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मंगलवार, 19 अक्तूबर, 2004 को 18:23 GMT तक के समाचार
 
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वीरप्पन की मौत को लेकर छिड़ा विवाद
 
वीरप्पन का शव
वीरप्पन मरने के बाद भी नई-नई बहसों को जन्म दे रहे हैं
चंदन तस्कर वीरप्पन की मौत को लेकर विवाद उठ खड़ा हुआ है. एक प्रमुख मानवाधिकार संगठन का कहना है कि उसे जीवित पकड़ा जाना चाहिए था.

मानवाधिकार संगठन पीपुल्स वाच के प्रमुख हेनरी तिफ़ागने ने बीबीसी तमिल सेवा से बातचीत में कहा, "वीरप्पन को घेरने वाले सौ पुलिसकर्मियों ने उसे आत्मसमर्पण को मजबूर क्यों नहीं किया, या फिर उसे सिर्फ घायल क्यों नहीं किया गया?"

उनका कहना है कि वीरप्पन की मौत के बाद तमिलनाडु और कर्नाटक के प्रमुख लोगों से उसके संबंधों का रहस्य सामने नहीं आ पाएगा.

 वीरप्पन को घेरने वाले सौ पुलिसकर्मियों ने उसे आत्मसमर्पण को मजबूर क्यों नहीं किया, या फिर उसे सिर्फ घायल क्यों नहीं किया गया?
 
पीपुल्स वॉच

धर्मपुरी में वीरप्पन का शव देखने जुटे स्थानीय लोग में से अनेक यही सवाल कर रहे हैं.

उनका कहना है कि वीरप्पन के ज़िंदा पकड़े जाने पर ही उनके किए अपराधों पर से पर्दा उठ पाता.

एक पूर्व सैनिक ने कहा, "हम लोकतंत्र में रह रहे हैं और वीरप्पन चाहे जितना बुरा रहा हो उसे इस तरह मारना ठीक नहीं था उसे ज़िंदा पकड़ना चाहिए था."

वीरप्पन के शव को देखने आए रवि ने कहा, "वीरप्पन ग़रीब लोगों को मदद करते थे उन्हें इस तरह मार देना ग़लत है."

यह सवाल भी पूछा जा रहा है कि क्या वीरप्पन और उनके साथी सचमुच किसी मुठभेड़ में मारे गए हैं. हालाँकि स्पेशल टास्क फ़ोर्स (एसटीएफ़) का कहना है कि यह योजनाबद्ध कार्रवाई का हिस्सा था.

 वीरप्पन जैसे असामाजिक तत्वों को ज़िंदा नहीं रहने देना चाहिए
 
कन्नड़ फ़िल्म स्टार राजकुमार

तमिलनाडु एसटीएफ़ के प्रमुख विजय कुमार का कहना है कि ख़ुफ़िया सूत्रों से जो सूचनाएँ मिली थीं उसके आधार पर इसकी योजना बनाई गई थी.

इस बीच वीरप्पन की हिरासत में सौ दिन से ज़्यादा गुजारने वाले कन्नड़ फ़िल्म स्टार राजकुमार ने कहा कि वीरप्पन के मारे जाने से वह ख़ुश हैं.

उन्होंने कहा, "वीरप्पन जैसे असामाजिक तत्वों को ज़िंदा नहीं रहने देना चाहिए."

विवादों का इतिहास

उल्लेखनीय है कि वीरप्पन के ख़िलाफ़ पिछले दो दशकों तक चला अभियान भी विवादों से अछूता नहीं रहा था.

इस काम को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु सरकारों के बीच कई बार तनातनी की स्थिति बनी थी.

वरिष्ठ अधिकारी कई मौक़ों पर स्वीकार भी कर चुके हैं कि दोनों राज्यों के विशेष पुलिस दस्तों में तालमेल नहीं रहने का बुरा असर वीरप्पन की तलाशी से जुड़े अभियान पर पड़ा.

वीरप्पन की पत्नी ने शव की शिनाख्त की

विशेषकर तमिलनाडु पुलिस के स्पेशल टास्क फ़ोर्स पर स्थानीय लोगों को तंग करने का आरोप लगा.

दूसरी ओर वीरप्पन की छवि रॉबिनहुड थी, कि वह लूट का एक हिस्सा ग्रामीणों में बाँटता है.

चेन्नई से बीबीसी संवाददाता टीएन गोपालन के अनुसार वीरप्पन पर यह आरोप कभी नहीं लगा कि उसने अपनी खूंखार छवि का फ़ायदा उठाकर महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया.

पुलिस वीरप्पन के गिरोह का पूरी तरह सफाया हो जाने की बात कर रही है, लेकिन यह कभी भी स्पष्ट नहीं हो सका कि सचमुच में कितने लोग उसके गिरोह में हैं.

पत्रकारों से मुलाक़ात के दौरान वीरप्पन खुलेआम कहते थे कि अपराध जगत में उसके शुरुआती दिनों में उसे स्थानीय नेताओं, पुलिस और सत्ता के दलालों का साथ मिला.

चंदन तस्कर ने इनलोगों को रिश्वत देकर अपनी ओर मिलाने की बात की थी.

अब उनकी मौत के साथ ही इस प्रकार की मिलीभगत पर से पर्दा उठने की संभावना नहीं रही.

लोगों की जिज्ञासा यह जानने में भी है कि वीरप्पन के ज़िम्मे रही माने जानेवाली करोड़ों की रकम का क्या होगा.

 
 
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