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भारतीय दल से कितनी हैं उम्मीदें
 

 
 
जुगराज सिंह
ओलंपिक हॉकी में सालों से चल रही वीरानी क्या दूर होगी?
उम्मीद जगा-जगाकर, गरज-गरजकर नहीं बरसने वाले मेघखंडों की तरह, पूरे तामझाम के साथ ओलंपिक खेलों के उदघाटन समारोहों में तिरंगा थामे पहुंचते रहे हैं भारतीय खिलाड़ी और अधिकारी.

लेकिन केवल चौदह बार पदक मंच पर पहुचने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, भारतीय खिलाड़ियों को.

इस बार क्या होगा एथेंस में.इस बारे में भारतीय ओलंपिक संघ के महासचिव रणधीर सिंह कहते हैं,"आज तक की सबसे अच्छी भारत की जो टीम ओलंपिक खेलों में गयी है, वो अबकी बार गयी है. आठ निशानेबाज़ हैं- आठों विश्व वरीयता क्रम में चोटी पर हैं."

उन्होंने कहा,"महिला भारोत्तोलक हैं, जो विश्व वरीयता में शीर्ष 10 भारोत्तोलकों में हैं. टेनिस में लिएंडर और महेश की जोड़ी है. अंजू जॉर्ज हैं, जिनकी वर्ल्ड रैंकिंग हैं, फिर नीलम जे. सिंह हैं. हमारी तीरंदाज़ी टीम अभी अच्छा करके आई है. मुक्केबाज़ हैं, पहलवान हैं और फिर हमारी हॉकी टीम है. इनमें से, मेरे हिसाब से कई को पदक जीतना चाहिए. अब कितने जीतेंगे, कौन जीतेंगे, कहना बड़ा मुश्किल है."

देश की उम्मीदों की बागडोर कहने को तो 76 खेल सितारों के हाथों में है लेकिन पदक पाने की उम्मीदें कम ही हैं.

एथलेटिक्स

अब एथेंस की ही बात करें. 18 एथलीट देश के प्रतिनिधित्व के लिए तैयार हैं- लेकिन पदक लाने की उम्मीद, केवल दो से लगाए बैठे हैं.

क्या अंजू कर पाएँगी कोई कमाल?

ललित भानोट के अनुसार, "मेरी सबसे ज्यादा उम्मीद अंजू जॉर्ज से है. इसके अलावा आप उम्मीदें लगा सकते हैं नीलम जे सिंह से, जिन्होंने पिछले एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीता था, डिस्कस थ्रो में. उसकी भी तैयारी, ओलंपिक खेलों के लिए काफी अच्छी है."

ख़ैर चलिए एथलेटिक्स के दो ही सही, आशा की किरणें तो हैं. पर इस बार सबसे ज़्यादा उम्मीद निशानेबाज़ों से है.

सनी थॉमस कहते हैं, "आठ लोगों ने क्वालीफ़ाई किया है और आठों विश्व की चोटी के निशानेबाज़ों के समतुल्य हैं. अब उस दिन उनका प्रदर्शन कैसा होता है, इस बात पर निर्भर करेगी, उनके पदक पाने की संभावना. उस दिन परिस्थितियाँ कैसी होंगी."

कितना तनाव होगा, उस तनाव से किस हद तक और कैसे उबर पाएंगे हमारे निशानेबाज यह तो उस दिन एथेंस में ही पता लगेगा.

वैसे गामा पहलवान की इस मिट्टी से छह पहलवान एथेंस के आखाड़ों में ताल ठोंकने के लिए तैयार हैं. लेकिन 1972 के ओलंपिक में चौथा स्थान प्राप्त करने वाले पहलवान प्रेमनाथ को पदकों की उम्मीद केवल तीन से है.

प्रेमनाथ बताते हैं, "55 किलो में ग्रीको रोकन में मुकेश खत्री जा रहे हैं. उनसे पदक की बहुत ज्यादा उम्मीद है. और फ्री स्टाइल में योगरेश्वर दत्त और सुशील कुमार जा रहे हैं. उनसे भी मुझे उम्मीद है कि वो पदक ला सकते हैं."

कुश्ती के अखाड़े को छोड़ रूख करें बॉक्सिंग रिंग का. अखिल कुमार और जितेंद्र कुमार अपने मुक्कों की ताक़त आज़माने के लिए तैयार हैं.

टेनिस और हॉकी

टेनिस में लिएंडर पेस और महेश भूपति की जोड़ी से भारतीय खेलप्रेमियों को पदक की उम्मीद है. लेकिन हॉकी की मातृभूमि की उस टीम से, जिसमें शामिल हैं धनराज पिल्लै, दिलीप टिर्की, बलजीत सिंह और गगन अजीत सिंह जैसे खिलाड़ी शामिल हैं, स्वर्ण पदक की उम्मीद लगायी जाए या नहीं, यह सवाल हमने पूर्व कप्तान मोहम्मद शाहिद से पूछा.

क्या टेनिस में फहराएगा भारतीय झंडा

शाहिद कहते हैं, "ये काफ़ी अच्छे खिलाड़ी हैं और काफी लंबे अरसे से हॉकी टीम के लिए खेलते चले आ रहे हैं. ये पहली बार ओलंपिक में हिस्सा नहीं ले रहे हैं."

"ये सारे खिलाड़ियों को जानते हैं कि जर्मनी में कौन ख़तरनाक खिलाड़ी है.
हॉलैंड का कौन है, पाकिस्तान का कौन है, तो मेरा ख्याल है कि इनका बेहतर प्रदर्शन होना चाहिए और जिस तरह से टीम ने तैयारी की है. फ़िटनेस कैंप लगे जर्मनी में उनका प्रदर्शन देखने के बाद खिलाड़ियों का चयन हुआ. यह सब देखकर ऐसा लगता है कि स्वर्ण पदक नहीं तो कम से कम रजत पदक तो मिलना ही चाहिए."

हॉकी के अलावा जिन तीन खेलों में से एक में आज तक भारत पद जीत पाता है, वो है महिला भारोत्तोलन.

और उस कांस्य पदक को जीतने वाली शामिल हैं 4 सदस्यीय महिला टीम में- उनके अलावा एन. देवी, सानामाचा चानू और प्रतिमा कुमारी भी पदक पाने के लिए भार उठाने को तैयार हैं.

निशानेबाज़ों की बात तो हमने कर ली, तीरंदाज़ भी पीछे नहीं रहे हैं, इस बार, ओलंपिक के लिए क्वालीफ़ाई करने में हैं तीन पुरुष और तीन महिलाएं.

इसके अलावा तैराकी और नौकायन में भी क़िस्मत आजमाएँगे भारतीय खिलाड़ी.

लेकिन सच पूछा जाए तो पदकों की सबसे ज़्यादा उम्मीद जिन दो प्रतियोगियों से है- वे हैं अंजू बॉबी जॉर्ज और अंजलि भागवत.

 
 
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