका खेल उच्च दर्जे का और मुक़ाबला काँटे का होगा. उनका प्रदर्शन इंग्लैंड-दक्षिण अफ़्रीका के बीच हुए लॉर्ड्स टेस्ट की तरह का नहीं हो जिसे देखते हुए क्रिकेट के पागल और बेपनाह दीवानों को भी नींद आ जाए.

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स स्पोर्ट्स के सलाहकार हैं)

 
 
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